नासा का PRAXIS मिशन

संदर्भ: नासा ने PRAXIS (प्लैनेटरी रिंग्स ऑटोनॉमस एक्सप्लोरेशन विद इन-सिटू सैंपलिंग) को अपने नासा इनोवेटिव एडवांस्ड कॉन्सेप्ट्स (NIAC) कार्यक्रम के तहत चरण-I अवधारणा के रूप में चुना है। इसका उद्देश्य भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों का अन्वेषण करना है।

PRAXIS मिशन के बारे में

  • सिंहावलोकन
    • विकासकर्ता: एनआईएसी कार्यक्रम के तहत नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के मार्को क्वाड्रेली द्वारा प्रस्तावित।
    • उद्देश्य: यदि इसे अंततः विकसित किया जाता है, तो PRAXIS शनि के वलयों से मिलीमीटर से सेंटीमीटर आकार के कणों के यथास्थान नमूने सीधे एकत्र करने वाला पहला मिशन बन सकता है। इससे वैज्ञानिकों को उनके उद्गम, संघटन और विकास को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
  • प्रमुख विशेषताएँ
    • वलय-सन्निकट अन्वेषण: अंतरिक्षयान को शनि के वलयों के ठीक ऊपर से उड़ान भरते हुए वलयों को “स्पर्श करते हुए आगे बढ़ने” के लिए डिजाइन किया गया है। इससे वलय तल से लंबे समय तक गुजरे बिना निकट-दूरी से अवलोकन संभव होगा।
    • स्पर्श एवं वापसी द्वारा नमूना संग्रह: यह एक लंबे, मुलायम और फैलाए जा सकने वाले बूम का उपयोग करके वलयों को थोड़े समय के लिए स्पर्श करेगा और नमूने एकत्र करेगा, जबकि अंतरिक्षयान से सुरक्षित दूरी बनाए रखेगा।
    • स्वायत्त नेविगेशन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम स्वायत्त नेविगेशन उपयुक्त नमूना संग्रह स्थानों की पहचान करेगा और लगातार बदलते वलय वातावरण में अंतरिक्षयान का मार्गदर्शन करेगा।
    • बहु-क्षेत्रीय नमूना संग्रह: एक नमूना एकत्र करने के बाद, अंतरिक्षयान को अलग-अलग वातावरणों से अतिरिक्त नमूने प्राप्त करने के लिए वलय के किसी अन्य क्षेत्र या अंतराल में जाने के लिए डिजाइन किया गया है।
    • वलय विज्ञान को आगे बढ़ाना: इस मिशन का उद्देश्य घनत्व तरंगों, प्रोपेलरों, स्व-गुरुत्वाकर्षण वेक्स तथा अंतराल के किनारों जैसी अभी तक अनसुलझी वलय विशेषताओं का अध्ययन करना है। यह नासा के कैसिनी मिशन द्वारा की गई खोजों पर आधारित होगा।
    • भविष्य के अनुप्रयोग: विकसित की गई प्रौद्योगिकियाँ भविष्य में अरुण ग्रह की वलय प्रणाली के अन्वेषण में सहायता कर सकती हैं, जिसमें नासा के प्रस्तावित अरुण ग्रह प्रोब मिशन में संभावित उपयोग भी शामिल है।

नासा इनोवेटिव एडवांस्ड कॉन्सेप्ट्स (NIAC) कार्यक्रम के बारे में

  • यह नासा के अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी मिशन निदेशालय (STMD) का एक कार्यक्रम है, जो ऐसे प्रारंभिक चरण के, उच्च जोखिम और उच्च प्रभाव वाले अवधारणाओं को समर्थन देता है, जिनमें भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण को बदलने की क्षमता हो।
  • चरण-I नवीन मिशन विचारों की वैज्ञानिक और तकनीकी व्यवहार्यता का मूल्यांकन करने के लिए अवधारणा अध्ययन, सिमुलेशन और प्रारंभिक प्रणाली डिजाइन हेतु वित्तपोषण प्रदान करता है।
  • NIAC के तहत चयन का अर्थ मिशन की स्वीकृति नहीं है; केवल सीमित संख्या में अवधारणाएँ आगे के चरणों तक पहुँचती हैं और अंततः परिचालन मिशनों के रूप में विकसित की जा सकती हैं।

संत शिरोमणि गुरु रविदास की 650वीं जयंती

संदर्भ: भारत निर्गुण भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतों में से एक संत शिरोमणि गुरु रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती मना रहा है। उन्हें समानता, भक्ति और सामाजिक न्याय के अपने संदेश के लिए स्मरण किया जाता है।

संत गुरु रविदास के बारे में

  • पहचान: 15वीं शताब्दी के एक प्रमुख भक्ति संत, रहस्यवादी कवि और समाज सुधारक, जिनका संबंध सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी) से था।
  • परंपरा: उन्हें परंपरागत रूप से रामानंद का शिष्य तथा कबीर का समकालीन माना जाता है; परंपरा के अनुसार मीराबाई ने उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया था।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने लोकभाषाओं में भक्ति पदों की रचना की। उनके 41 पद गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं, जबकि कई अन्य पद पंचवाणी में मिलते हैं।
  • भक्ति परंपरा: वे निर्गुण भक्ति के प्रमुख प्रवर्तक थे, जो कर्मकांड और मूर्ति पूजा के स्थान पर निराकार ईश्वर की भक्ति पर बल देते थे।

शिक्षाएँ और विरासत

  • समानता एवं सामाजिक न्याय: उन्होंने जातिगत पदानुक्रम और अस्पृश्यता को अस्वीकार किया तथा कहा कि व्यक्ति का मूल्य जन्म के बजाय उसके कर्मों पर निर्भर करता है।
  • आंतरिक आध्यात्मिकता: उन्होंने कर्मकांड और तीर्थयात्राओं के स्थान पर मन की शुद्धता, सच्ची भक्ति और नैतिक आचरण पर बल दिया।
  • बेगमपुरा: उन्होंने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की जो दुःख, भय, जातिगत भेदभाव और असमानता से मुक्त हो।
  • स्थायी विरासत: उनकी शिक्षाएँ आज भी सामाजिक न्याय, गरिमा, समानता और वंचित समुदायों के सशक्तीकरण के आंदोलनों को प्रेरित करती हैं तथा समानता, बंधुता और मानव गरिमा के संवैधानिक आदर्शों को बढ़ावा देती हैं।

शहीद ऊधम सिंह शहादत दिवस

संदर्भ: देश ने भारत के प्रमुख क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों में से एक शहीद ऊधम सिंह का 87वाँ शहादत दिवस (31 जुलाई) मनाया। उन्हें 1940 में अंग्रेजों द्वारा फाँसी दी गई थी।

शहीद ऊधम सिंह के बारे में

  • जन्म एवं प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म 26 दिसंबर 1899 को सुनाम (पंजाब) में शेर सिंह के रूप में हुआ था। कम उम्र में ही वे अनाथ हो गए और बाद में उन्हें सेंट्रल खालसा अनाथालय, अमृतसर में दाखिल कराया गया, जहाँ उनका नाम बदलकर ऊधम सिंह रखा गया।
  • क्रांतिकारी प्रेरणा: जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) ने उनकी क्रांतिकारी विचारधारा को गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों से बदला लेने का संकल्प लिया।
  • क्रांतिकारी गतिविधियाँ: उन्हें परंपरागत रूप से गदर पार्टी से जुड़ा माना जाता है और बाद में उनका संबंध हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से भी रहा। उन्होंने विदेशों में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों से संपर्क बनाए रखने के लिए अफ्रीका, मध्य पूर्व, यूरोप और उत्तरी अमेरिका की यात्राएँ कीं।
  • कारावास: शस्त्र अधिनियम के तहत बिना लाइसेंस के आग्नेयास्त्र रखने के आरोप में उन्हें 1927 में गिरफ्तार किया गया। वे 1931 तक जेल में रहे, जिसके बाद उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियाँ फिर से शुरू कर दीं।
  • माइकल ओडायर की हत्या: 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में उन्होंने पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ’डायर की हत्या कर दी। ऊधम सिंह उन्हें जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए राजनीतिक रूप से जिम्मेदार मानते थे। (जनरल रेजिनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में गोली चलाने का आदेश दिया था।)
  • फाँसी: उन्हें 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविले जेल में फाँसी दी गई।
  • पार्थिव अवशेषों की भारत वापसी: उनके पार्थिव अवशेषों को 1974 में राजकीय सम्मान के साथ भारत लाया गया, जहाँ उनका सम्मान के साथ स्वागत किया गया।

विरासत एवं योगदान

  • क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के प्रतीक: उनका बलिदान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध और भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का शक्तिशाली प्रतीक बन गया।
  • राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’: अपने मुकदमे के दौरान उन्होंने ‘राम मोहम्मद सिंह आज़ाद’ नाम अपनाया, जो हिंदू धर्म, इस्लाम और सिख धर्म की एकता तथा भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समावेशी स्वरूप का प्रतीक था।
  • स्थायी विरासत: उन्हें ‘शहीद-ए-आज़म ऊधम सिंह’ के रूप में याद किया जाता है। उनका जीवन आज भी देशभक्ति, साहस, सांप्रदायिक सद्भाव और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए प्रेरित करता है तथा जलियांवाला बाग हत्याकांड की स्मृति को जीवंत रखता है।

पिंगली वेंकैया की 150वीं जयंती

संदर्भ: प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया की 150वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और भारत के राष्ट्रीय ध्वज के डिजाइन में उनके महत्वपूर्ण योगदान को याद किया।

पिंगली वेंकैया के बारे में

  • प्रारंभिक जीवन: उनका जन्म 2 अगस्त 1876 को भटलापेनुमर्रु (वर्तमान कृष्णा जिला, आंध्र प्रदेश) में हुआ था।
  • स्वतंत्रता सेनानी: वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल रहे। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई अधिवेशनों में भाग लिया और भारत के लिए राष्ट्रीय ध्वज अपनाने की पुरजोर वकालत की।
  • सैन्य सेवा: उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में द्वितीय बोअर युद्ध (1899–1902) के दौरान ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा दी, जहाँ उनका संपर्क महात्मा गांधी से हुआ और उनमें राष्ट्रीय ध्वजों के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई।
  • विद्वान एवं बहुमुखी प्रतिभा के धनी: वे भाषाविद्, कृषिविज्ञानी, भूविज्ञानी और शिक्षाविद् थे। उन्हें जापानी भाषा में दक्षता के कारण ‘जापान वेंकैया’, कपास पर शोध के कारण ‘पट्टी (कॉटन) वेंकैया’ और हीरा भूविज्ञान पर कार्य के कारण ‘डायमंड वेंकैया’ की उपाधियाँ मिलीं।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने ‘ए नेशनल फ्लैग फॉर इंडिया’ (1916) नामक पुस्तक लिखी, जिसमें लगभग 30 डिजाइनों को प्रस्तुत किया गया और भारत के लिए एक विशिष्ट राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता पर बल दिया गया।

राष्ट्रीय ध्वज में योगदान

  • मूल डिजाइन (1921): वर्ष 1921 में बेजवाड़ा (वर्तमान विजयवाड़ा) में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) के अधिवेशन में पिंगली वेंकैया ने लाल (बाद में भगवा) और हरे रंग की पट्टियों वाले ध्वज को महात्मा गांधी के समक्ष प्रस्तुत किया।
  • तिरंगे का विकास: गांधीजी के सुझाव पर इसमें सफेद पट्टी और चरखा जोड़ा गया, जो शांति, सभी समुदायों की भागीदारी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।
  • वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज की नींव: वेंकैया का डिजाइन वर्ष 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अपनाए गए तिरंगे का आधार बना।
    • इसके बाद संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को वर्तमान राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया, जिसमें चरखे के स्थान पर अशोक चक्र शामिल किया गया।
  • विरासत: उन्हें सम्मानपूर्वक ‘झंडा वेंकैया’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें भारतीय तिरंगे के मुख्य वास्तुकार के रूप में याद किया जाता है, जो एकता, बलिदान, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय पहचान का स्थायी प्रतीक है।
    • 2009 में डाक विभाग ने राष्ट्रीय ध्वज में उनके योगदान के सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026

संदर्भ: जन्म और मृत्यु का पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। इसका उद्देश्य लंबे विलंब के बाद जन्म और मृत्यु के पंजीकरण के लिए अधिक न्यायिक जांच शुरू करके विलंबित पंजीकरण की व्यवस्था को मजबूत करना है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • दो वर्ष तक कोई परिवर्तन नहीं: घटना की तारीख से दो वर्ष तक जन्म और मृत्यु के विलंबित पंजीकरण की मौजूदा प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
  • दो वर्ष से अधिक समय बाद न्यायिक स्वीकृति: घटना के दो वर्ष से अधिक समय बाद रिपोर्ट किए गए जन्म या मृत्यु का पंजीकरण केवल प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) या महानगरीय मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही किया जा सकेगा। यह पहले की उस व्यवस्था को बदलता है, जिसमें कार्यकारी मजिस्ट्रेट की स्वीकृति से पंजीकरण की अनुमति थी।
  • न्यायिक निगरानी को मजबूत करना: संशोधन का उद्देश्य अधिक न्यायिक जांच शुरू करके नागरिक पंजीकरण प्रणाली की विश्वसनीयता को मजबूत करना है, जिससे फर्जी या मनगढ़ंत पंजीकरण की संभावना कम हो सके।
  • कानूनी पहचान को मजबूत करना: यह संशोधन समय पर जन्म पंजीकरण के महत्व को मजबूत करता है, क्योंकि जन्म प्रमाण-पत्र विभिन्न सार्वजनिक सेवाओं और सरकारी लाभों तक पहुँच के लिए कानूनी पहचान के मूल प्रमाण के रूप में कार्य करता है।

जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अधिनियम, 1969 के बारे में

  • उद्देश्य: पूरे भारत में जन्म और मृत्यु के अनिवार्य पंजीकरण के लिए कानूनी ढाँचा प्रदान करना।
  • नोडल प्राधिकरण: इसे गृह मंत्रालय (MHA) के अंतर्गत भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) द्वारा राज्यों की सरकारों द्वारा नियुक्त मुख्य रजिस्ट्रारों और स्थानीय रजिस्ट्रारों के समन्वय से लागू किया जाता है।
  • विधायी अधिकारिता: जन्म और मृत्यु का पंजीकरण सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (सूची-III) की प्रविष्टि 30 के अंतर्गत आता है, जिससे संसद और राज्य विधानमंडल दोनों इस विषय पर कानून बना सकते हैं।
  • पंजीकरण की समय-सीमा
    • 21 दिनों के भीतर: बिना किसी विलंब शुल्क के पंजीकरण।
    • 30 दिनों के बाद लेकिन एक वर्ष के भीतर: निर्धारित प्राधिकारी की लिखित अनुमति और निर्धारित विलंब शुल्क के भुगतान के साथ ही पंजीकरण।
    • एक वर्ष के बाद लेकिन दो वर्ष के भीतर: जिला मजिस्ट्रेट या अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत अधिकारी) की लिखित अनुमति और निर्धारित विलंब शुल्क के भुगतान के साथ ही पंजीकरण।
    • दो वर्ष से अधिक समय बाद (प्रस्तावित संशोधन): पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) या महानगरीय मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होगी। यह कार्यकारी मजिस्ट्रेट की स्वीकृति की मौजूदा आवश्यकता को प्रतिस्थापित करेगा।
  • 2023 का संशोधन: 2023 के संशोधन ने पंजीकृत जन्म और मृत्यु के राष्ट्रीय और राज्य स्तर के इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस स्थापित किए तथा जन्म प्रमाण-पत्र को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश, मतदाता सूची तैयार करने, आधार, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस, विवाह पंजीकरण, सरकारी सेवाओं में नियुक्ति और अन्य अधिसूचित उद्देश्यों के लिए एकल दस्तावेज के रूप में उपयोग करने में सक्षम बनाया।

संसदीय पैनल ने आर्कटिक क्षेत्र में अधिक सशक्त भागीदारी की सिफारिश की

संदर्भ: विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि भारत ध्रुवीय राजदूत नियुक्त करे और आर्कटिक परिषद का पूर्ण सदस्य बनने की दिशा में काम करे, ताकि ध्रुवीय क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक, रणनीतिक और कूटनीतिक भागीदारी को मजबूत किया जा सके।

संसदीय समिति की प्रमुख सिफारिशें

  • ध्रुवीय राजदूत की नियुक्ति: आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भारत की भागीदारी के समन्वय, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने तथा ध्रुवीय शासन में भारत के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक समर्पित कूटनीतिक पद बनाया जाए।
  • आर्कटिक परिषद की पूर्ण सदस्यता का प्रयास: पर्यवेक्षक राज्य के रूप में अपनी वर्तमान स्थिति जारी रखते हुए भारत को परिषद की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।
  • वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व को मजबूत करना: समिति ने सिफारिश की कि भारत आर्कटिक शासन और उभरते ध्रुवीय मुद्दों में वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए उपयुक्त रणनीति अपनाए।
  • एशियाई पर्यवेक्षक देशों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना: समिति ने भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर को शामिल करते हुए चतुष्पक्षीय ढाँचे के माध्यम से एशियाई पर्यवेक्षक देशों के बीच अधिक सहयोग का सुझाव दिया।

आर्कटिक क्षेत्र में भारत की भागीदारी

  • आर्कटिक नीति: भारत ने 2022 में आर्कटिक नीति अपनाई, जिसके छह स्तंभ हैं—विज्ञान एवं अनुसंधान, जलवायु एवं पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक एवं मानव विकास, परिवहन एवं संपर्क, शासन एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा राष्ट्रीय क्षमता निर्माण।
  • पर्यवेक्षक का दर्जा: भारत 2013 से आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक है।
  • वैज्ञानिक उपस्थिति: भारत 2008 से नॉर्वे के स्वालबार्ड स्थित न्य-ऑलेसुंड में ‘हिमाद्रि’ आर्कटिक अनुसंधान केंद्र संचालित कर रहा है, जो जलवायु परिवर्तन, वायुमंडलीय विज्ञान, हिमनद विज्ञान और ध्रुवीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर अनुसंधान में सहायता करता है।
  • नोडल मंत्रालय: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) भारत के आर्कटिक अनुसंधान और ध्रुवीय कार्यक्रमों के लिए नोडल मंत्रालय है।

आर्कटिक परिषद के बारे में

  • स्थापना: आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग के लिए प्रमुख अंतर-सरकारी मंच के रूप में ओटावा घोषणा के माध्यम से 1996 में स्थापित।
  • उद्देश्य: सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मुद्दों पर आर्कटिक राज्यों, स्वदेशी लोगों और अन्य आर्कटिक निवासियों के बीच सहयोग, समन्वय और संवाद को बढ़ावा देना।
  • सदस्य: इसमें आठ आर्कटिक राज्य शामिल हैं—कनाडा, डेनमार्क (ग्रीनलैंड सहित), फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका।
  • स्थायी प्रतिभागी: आर्कटिक के स्वदेशी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले छह संगठन स्थायी प्रतिभागियों के रूप में भाग लेते हैं, जिससे परिषद के कार्यों में उनका पूर्ण परामर्श और सहभागिता सुनिश्चित होती है।
  • पर्यवेक्षक: इसमें गैर-आर्कटिक राज्य, अंतर-सरकारी संगठन और गैर-सरकारी संगठन शामिल हैं।
  • निर्णय-निर्माण: निर्णय आठ आर्कटिक राज्यों के बीच सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिसमें स्थायी प्रतिभागियों का पूर्ण परामर्श और सहभागिता सुनिश्चित की जाती है।

BMIP के अंतर्गत संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) बीमा

संदर्भ: वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) ने भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल (BMIP) के अंतर्गत भारत का पहला संप्रभु-समर्थित संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) बीमा उत्पाद शुरू किया है। इसका उद्देश्य घरेलू समुद्री बीमा को मजबूत करना और विदेशी बीमा कंपनियों पर निर्भरता कम करना है।

संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) बीमा उत्पाद के बारे में

सिंहावलोकन

  • अर्थ: यह एक विशेष प्रकार का समुद्री देयता बीमा है, जो जहाज मालिकों और संचालकों को हुल एवं मशीनरी (H&M) बीमा के अंतर्गत शामिल न होने वाली तृतीय-पक्ष देयताओं से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • उद्देश्य: यह समुद्री संचालन से उत्पन्न कानूनी क्षतिपूर्ति और परिचालन संबंधी देयताओं के विरुद्ध वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है।

प्रमुख विशेषताएँ

  • कवरेज: यह निम्नलिखित तृतीय-पक्ष देयताओं को कवर करता है:
    • चालक दल/यात्रियों की चोट, बीमारी, मृत्यु और स्वदेश वापसी।
    • माल की हानि या क्षति।
    • तेल प्रदूषण और पर्यावरणीय देयताएँ।
    • मलबा हटाना, टक्कर से संबंधित देयताएँ, कानूनी लागत, जुर्माने और अन्य समुद्री दावे।
  • H&M बीमा का पूरक: जहाँ H&M बीमा जहाज को होने वाली भौतिक क्षति को कवर करता है, वहीं P&I बीमा जहाज के संचालन से उत्पन्न तृतीय-पक्ष देयताओं को कवर करता है।
  • घरेलू संप्रभु-समर्थित कवरेज: यह विदेशी अंतरराष्ट्रीय समूह (IG) P&I क्लबों पर निर्भरता कम करता है और भू-राजनीतिक संकटों या प्रतिबंधों के दौरान निर्बाध देयता कवरेज सुनिश्चित करता है।
  • महत्व: यह समुद्री बीमा में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है और भारत की नौवहन क्षमता को मजबूत करता है।

भारत मैरिटाइम इंश्योरेंस पूल (BMIP) के बारे में

  • शुरुआत: केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद मई 2026 में वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) द्वारा इसे परिचालित किया गया।
  • उद्देश्य: भू-राजनीतिक व्यवधानों के दौरान भारतीय ध्वज वाले/नियंत्रित जहाजों और भारत के व्यापार को ले जाने वाले जहाजों के लिए निर्बाध समुद्री बीमा उपलब्ध कराना।
  • आवश्यकता: यह हाल के भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान प्रभावित होने वाले विदेशी समुद्री बीमाकर्ताओं पर निर्भरता को कम करता है।
  • भागीदारी: इसका संचालन 10 भारतीय गैर-जीवन बीमा कंपनियों द्वारा किया जाता है, जिसमें GIC Re पूल प्रशासक के रूप में कार्य करता है।
  • कवरेज: यह निम्नलिखित बीमा प्रदान करता है:
    • हल एवं मशीनरी (H&M) बीमा
    • कार्गो बीमा
    • संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (P&I) बीमा
    • युद्ध जोखिम बीमा
  • वित्तीय क्षमता:
    • अंडरराइटिंग क्षमता (बीमा पूल कि अधिकतम वित्तीय क्षमता): 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर।
    • आकस्मिक संप्रभु गारंटी: 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹12,980 करोड़)।
  • रणनीतिक महत्व: यह मैरीटाइम इंडिया विजन 2030, मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047, आत्मनिर्भर भारत तथा भारत के समुद्री जोखिम-प्रबंधन तंत्र को समर्थन प्रदान करता है।
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