AASHVAST लैब्स

संदर्भ: भारतीय सेना पूरे भारत में छह AASHVAST प्रयोगशालाएँ स्थापित कर रही है, ताकि सैन्य ड्रोन में फर्मवेयर-स्तरीय और इलेक्ट्रॉनिक कमजोरियों का पता लगाया जा सके और उन्हें समाप्त किया जा सके। इनमें से एक प्रयोगशाला का पहले ही नई दिल्ली में उद्घाटन किया जा चुका है।

AASHVAST क्या है?

  • AASHVAST का पूर्ण रूप इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के हार्डवेयर की कमजोरियों और सुरक्षा खतरों का आकलन एवं विश्लेषण है।
  • यह इलेक्ट्रॉनिक एवं यांत्रिक अभियांत्रिकी महानिदेशालय (DG EME) के लिए QuickPay Pvt. Ltd. द्वारा विकसित एक फर्मवेयर विश्लेषण एवं सत्यापन सुइट है।
  • सेना ने छह प्रयोगशालाओं की योजना बनाई है, जिसमें दिल्ली स्थित सुविधा के बाद कम से कम पाँच और प्रयोगशालाएँ स्थापित की जानी हैं।
  • सेना ने अप्रैल 2026 में इलेक्ट्रॉनिक घटकों, जिनमें मानवरहित हवाई वाहन (UAV) के घटक भी शामिल हैं, में फर्मवेयर और अंतर्निहित प्रणालियों के सत्यापन के लिए अनुकूलित लाइसेंस प्राप्त सॉफ्टवेयर हेतु प्रस्ताव हेतु अनुरोध (RFP) भी जारी किया था।
  • प्रारंभ में, ये प्रयोगशालाएँ सैन्य ड्रोन की जाँच करेंगी, जबकि भविष्य में सेना द्वारा खरीदे गए CCTV कैमरों की भी जाँच की जा सकती है।

फर्मवेयर क्या है?

  • फर्मवेयर हार्डवेयर में अंतर्निहित विशेष सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी उपकरण को निम्न-स्तरीय नियंत्रण और बुनियादी संचालन संबंधी निर्देश प्रदान करता है।
  • विनिर्माण या सॉफ्टवेयर उन्नयन के दौरान इसमें कमजोरियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • छिपे हुए कोड, कमांड, पासवर्ड या स्थान/समय-आधारित नियंत्रण ड्रोन में खराबी उत्पन्न कर सकते हैं, उसके संचालन को समाप्त कर सकते हैं या उसे निर्धारित गंतव्य तक पहुँचने से रोक सकते हैं।

AASHVAST का महत्व

  • एक महत्वपूर्ण सुरक्षा अंतर को दूर करता है: यह फर्मवेयर-स्तर की सुरक्षा जाँच को सक्षम बनाता है, जो सेना द्वारा खरीदे गए ड्रोन में नियमित रूप से नहीं की जाती थी।
  • छिपी हुई कमजोरियों का पता लगाता है: यह प्रणाली लगभग 14 प्रकार की कमजोरियों की पहचान कर सकती है, जिनमें भू-स्थानिक, समय-आधारित और छिपे हुए कोड से संबंधित कमजोरियाँ शामिल हैं।
  • साइबर प्रत्यास्थता को मजबूत करता है: यह छिपे हुए पासवर्ड, अंतर्निहित कुंजियों, दूरस्थ पहुँच उपकरणों और स्थान-आधारित सुरक्षा नियंत्रणों का पता लगा सकता है, जिससे शत्रुतापूर्ण हस्तक्षेप के जोखिम को कम किया जा सकता है।
  • आपूर्ति-श्रृंखला से जुड़े जोखिमों का समाधान करता है: ये प्रयोगशालाएँ चीनी और अन्य विदेशी मूल के सक्रिय घटकों की जाँच कर सकती हैं, जिससे ऐसे घटकों की पहचान करने में मदद मिलती है, जिनका वास्तविक मूल खरीद चालानों से स्पष्ट नहीं हो सकता है।

    आईआईटी रोपड़ के निदेशक को नेशनल सिस्टम्स गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया

    संदर्भ: आईआईटी रोपड़ के निदेशक प्रो. राजीव आहूजा को सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग में उनके योगदान के लिए सिस्टम्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (SSI) द्वारा नेशनल सिस्टम्स गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया है।

    नेशनल सिस्टम्स गोल्ड मेडल के बारे में

    • यह सिस्टम्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (SSI) द्वारा स्थापित सर्वोच्च पुरस्कार है।
    • यह सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग की किसी भी शाखा में महत्वपूर्ण योगदान के लिए किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति को प्रदान किया जाता है।
    • यह पदक प्रो. राजीव आहूजा को 21–23 सितंबर 2026 के दौरान आयोजित 49वें (इंटर) नेशनल सिस्टम्स कॉन्फ्रेंस में दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट, आगरा में प्रदान किया गया।
    • ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (1997) और के. सिवन (2018) इसके प्रमुख प्राप्तकर्ताओं में शामिल हैं।
    • सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग नियंत्रण प्रणालियों, एयरोस्पेस प्रणालियों और बड़े पैमाने पर प्रणाली विकास जैसे क्षेत्रों में समग्र प्रणाली दृष्टिकोण को लागू करता है।

    सिस्टम्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (SSI) के बारे में

    • SSI को 1982 में इंजीनियरिंग, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन और कला विषयों के इंजीनियरों एवं वैज्ञानिकों के एक पेशेवर निकाय के रूप में औपचारिक रूप से पंजीकृत किया गया था।
    • प्रो. पी.एस. सत्संगी इसके संस्थापक अध्यक्ष थे और उन्हें भारत में सिस्टम्स आंदोलन का जनक माना जाता है।
    • SSI सामाजिक उन्नति के लिए सिस्टम्स दृष्टिकोण के सिद्धांत, अनुसंधान, अनुप्रयोग और व्यवहार को बढ़ावा देता है।
    • यह सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाने तथा इसके अनुप्रयोगों को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक वर्ष नेशनल सिस्टम्स कॉन्फ्रेंस आयोजित करता है।
    • SSI के अन्य सम्मानों में डॉयन्स ऑफ सिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग अवॉर्ड, लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, राजकुमार वर्ष्णेय अवॉर्ड, SSI विक्रम अवॉर्ड और यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड शामिल हैं।

    ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी पर NRIDA–IIM कोलकाता अध्ययन

    संदर्भ: राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना विकास एजेंसी (NRIDA) और भारतीय प्रबंधन संस्थान कोलकाता (IIM Kolkata) ने PMGSY-IV और पीएम-जनमन के तहत निर्मित सड़कों के चार वर्षीय दीर्घकालिक प्रभाव आकलन अध्ययन के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

    अध्ययन की प्रमुख विशेषताएँ

    • अवधि: चार वर्ष, जिसमें समय के साथ होने वाले परिवर्तनों को मापने के लिए दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।
    • कवरेज: 10 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश, 50 जिले, 150 ब्लॉक और 250 सड़कें।
    • राज्य/केंद्र शासित प्रदेश: आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, सिक्किम और उत्तराखंड।
    • परिवार: लगभग 5,000 परिवारों का सर्वेक्षण किया जाएगा।
    • सर्वेक्षण डिजाइन:
      • आधारभूत सर्वेक्षण (निर्माण-पूर्व): 14 महीने
      • संक्रमण अवधि: लगभग 12 महीने
      • अंतिम सर्वेक्षण (निर्माण-पश्चात): 22 महीने
    • प्रभाव के क्षेत्र: गतिशीलता, पहुँच, आजीविका, रोजगार, आय में विविधीकरण, कृषि, गैर-कृषि गतिविधियाँ, बाजार तक पहुँच, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, महिला सशक्तीकरण और परिवार का कल्याण।
    • अध्ययन मेंयात्रा समय, परिवहन लागत, प्रवासन के पैटर्न तथा आवश्यक सार्वजनिक और वित्तीय सेवाओं तक पहुँच का भी आकलन किया जाएगा। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों और कमजोर वर्गों के बीच होने वाले अंतर का भी अध्ययन किया जाएगा।
    • अध्ययन के निष्कर्षों सेकार्यक्रम की समीक्षा, परिणामों की निगरानी, साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और भविष्य में ग्रामीण अवसंरचना की योजना बनाने में सहायता मिलने की अपेक्षा है।

    प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना – IV (PMGSY-IV) के बारे में

    • अवधि: वित्तीय वर्ष 2024-25 से 2028-29 तक।
    • कुल परिव्यय: ₹70,125 करोड़ — केंद्रीय हिस्सा ₹49,087.50 करोड़ और राज्य का हिस्सा ₹21,037.50 करोड़।
    • लक्ष्य: 25,000 असंबद्ध बसावटों को 62,500 किमी लंबी बारहमासी सड़कों से जोड़ना।
    • जनसंख्या मानदंड: मैदानी क्षेत्रों में 500+, पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 250+, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों में 100+ तथा निर्दिष्ट विशेष श्रेणी वाले क्षेत्रों में निर्धारित मानदंड के अनुसार जनसंख्या।
    • सड़क नियोजन के लिए PM गति शक्ति पोर्टल का उपयोग किया जाएगा, जबकि निर्माण में कोल्ड मिक्स टेक्नोलॉजी, अपशिष्ट प्लास्टिक और फुल डेप्थ रिक्लेमेशन जैसी तकनीकों को शामिल किया जाएगा।

    प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (PM JANMAN) के बारे में

      • शुरुआत: 15 नवंबर 2023
      • परिव्यय: ₹24,104 करोड़
      • लक्षित समूह: विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTGs), जो 18 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में निवास करते हैं।
      • इसका ध्यान आवास, पेयजल, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, मोबाइल कनेक्टिविटी और आजीविका के अवसरों में सुधार पर है।
      • इसके अवसंरचना घटक के तहत लगभग 6,500 PVTG गाँवों को जोड़ने के लिए 8,000 किमी लंबी बारहमासी सड़कों का लक्ष्य रखा गया है।
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