संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ एवं विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
संदर्भ: पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को सहायता प्रदान करने के लिए 17 सितंबर 2023 को शुरू की गई पीएम विश्वकर्मा योजना के कार्यान्वयन के तीन वर्ष पूरे हो गए हैं।
पीएम विश्वकर्मा योजना के बारे में
• इसे 17 सितंबर 2023 को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) द्वारा शुरू किया गया था।

• यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना है, जिसके लिए 2023–24 से 2027–28 की अवधि के लिए ₹13,000 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
• यह योजना 18 पारंपरिक व्यवसायों को शामिल करती है और इसका उद्देश्य असंगठित क्षेत्र में अपने हाथों और औजारों से काम करने वाले कारीगरों को समग्र एवं व्यापक सहायता प्रदान करना है।
• इसका उद्देश्य कारीगरों की उत्पादकता और आय में सुधार, संस्थागत ऋण तक पहुँच बढ़ाना तथा उन्हें घरेलू और वैश्विक बाजारों से जोड़ना है।
• यह योजना तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है:
- सम्मान (Samman): पहचान और गरिमा।
- सामर्थ्य (Samarthya): कौशल विकास और क्षमता संवर्धन।
- समृद्धि (Samriddhi): सतत आजीविका और समृद्धि।
• यह योजना गुरु-शिष्य परंपरा तथा पारंपरिक कौशल के परिवार-आधारित हस्तांतरण को भी सुदृढ़ करने का प्रयास करती है।
योजना की प्रमुख विशेषताएँ
• पहचान और कौशल विकास: सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने के बाद लाभार्थियों को पीएम विश्वकर्मा प्रमाण-पत्र और पहचान-पत्र प्रदान किया जाता है।
- बुनियादी प्रशिक्षण 5–7 दिनों का होता है, जबकि उन्नत प्रशिक्षण 15 दिनों या उससे अधिक अवधि का होता है।
- प्रशिक्षणार्थियों को ₹500 प्रतिदिन का वजीफा दिया जाता है।
- प्रशिक्षण में आधुनिक औजारों, बेहतर तकनीकों, डिजिटल लेन-देन, विपणन और उद्यमिता पर ध्यान दिया जाता है।
• टूलकिट और ऋण सहायता: पात्र लाभार्थियों को ₹15,000 तक मूल्य की आधुनिक टूलकिट प्रदान की जाती है।
- बिना किसी जमानत के उद्यम विकास ऋण के रूप में ₹3 लाख तक की राशि दो चरणों में प्रदान की जाती है।
- पहले चरण में 18 महीने की अवधि के लिए ₹1 लाख तक का ऋण दिया जाता है, जबकि दूसरे चरण में 30 महीने की अवधि के लिए ₹2 लाख तक का ऋण प्रदान किया जाता है।
- ऋण 5% वार्षिक की रियायती ब्याज दर पर उपलब्ध है, जिसमें सरकार द्वारा 8% तक की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाती है।
• डिजिटल और विपणन सहायता: लाभार्थियों को प्रत्येक पात्र डिजिटल लेन-देन के लिए ₹1 की प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जो अधिकतम 100 लेन-देन प्रति माह तक सीमित है।
- विपणन सहायता में व्यापार मेले, प्रदर्शनियाँ, ब्रांडिंग, प्रचार-प्रसार तथा सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) और डिजिटल वाणिज्य के लिए ओपन नेटवर्क (ONDC) जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुँच शामिल है।
• पात्रता और पंजीकरण: आवेदक की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए और वह अधिसूचित 18 पारंपरिक व्यवसायों में से किसी एक में स्व-रोजगार में संलग्न होना चाहिए।
- सामान्यतः एक परिवार के केवल एक सदस्य को पंजीकरण की अनुमति है।
- सरकारी कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य इस योजना के लिए पात्र नहीं हैं।
- आवेदन कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के माध्यम से किया जाता है और इसमें स्थानीय निकाय, जिला कार्यान्वयन समिति तथा स्क्रीनिंग समिति द्वारा तीन-स्तरीय सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाती है।
- अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक रूप देने में सहायता के लिए लाभार्थियों को उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म पर भी जोड़ा जाता है।
आवश्यकता और महत्व

• पारंपरिक कौशल का संरक्षण: यह गुरु-शिष्य परंपरा को सुदृढ़ करती है तथा परिवार-आधारित व्यवसायों की निरंतरता को बनाए रखने में सहायता करती है।
• आर्थिक सशक्तीकरण: आधुनिक औजारों, कौशल प्रशिक्षण और किफायती ऋण तक पहुँच से उत्पादकता, आय तथा उद्यमशीलता के अवसरों में सुधार हो सकता है।
• लक्ष्यों की प्राप्ति: सितंबर 2026 तक इस योजना के तहत 30 लाख लाभार्थियों का पंजीकरण किया जा चुका था। 24.37 लाख से अधिक कारीगरों ने बुनियादी कौशल प्रशिक्षण प्राप्त किया, जबकि 18.16 लाख से अधिक को टूलकिट प्रदान की जा चुकी थीं।
• आर्थिक प्रभाव के प्रमाण: आईआईएम मुंबई द्वारा 11,591 लाभार्थियों को शामिल करते हुए किए गए मूल्यांकन में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल 93% लाभार्थियों ने प्रशिक्षण के बाद अपनी आय में मध्यम से उल्लेखनीय वृद्धि की सूचना दी।
• वित्तीय और बाजार समावेशन: लगभग ₹5,316 करोड़ के मूल्य के 6.19 लाख से अधिक ऋण स्वीकृत किए जा चुके थे। 30,000 से अधिक लाभार्थियों को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा चुका था, जबकि दिल्ली हाट में आयोजित पहली राष्ट्रीय प्रदर्शनी में ₹2 करोड़ से अधिक की बिक्री दर्ज की गई।
चुनौतियाँ
• सीमित औपचारिकीकरण: अनौपचारिक रूप से संचालित गतिविधियाँ और जागरूकता की कमी संस्थागत वित्त तथा सरकारी सहायता तक पहुँच को सीमित कर सकती हैं।
• अपर्याप्त बाजार संपर्क: कमजोर ब्रांडिंग, पैकेजिंग और विपणन क्षमताएँ व्यापक बाजारों तक पहुँच को सीमित कर सकती हैं।
• प्रौद्योगिकी को अपनाना: कारीगरों को आधुनिक औजारों, डिजिटल भुगतान और उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
• पारंपरिक व्यवसायों की सततता: बड़े पैमाने पर उत्पादित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ताओं की बदलती पसंद युवा पीढ़ी को पारंपरिक शिल्प को जारी रखने से हतोत्साहित कर सकती है।
