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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास; अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता।

संदर्भ: अपने प्रक्षेपण के लगभग छह वर्ष बाद, चंद्रयान-2 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट स्थायी छायादार क्षेत्रों (Permanently Shadowed Regions – PSRs) के नीचे उप-सतही जल बर्फ की संभावित उपस्थिति का संकेत देने वाले नए साक्ष्य प्रदान किए हैं।

शोध के मुख्य निष्कर्ष

  • उप-सतही बर्फ के साक्ष्य: भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्रों की जाँच के लिए चंद्रयान-2 के ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार (DFSAR) के डेटा का उपयोग किया।
    • इस अध्ययन में ऐसे राडार सिग्नेचर्स की पहचान की गई जो चार दोहरे छायादार क्रेटरों के तल के नीचे उप-सतही जल बर्फ की संभावित उपस्थिति के अनुरूप हैं।
  • दोहरे छायादार क्रेटरों का अध्ययन: यह शोध दोहरे छायादार क्रेटरों पर केंद्रित था, जो स्थायी छायादार क्षेत्रों के भीतर स्थित हैं।
    • इन क्षेत्रों में कभी भी प्रत्यक्ष सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता है और ये अत्यधिक ठंडे (~25 K) रहते हैं, जो इन्हें अरबों वर्षों तक जल बर्फ को संरक्षित रखने के लिए आदर्श जलाशय बनाते हैं।
  • राडार-आधारित बर्फ संसूचन की नई कसौटी: वैज्ञानिकों ने वृत्ताकार ध्रुवण अनुपात (Circular Polarization Ratio – CPR) > 1 और ध्रुवण की मात्रा (Degree of Polarization – DOP) < 0.13 का उपयोग करके उप-सतही बर्फ की पहचान करने के लिए एक परिष्कृत पद्धति विकसित की है।
    • यह संयोजन आयतनी प्रकीर्णन (volumetric scattering) को दर्शाता है; जो कि एक ऐसा राडार हस्ताक्षर है जो संभावित रूप से दबी हुई बर्फ से संबद्ध होता है।
  • चट्टानी भूभाग से बर्फ का विभेदीकरण: CPR-DOP कसौटी खुरदरी चट्टानी सतहों के कारण होने वाले राडार परावर्तन से वास्तविक बर्फ सिग्नेचर्स को अलग करने में मदद करती है, जिससे बर्फ के संसूचन की विश्वसनीयता में सुधार होता है।
  • फॉस्टिनी क्रेटर से प्राप्त सबसे मजबूत साक्ष्य: फॉस्टिनी क्रेटर के भीतर स्थित एक 1.1 किमी व्यास वाले क्रेटर ने उप-सतही बर्फ के सबसे सुदृढ़ संकेत प्रदर्शित किए हैं।
  • इस क्रेटर में निम्नलिखित विशेषताएं प्रदर्शित होती हैं:
    • उच्च CPR मान (>1)
    • निम्न DOP मान (<0.13)
    • विशिष्ट पालिदार-किनारा आकारिकी।
  • तकनीकी उपलब्धि: DFSAR चंद्रमा के अध्ययन के लिए भेजा गया पहला पूर्णतः पोलरिमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) बन गया है।
    • L-बैंड और S-बैंड दोनों आवृत्तियों में संचालित होने के कारण, यह चंद्रमा की सतह के नीचे जाँच कर सकता है और दबे हुए बर्फ के निक्षेपों का पता लगा सकता है।

शोध का महत्व

  • चंद्र ध्रुवीय वाष्पशीलों की समझ में सुधार: ये निष्कर्ष चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों में जल बर्फ और अन्य वाष्पशील पदार्थों के वितरण तथा दीर्घकालिक संरक्षण के संबंध में नई अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
  • भावी चंद्र अन्वेषण का समर्थन: यह अध्ययन चंद्रमा पर भविष्य के रोबोटिक और मानव मिशनों के लिए उपयुक्त संभावित बर्फ-समृद्ध स्थानों की पहचान करने में मदद करता है।
  • स्वस्थाने संसाधन उपयोग (ISRU) को सक्षम बनाना: निरंतर चंद्र अभियानों के लिए पीने का पानी, सांस लेने योग्य ऑक्सीजन और हाइड्रोजन-ऑक्सीजन रॉकेट ईंधन का उत्पादन करने के लिए चंद्र जल बर्फ का उपयोग किया जा सकता है।
  • पृथ्वी से आपूर्ति किए जाने वाले संसाधनों पर निर्भरता में कमी: स्थानीय जल संसाधनों की उपलब्धता दीर्घकालिक चंद्र मिशनों की लागत और लॉजिस्टिक चुनौतियों को महत्वपूर्ण रूप से कम कर सकती है।
  • चंद्र विज्ञान में भारत के योगदान को सुदृढ़ करना: यह खोज चंद्रयान-2 की निरंतर वैज्ञानिक सफलता को रेखांकित करती है और वैश्विक चंद्र अन्वेषण में भारत की बढ़ती भूमिका को मजबूत करती है।
  • भविष्य के दक्षिणी ध्रुव मिशनों में सहायक: ये निष्कर्ष चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र को लक्षित करने वाले भविष्य के मिशनों के लिए बहुमूल्य मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, जिसमें लैंडिंग साइट का चयन और संसाधन अन्वेषण शामिल हैं।

चंद्रयान-2 के बारे में

  • चंद्रयान-2 भारत का दूसरा चंद्र अन्वेषण मिशन था जिसे 22 जुलाई 2019 को सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से GSLV Mk III-M1 रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया था।
  • इस मिशन में शामिल थे:
    • ऑर्बिटर
    • विक्रम लैंडर
    • प्रज्ञान रोवर
  • मुख्य उद्देश्य:
    • चंद्र सतह के भूविज्ञान और खनिज विज्ञान का अध्ययन करना।
    • चंद्र स्थलाकृति और आकारिकी का मानचित्रण करना।
    • चंद्र बाह्यमंडल की जाँच करना।
    • ध्रुवीय क्षेत्रों में जल बर्फ की खोज करना और उसकी मात्रा का निर्धारण करना।
    • चंद्रमा की सतह और उथली उप-सतह के गुणों का परीक्षण करना।
  • मिशन का परिणाम: 7 सितंबर 2019 को, अंतिम अवतरण चरण के दौरान विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया था।
    • हालांकि, ऑर्बिटर पूरी तरह सक्रिय और कार्यशील रहा, और उसने चंद्रमा के चारों ओर वैज्ञानिक अवलोकन जारी रखे।
  • ऑर्बिटर की कक्षा: चंद्रयान-2 ऑर्बिटर वर्तमान में चंद्रमा के चारों ओर 100 किमी × 100 किमी की ध्रुवीय कक्षा में संचालित हो रहा है।
  • ऑर्बिटर के प्रमुख पेलोड:
    • CLASS (लार्ज एरिया सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर) – चंद्र सतह का तत्वीय मानचित्रण।
    • CHACE-2 – चंद्र बाह्यमंडल का अध्ययन।
    • DFSAR (ड्यूल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर राडार) – जल बर्फ का पता लगाना और उप-सतही विशेषताओं का अध्ययन करना।
    • IIRS (इमेजिंग इन्फ्रा-रेड स्पेक्ट्रोमीटर) – खनिजों और जल/हाइड्रॉक्सिल हस्ताक्षरों का मानचित्रण।
    • DFRS (ड्यूल फ्रीक्वेंसी रेडियो साइंस एक्सपेरिमेंट) – चंद्र आयनमंडल का अध्ययन।

Sources :
Indian Express
The Hindu
ISRO
ISRO

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