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सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय’ संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन; आपदा और आपदा प्रबंधन।

संदर्भ: भारत सरकार ने एकीकृत जल शासन पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करते हुए, लगभग ₹2183 करोड़ के परिव्यय के साथ नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) योजना का 2026-31 की अवधि के लिए विस्तार कर दिया है।

नदी बेसिन प्रबंधन योजना के बारे में  

  • नदी बेसिन प्रबंधन (RBM) जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग की एक केंद्रीय क्षेत्र की योजना है।
  • इस योजना का उद्देश्य नदी बेसिन स्तर पर जल संसाधनों के एकीकृत नियोजन, अन्वेषण और विकास को सुगम बनाना है, जिसमें सतही जल और भूजल प्रणालियाँ दोनों शामिल हैं।
  • इसे तीन प्रमुख संगठनों के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है:
    • ब्रह्मपुत्र बोर्ड
    • केंद्रीय जल आयोग (CWC)
    • राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी (NWDA)
  • यह बेसिन मास्टर प्लान तैयार करने, परियोजनाओं के सर्वेक्षण और अन्वेषण तथा बहुउद्देशीय परियोजनाओं के नियोजन जैसी गतिविधियों में सहायता प्रदान करती है।

योजना के उद्देश्य

  • यह योजना बेसिन स्तर पर जल संसाधन नियोजन और विकास से जुड़ी विविध चुनौतियों का समाधान करने के लिए शुरू की गई है।
  • इस योजना का उद्देश्य सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ प्रबंधन का समर्थन करते हुए जल के सतत उपयोग को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करना है।

मुख्य विशेषताएँ और घटक

  • बेसिन-स्तरीय नियोजन दृष्टिकोण: यह योजना प्राकृतिक नदी बेसिनों पर आधारित नियोजन को बढ़ावा देती है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में जल संसाधनों का समग्र प्रबंधन संभव होता है।
  • वैज्ञानिक और तकनीकी एकीकरण: सटीक मानचित्रण और नियोजन के लिए जीआईएस (GIS), रिमोट सेंसिंग, लिडार (LiDAR) और ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण जैसे उन्नत उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
  • बहुउद्देशीय विकास पर ध्यान: यह सिंचाई, जलविद्युत, बाढ़ नियंत्रण और जल भंडारण से संबंधित परियोजनाओं का समर्थन करती है, जिससे बहु-क्षेत्रीय लाभ सुनिश्चित होते हैं।
  • संस्थागत समन्वय: यह योजना प्रभावी कार्यान्वयन के लिए केंद्रीय एजेंसियों, राज्य सरकारों और बेसिन-स्तरीय संस्थानों के बीच समन्वय सुनिश्चित करती है।

भौगोलिक और रणनीतिक फोकस

  • महत्वपूर्ण नदी बेसिनों पर फोकस: यह योजना ब्रह्मपुत्र, बराक, तीस्ता और सिंधु जैसे प्रमुख नदी बेसिनों को प्राथमिकता देती है, जो जल की उपलब्धता और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • उत्तर-पूर्वी और हिमालयी क्षेत्रों पर बल: उत्तर-पूर्वी और हिमालयी क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जो जल संसाधनों से समृद्ध हैं लेकिन बाढ़, कटाव और अल्पविकास जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
  • रणनीतिक और पार-सीमावर्ती महत्व: इन नदी प्रणालियों के पार-सीमावर्ती प्रभाव हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय जल सहयोग के लिए बेसिन-स्तरीय प्रबंधन को अनिवार्य बनाते हैं।

योजना का महत्व

  • जल सुरक्षा को बढ़ावा: यह योजना विभिन्न क्षेत्रों में जल संसाधनों के कुशल, न्यायसंगत और सतत उपयोग को बढ़ावा देकर दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • आर्थिक विकास में सहायता: सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और बहुउद्देशीय जल परियोजनाओं को सुगम बनाकर, यह योजना कृषि उत्पादकता, ऊर्जा उत्पादन और समग्र आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण: बेसिन-स्तरीय नियोजन बाढ़ नियंत्रण, कटाव प्रबंधन और जलभराव के शमन के लिए अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण सक्षम बनाता है, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा जोखिम कम होता है।
  • पर्यावरणीय स्थिरता: यह योजना जल संसाधन नियोजन में पर्यावरणीय पहलुओं को एकीकृत करके नदी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को बढ़ावा देती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।

चुनौतियाँ और बाधाएँ

  • अंतर-राज्यीय समन्वय के मुद्दे: चूंकि नदी बेसिन अक्सर कई राज्यों में फैले होते हैं, इसलिए प्राथमिकताओं और हितों में अंतर के कारण अक्सर समन्वय की चुनौतियां और विवाद उत्पन्न होते हैं, जो प्रभावी कार्यान्वयन को प्रभावित करते हैं।
  • डेटा और क्षमता अंतराल: विश्वसनीय और वास्तविक समय (रियल-टाइम) के जल-विज्ञानी (हाइड्रोलॉजिकल) डेटा की कमी और कुछ क्षेत्रों में सीमित तकनीकी क्षमता, सटीक नियोजन और समय पर निर्णय लेने में बाधा उत्पन्न करती है।
  • संस्थागत विखंडन: परस्पर व्यापी अधिदेश वाली कई एजेंसियों की उपस्थिति के परिणामस्वरूप अक्सर विखंडित शासन होता है, जिससे परियोजना के निष्पादन में समस्या उत्पन्न होती है और विलंब होता है।
  • जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता: जलवायु परिवर्तनशीलता में वृद्धि, जिसमें वर्षा का अनियमित पैटर्न और चरम मौसम की घटनाएं शामिल हैं, जल संसाधन नियोजन और प्रबंधन में अनिश्चितता पैदा करती है।

आगे की राह

  • संस्थागत तंत्र को सुदृढ़ करना: समन्वित और प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट कानूनी जनादेश और प्रशासनिक स्वायत्तता के साथ बेसिन-स्तरीय प्राधिकरणों को स्थापित और सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
  • डेटा और प्रौद्योगिकी के उपयोग में सुधार: वास्तविक समय (रियल-टाइम) निगरानी प्रणाली, जीआईएस (GIS) और रिमोट सेंसिंग जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का एकीकरण जल संसाधन प्रबंधन की सटीकता और दक्षता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है।
  • सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना: विवादों को सुलझाने और समन्वित बेसिन-स्तरीय नियोजन सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत तंत्र और संवाद के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को मजबूत करना आवश्यक है।
  • नीतिगत अभिसरण (कन्वर्जेंस): नदी बेसिन-आधारित नियोजन को राज्य-स्तरीय जल संसाधन रणनीतियों में स्थायी रूप से एकीकृत करने और जल जीवन मिशन, अमृत (AMRUT) तथा नमामि गंगे जैसे प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ अभिसरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
  • सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना: स्थानीय समुदायों, हितधारकों और जमीनी स्तर के संस्थानों की सक्रिय भागीदारी कार्यान्वयन के परिणामों में सुधार कर सकती है और यह सुनिश्चित कर सकती है कि जल प्रबंधन प्रथाएं समावेशी और सतत बनी रहें।

Source:
Pib
Jalshakti
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