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सामान्य अध्ययन – 1: अठारहवीं शताब्दी के मध्य से वर्तमान तक का आधुनिक भारतीय इतिहास – प्रमुख घटनाएँ, व्यक्तित्व एवं मुद्दे।

संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अन्य नेताओं ने आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि (9 जून) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की तथा आदिवासी अधिकारों, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध एवं सामाजिक न्याय में उनके योगदान को स्मरण किया।

बिरसा मुंडा के बारे में

  • प्रारंभिक जीवन: इनका जन्म 15 नवम्बर 1875 को छोटानागपुर क्षेत्र के उलीहातु में हुआ था।
    • वे मुंडा जनजाति से संबंधित थे तथा इन्होनें आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही गरीबी, विस्थापन एवं शोषण का प्रत्यक्ष अनुभव किया।
    • उन्होंने जर्मन मिशन स्कूल में शिक्षा प्राप्त की तथा कुछ समय के लिए ईसाई धर्म से जुड़े रहे, किंतु बाद में अपनी स्वदेशी परंपराओं की ओर लौट आए।
  • धार्मिक एवं सामाजिक सुधारक: उन्होंने बिरसैत धर्म की स्थापना की, जिसमें आदिवासी मान्यताओं, ईसाई धर्म एवं सुधारवादी विचारों के तत्वों का समन्वय था।
    • उन्होंने आदिवासी पहचान, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सुधार के पुनर्जागरण के लिए कार्य किया।
    • उन्होंने जबरन धार्मिक धर्मांतरण का विरोध किया तथा आदिवासी समुदायों को एक साझा सांस्कृतिक चेतना के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया।
    • अपने अनुयायियों से उन्हें “धरती आबा” (पृथ्वी के पिता) की उपाधि प्राप्त हुई।
  • उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन, शोषणकारी जमींदारों, जबरन श्रम(बेथ बेगारी), आदिवासी भूमि के हरण तथा आदिवासियों के सामाजिक एवं आर्थिक उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष किया।
  • उन्होंने जल, जंगल, जमीन की सुरक्षा एवं पारंपरिक आदिवासी अधिकारों की पुनर्स्थापना की वकालत की।
  • उनका प्रसिद्ध नारा था: “अबुआ राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना”  (अर्थात् हमारा शासन स्थापित हो और महारानी का शासन समाप्त हो।)
  • उलगुलान आंदोलन के नेता: उन्होंने 1899–1900 के दौरान छोटानागपुर पठार में प्रसिद्ध उलगुलान (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया।
    • उन्होंने मुंडा, उरांव, खड़िया तथा अन्य आदिवासी समूहों को औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संगठित किया।
    • उन्होंने “मुंडा दिसुम” की अवधारणा प्रस्तुत की, जो सभी प्रकार के शोषण एवं विदेशी प्रभुत्व से मुक्ति की परिकल्पना करती थी।
    • बिरसा ने “दिकुओं” (बाहरी लोगों) द्वारा किए जाने वाले शोषण का विरोध किया, जिनमें साहूकार, जमींदार, व्यापारी, मिशनरी एवं औपनिवेशिक अधिकारी शामिल थे।
    • उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध छापामार शैली के प्रतिरोध का उपयोग किया।
  • गिरफ्तारी एवं मृत्यु: 3 मार्च 1900 को ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जामकोपाई वन क्षेत्र से गिरफ्तार किया।
    • 9 जून 1900 को 25 वर्ष की आयु में रांची कारागार में रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

बिरसा मुंडा की विरासत

  • भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: बिरसा मुंडा ने जमीनी स्तर पर आदिवासी लोगों की भागीदारी का प्रतिनिधित्व किया तथा आदिवासी प्रतिरोध को भारत के औपनिवेशिक-विरोधी स्वतंत्रता संग्राम का अभिन्न अंग स्थापित किया।
  • आदिवासी भूमि अधिकारों की सुरक्षा: उनके आंदोलन ने औपनिवेशिक प्रशासन को आदिवासी शिकायतों पर ध्यान देने के लिए विवश किया तथा उन सुधारों में योगदान दिया, जो आगे चलकर छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 के रूप में परिणत हुए।
  • आदिवासी पहचान एवं सशक्तिकरण के प्रतीक: बिरसा मुंडा आदिवासी स्वाभिमान, गरिमा एवं प्रतिरोध के स्थायी प्रतीक बन गए तथा आज भी आदिवासी अधिकारों एवं सामाजिक न्याय के आंदोलनों को प्रेरित करते हैं।
  • सम्मान एवं स्मरण: संसद में बिरसा मुंडा की 14 फीट ऊँची प्रतिमा एवं चित्र स्थापित हैं।
    • उलीहातु एवं रांची में उनके स्मारक स्थापित किए गए हैं।
    • 15 नवम्बर 2000 को उनके जन्मदिवस के अवसर पर ही झारखंड राज्य का गठन किया गया।
    • उनकी जयंती को राष्ट्र-निर्माण में जनजातीय योगदान के सम्मान में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव: उनके जीवन एवं विरासत ने साहित्य, फिल्मों एवं अकादमिक अध्ययनों को व्यापक रूप से प्रेरित किया है, जिनमें महाश्वेता देवीकी पुस्तक‘अरण्येर अधिकार’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिससे वे आदिवासी एवं औपनिवेशिक-विरोधी अध्ययन के एक महत्त्वपूर्ण विषय बन गए हैं।

Sources :
PM India
EPW
UNI India
News on Air
PIB

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