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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान एवं मूल संरचना; विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार की नीतियाँ एवं हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और क्रियान्वयन से संबंधित विषय।

संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) द्वारा शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी, जो लंबे समय से लंबित इस सुधार को राज्य-स्तर पर आगे बढ़ाने का संकेत देता है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • वर्तमान में, हाल की यूसीसी पहलों में उत्तराखंड एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ कानून लागू है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने यूसीसी संबंधी कानून पारित कर दिए हैं और अब वे संबंधित अनुमोदन/अधिसूचना की प्रक्रिया के लिए प्रतीक्षारत हैं।
  • केंद्र सरकार संसद में एकल यूसीसी कानून लाने के बजाय राज्य-दर-राज्य दृष्टिकोण अपना रही है, जिसमें राज्य-स्तरीय कानून व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए मॉडल के रूप में काम कर रहे हैं।
  • उभरते हुए राज्य-स्तरीय ढाँचे में मुख्य रूप से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार एवं विरासत, बहुविवाह और लिव-इन संबंधों को शामिल किया गया है, जबकि कुछ जनजातीय समुदायों और प्रथागत परंपराओं को इससे छूट प्रदान की गई है।

यूसीसी के लिए राज्य-स्तरीय मार्ग क्यों?

  • समवर्ती विधायी क्षेत्र: विवाह और तलाक, दत्तक ग्रहण, वसीयत, निर्वसीयतता एवं उत्तराधिकार, संयुक्त परिवार और विभाजन जैसे विषय समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 के अंतर्गत आते हैं, जिससे संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को इन विषयों पर कानून बनाने की विधायी शक्ति प्राप्त होती है।
  • अनुच्छेद 254 की भूमिका: जहाँ समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य का कानून संसद द्वारा बनाए गए कानून के प्रतिकूल होता है, वहाँ सामान्यतः संसद का कानून प्रभावी होता है। हालाँकि, यदि राज्य के कानून को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखा गया हो और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो जाए, तो वह उस राज्य में प्रभावी रह सकता है; लेकिन संसद बाद में उस कानून को अधिभावी (प्रभावहीन) कर सकती है।
  • प्रयोग की गुंजाइश: राज्य-स्तरीय मार्ग सरकारों को समान नागरिक कानून के ढाँचे का प्रयोग करने, कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं की पहचान करने और व्यापक राष्ट्रीय स्तर के ढाँचे की संभावित व्यवस्था से पहले सामाजिक प्रतिक्रियाओं का आकलन करने का अवसर देता है।
  • विविधता का समायोजन: पूरे भारत में व्यक्तिगत और प्रथागत प्रथाओं में काफी विविधता है, विशेषकर जनजातीय समुदायों और पूर्वोत्तर भारत में। राज्य-स्तरीय कानून इन विविधताओं तथा संविधान द्वारा संरक्षित प्रथाओं को अधिक ध्यान में रखने की अनुमति देते हैं।
  • राजनीतिक व्यवहार्यता: राष्ट्रव्यापी यूसीसी के लिए व्यक्तिगत कानूनों, प्रथाओं और राजनीतिक विचारों की कहीं अधिक व्यापक विविधता के बीच सामंजस्य स्थापित करना होगा। राज्य-स्तरीय मॉडल व्यापक कदम उठाने से पहले विधायी अनुभव और व्यावहारिक उदाहरण पेश करते हैं।

समान नागरिक संहिता को समझना

  • अर्थ: यूसीसी (समान नागरिक संहिता) से आशय ऐसे सामान्य नागरिक नियमों के ढाँचे से है, जो धर्म की परवाह किए बिना विवाह, तलाक, दत्तक ग्रहण, भरण-पोषण, विरासत और उत्तराधिकार जैसे निर्दिष्ट विषयों को नियंत्रित करते हैं।
  • व्यक्तिगत कानून: भारत में ऐतिहासिक रूप से परिवार से संबंधित कई मामलों के लिए अलग-अलग वैधानिक, प्रथागत और धार्मिक आधार पर बने कानूनों की व्यवस्था रही है, जिनमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 शामिल हैं।
  • यूसीसी का उद्देश्य: इसका उद्देश्य निर्दिष्ट नागरिक मामलों में एकरूपता स्थापित करना है, न कि धार्मिक मान्यताओं, उपासना या धार्मिक सिद्धांतों में एकरूपता लाना।
  • संवैधानिक स्थिति: अनुच्छेद 44, राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के अंतर्गत आता है और राज्य को पूरे भारत में यूसीसी सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है। यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है और अपने आप में कोई लागू करने योग्य यूसीसी स्थापित नहीं करता।
  • मौजूदा मॉडल: गोवा की सामान्य नागरिक कानून व्यवस्था, जो पुर्तगाली सिविल कोड से विरासत में मिली है, भारत में समान नागरिक कानूनों के मौजूदा उदाहरण के रूप में यूसीसी की बहस में अक्सर उद्धृत की जाती है।

यूसीसी की संवैधानिक एवं ऐतिहासिक विकास-यात्रा

  • औपनिवेशिक जड़ें: 1835 के विधि आयोग ने आपराधिक कानून, साक्ष्य और संविदाओं जैसे क्षेत्रों के एकरूप संहिताकरण का समर्थन किया, जबकि व्यक्तिगत कानूनों को काफी हद तक इस व्यवस्था से बाहर रखा गया।
  • बी.एन. राव समिति: 1941 में गठित इस समिति ने हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और उनके संहिताकरण की समीक्षा की तथा 1947 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • संविधान सभा: यूसीसी को तत्काल प्रवर्तनीय बनाने के बजाय, संविधान ने इसके उद्देश्य को अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में रखा और इसके क्रियान्वयन को भविष्य की विधायी कार्रवाई पर छोड़ दिया।
  • स्वतंत्रता के बाद सुधार: 1955–56 के हिंदू कोड विधेयकों ने हिंदू व्यक्तिगत कानून में महत्वपूर्ण सुधार किए। यह व्यक्तिगत कानूनों में क्रमिक और समुदाय-विशिष्ट सुधार के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • न्यायिक विकास: शाह बानो मामला (1985) और सरला मुद्गल मामला (1995) ने भरण-पोषण तथा व्यक्तिगत कानूनों के दुरुपयोग के संदर्भ में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता/वांछनीयता को रेखांकित किया।
    • शायरा बानो मामले (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक (ट्रिपल तलाक) को अमान्य घोषित किया, जिससे भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत कानून संबंधी प्रथाओं की संवैधानिक समीक्षा को बल मिला।
  • विधि आयोग: 21वें विधि आयोग के 2018 के ‘परिवार कानून में सुधार’ संबंधी परामर्श पत्र में कहा गया कि वर्तमान समय में यूसीसी “न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय” है। आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों के भेदभावपूर्ण पहलुओं में सुधार करने का समर्थन किया।
    • 22वें विधि आयोग ने 2023 में इस मुद्दे को फिर से उठाया और जनता तथा धार्मिक संगठनों से नई टिप्पणियाँ आमंत्रित की।

यूसीसी के पक्ष और विपक्ष में तर्क

आगे की राह

  • साक्ष्य-आधारित क्रियान्वयन: यूसीसी के आगे विस्तार से पहले उत्तराखंड के अनुभव और अन्य राज्यों में लागू किए गए ढाँचों के क्रियान्वयन का आकलन किया जाना चाहिए।
  • अधिकार-आधारित सुधार: यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि समान नागरिक नियम समानता, लैंगिक न्याय और व्यक्ति की गरिमा को बढ़ावा दें तथा संवैधानिक रूप से संरक्षित धार्मिक स्वतंत्रता के अनुरूप हों।
  • वैध विविधता का संरक्षण: जनजातीय समुदायों और संविधान द्वारा संरक्षित प्रथागत परंपराओं के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराए जाने चाहिए, साथ ही उन प्रथाओं का समाधान किया जाना चाहिए जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
  • समावेशी कानून-निर्माण: राज्यों, धार्मिक एवं जनजातीय समुदायों, महिला संगठनों और विधि विशेषज्ञों के साथ संरचित परामर्श किया जाना चाहिए। इसके बाद विधायी समीक्षा के माध्यम से ऐसा ढाँचा तैयार किया जाना चाहिए जो कानूनी रूप से टिकाऊ और सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो।

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