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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।
संदर्भ: भारत के चमगादड़ों की स्थिति (SoIBats) 2024–25 रिपोर्ट के रूप में भारत का प्रथम राष्ट्रीय चमगादड़ मूल्यांकन प्रस्तुत किया गया है। यह रिपोर्ट रेखांकित करती है कि भारत में चमगादड़ों की लगभग 135 प्रजातियाँ निवास करती हैं, जिसके परिणामस्वरूप यह देश में स्तनधारियों का सबसे बड़ा गण बन गया है। इसके बावजूद, यह अध्ययन इस क्षेत्र में समर्पित अनुसंधान केंद्रों के अभाव और पर्याप्त डेटा की अनुपलब्धता जैसी गंभीर चुनौतियों को भी उजागर करता है।
भारत के चमगादड़ों की स्थिति (2024–25) रिपोर्ट के बारे में
- यह दो वर्षीय अध्ययन 27 संस्थानों के 34 विशेषज्ञों द्वारा किया गया है।
- SoIBats को नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (NCF) और बैट कंजर्वेशन इंटरनेशनल (BCI) के सहयोग से किया गया था।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

- डेटा की कमी और उपेक्षा: रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया है कि चमगादड़ों के संदर्भ में डेटा का अभाव और उनकी उपेक्षा एक प्रमुख चिंता का विषय है।
- लगभग 35 प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनका या तो मूल्यांकन नहीं किया गया है या उनके संबंध में डेटा अपर्याप्त है, जिसका अर्थ है कि संरक्षण की वर्तमान स्थिति का चित्र अधूरा है। डेटा की इस कमी के कारण प्रजातियों की स्थिति और उनसे जुड़े जोखिमों का सटीक मूल्यांकन करना कठिन हो जाता है।
- चमगादड़ों का पारिस्थितिक महत्व: चमगादड़ पौधों के परागण, फलों के बीजों के प्रसार, फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों के नियंत्रण और अपने मल (ग़ुआनो) के माध्यम से मिट्टी को पोषण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी ये पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ सीधे तौर पर कृषि, जैव विविधता और मृदा स्वास्थ्य का समर्थन करती हैं।

- स्थानिकता और खतरे की स्थिति: चमगादड़ों की 135 प्रजातियों में से 16 प्रजातियाँ स्थानिक हैं (लगभग 12 प्रतिशत), जिसका अर्थ है कि वे केवल भारत में ही पाई जाती हैं।
- इनमें से सात प्रजातियों को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट द्वारा ‘संकटग्रस्त की श्रेणियों’ के तहत सूचीबद्ध किया गया है।
- वितरण और विविधता का स्वरूप: रिपोर्ट में वितरण के मामले में महत्वपूर्ण अंतर-परिवर्तनशीलता दर्ज की गई है। पश्चिम बंगाल 68 प्रजातियों के साथ शीर्ष पर है, इसके बाद मेघालय (66), उत्तराखंड (52), सिक्किम (43) और केरल एवं कर्नाटक (प्रत्येक में 41) का स्थान है।
- इसके विपरीत, हरियाणा और पंजाब में केवल पाँच प्रजातियाँ दर्ज की गईं, जिसका मुख्य कारण सीमित वन क्षेत्र और कृषि विस्तार है।
- एक महत्वपूर्ण शहरी अंतर्दृष्टि यह है कि शहरीकरण के भारी दबाव के बावजूद दिल्ली में 15 चमगादड़ प्रजातियाँ दर्ज की गईं। यह उनकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही आवास के तनाव की ओर भी संकेत करता है।
- बसेरा करने का व्यवहार और पर्यावास: चमगादड़ प्राकृतिक आवासों और मानव निर्मित संरचनाओं, दोनों में बसेरा करते पाए गए। गुफाएँ और पेड़ सबसे सामान्य बसेरा स्थल हैं, जहाँ गुफाएँ एक स्थिर सूक्ष्म जलवायु और पर्यावरणीय उतार-चढ़ाव एवं शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण महाबलेश्वर की रॉबर्स केव है, जहाँ प्रजनन काल के दौरान ‘फिलिप्स लॉन्ग-फिंगर्ड बैट’ के लगभग 1 लाख जीव निवास करते हैं।
- कुछ प्रजातियाँ अत्यधिक ‘आवास विशिष्टता’ प्रदर्शित करती हैं। उदाहरण के तौर पर, गंभीर रूप से संकटग्रस्त हिपोसिडेरोस हाइपोफिलस (Hipposideros hypophyllus) कर्नाटक के कोलार जिले में एक ग्रेनाइट पहाड़ी की तलहटी में स्थित केवल एक ही गुफा में पाई जाती है।
- क्षेत्रीय अनुसंधान पूर्वाग्रह: चमगादड़ों की पारिस्थितिकी और जीव विज्ञान पर अधिकांश अध्ययन दक्षिणी राज्यों, विशेष रूप से पश्चिमी घाट जैव विविधता हॉटस्पॉट में केंद्रित हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत के बड़े हिस्से अनुसंधान की दृष्टि से उपेक्षित रह गए हैं।
चमगादड़ प्रजातियों के लिए खतरे
- शहरीकरण, वनों की कटाई, भूमि-उपयोग में परिवर्तन और जलवायु परिवर्तन प्रमुख कारक हैं जो चमगादड़ों की आबादी को प्रभावित कर रहे हैं।
- खनन गतिविधियाँ और शिकार कुछ विशिष्ट प्रजातियों के लिए प्रत्यक्ष खतरा पैदा करते हैं, विशेष रूप से उन प्रजातियों के लिए जिनके आवास सीमित हैं।
- चमगादड़ों के प्रति सार्वजनिक दृष्टिकोण में नकारात्मकता आई है, विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के बाद, जिससे उनके प्रति सामाजिक कलंक (stigma) और उत्पीड़न बढ़ा है।
- चमगादड़ों को अक्सर केवल बीमारी फैलाने वाले जीवों के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। उनके पारिस्थितिक महत्व की अनदेखी करने से उनके संरक्षण की चुनौतियाँ और भी गंभीर हो जाती हैं।
प्रमुख सिफारिशें
- डेटा अंतराल को दूर करने के लिए विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अनुसंधान बढ़ाना जहाँ अभी तक कम अध्ययन हुआ है।
- पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट में रोग की निगरानी प्रणालियों को मजबूत करना।
- सामाजिक पूर्वाग्रह को कम करने और चमगादड़ों की पारिस्थितिक भूमिका के बारे में समझ बढ़ाने के लिए सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना।
- सरकारी एजेंसियों, शोधकर्ताओं और संरक्षण संगठनों के बीच आपसी सहयोग को प्रोत्साहित करना।
- गुफाओं और वनों जैसे महत्वपूर्ण बसेरा स्थलों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित करना।
चमगादड़ों के बारे में
- चमगादड़ चिरोप्टेरा गण से संबंधित हैं और ये एकमात्र ऐसे स्तनधारी हैं जो वास्तविक उड़ान भरने में सक्षम हैं।
- इनके आकार में अद्भुत भिन्नता पाई जाती है; जहाँ एक ओर फ्लाइंग फॉक्स होते हैं जिनका पंख-विस्तार 2 मीटर तक और वजन 1.5 किलोग्राम तक हो सकता है, वहीं दूसरी ओर बम्बलबी बैट है जिसका वजन मात्र 2 ग्राम होता है—यह विश्व का सबसे छोटा स्तनधारी जीव है।
प्रमुख विशेषताएँ:

- प्रतिध्वनि निर्धारण (Echolocation): अधिकांश ‘माइक्रोबेट्स’ प्रतिध्वनि निर्धारण का उपयोग करते हैं, जो एक अत्यंत परिष्कृत जैविक सोनार है। इसमें वे पराबैंगनी तरंगें (20–200 kHz) उत्सर्जित करते हैं और शिकार व दिशा का पता लगाने के लिए वापस आने वाली प्रतिध्वनि की व्याख्या करते हैं। प्रचलित धारणा के विपरीत, चमगादड़ अंधे नहीं होते हैं, और उनकी दृष्टि अलग-अलग प्रजातियों में भिन्न होती है।
- शारीरिक संरचना (Anatomy): उनका विशिष्ट रूप से उल्टा लटककर बसेरा करना एक अनुकूलन है जो उन्हें कुशलतापूर्वक उड़ान भरने में सक्षम बनाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पंख जमीन पर स्थिर स्थिति से उठ नहीं सकते हैं और उनके पिछले अंग दौड़ने के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं।
- चमगादड़ और जूनोटिक रोग (Zoonotic Diseases): चमगादड़ों को निपाह वायरस, हेंड्रा वायरस, मारबर्ग वायरस और सार्स (SARS) जैसे कोरोना वायरस सहित कई जूनोटिक रोगजनकों के भंडार के रूप में जाना जाता है।
- उनकी बड़ी कॉलोनियां, लंबी उम्र, मौसमी प्रवास, मिश्रित प्रजातियों का एक साथ बसेरा करना और ‘ट्रांसप्लासेंटल ट्रांसमिशन’ (गर्भाशय के माध्यम से संक्रमण) जैसी विशेषताएं वायरस के बने रहने और प्रसार को सुगम बनाती हैं।
- निपाह वायरस मुख्य रूप से टेरोपस वंश के फलभक्षी चमगादड़ों से संबद्ध है। इसका संक्रमण दूषित फलों या खजूर के कच्चे रस के माध्यम से होता है।
- यह रौसेट्टस फलभक्षी चमगादड़ों से संबंधित है, जबकि कोरोना वायरस आमतौर पर हॉर्सशू चमगादड़ों में पाए जाते हैं।
- विकासवादी परिप्रेक्ष्य: साक्ष्यों से पता चलता है कि चमगादड़ों का विकास लगभग 5.2 से 5 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। यह काल वैश्विक तापमान में वृद्धि और जूनोटिक वायरसों के उद्भव के समकालीन था, जो मेजबान और वायरस के बीच सह-विकास के एक लंबे इतिहास को इंगित करता है।
निष्कर्ष
भारत के चमगादड़ों की स्थिति (SoIBats) 2024–25 रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि अपने पारिस्थितिक महत्व और विविधता के बावजूद, भारत में चमगादड़ अभी भी उपेक्षित, अल्प-वित्तपोषित और अक्सर गलतफहमी का शिकार हैं। उनके संरक्षण को सुनिश्चित करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए डेटा की कमी को दूर करना, अनुसंधान बुनियादी ढांचे का विस्तार करना और महत्वपूर्ण आवासों की सुरक्षा करना अनिवार्य है।
