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सामान्य अध्ययन-2: संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उससे जुड़ी चुनौतियाँ।

संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों तथा इससे सटे तराई और डुआर्स क्षेत्रों में लंबे समय से चली आ रही गोरखा पहचान और स्वशासन की मांगों का स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने के लिए एक समझौते का मसौदा तैयार करने और उसकी कार्यप्रणाली को अंतिम रूप देने हेतु एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है।

समिति के बारे में

• अध्यक्ष: पंकज कुमार सिंह, पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के पूर्व महानिदेशक। 

• अधिदेश: समिति गोरखा मुद्दे के सभी पहलुओं की जांच करेगी, संबंधित हितधारकों से परामर्श करेगी तथा स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए रूपरेखा और कार्यप्रणाली तैयार करेगी। 

• समिति विशिष्ट पहचान, स्वशासन तथा संविधान के अंतर्गत मान्यता से जुड़े मुद्दों की जांच करेगी। 

• समिति सामाजिक-आर्थिक विकास, वित्तीय सहायता तथा 11 प्रमुख गोरखा समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने के लिए कार्ययोजना पर भी विचार करेगी। 

• यह समिति पहले की व्यवस्थाओं, जैसे दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) और गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन (GTA) के बाद गठित की गई है। ये व्यवस्थाएँ गोरखाओं की राजनीतिक मांग का स्थायी समाधान नहीं कर सकीं।

मांग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

• 1907: दार्जिलिंग हिलमेन एसोसिएशन, जिसका नेतृत्व सोनम वांगेल लाडेन ला ने किया, ने मिंटो–मॉर्ले सुधार समिति के समक्ष दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की मांग रखते हुए याचिका प्रस्तुत की।

• 1929: गोरखा संगठनों ने साइमन कमीशन के समक्ष अपना पक्ष रखा और मुख्य आयुक्त प्रांत सहित एक वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था की मांग की। 

• 1947: अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के समक्ष “गोरखास्थान” की मांग करते हुए एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। 

• इस मांग को क्षेत्र की विशिष्ट भाषाई, जातीय और सांस्कृतिक पहचान तथा नेपाली भाषी आबादी के कुछ वर्गों द्वारा महसूस किए जाने वाले अलगाव और नस्लीय भेदभाव संबंधी चिंताओं से भी बल मिला है।

गोरखालैंड आंदोलन का विकास

• गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट का आंदोलन और दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल: 1980 के दशक में सुभाष घीसिंग, जो गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के संस्थापक थे, ने अलग राज्य की मांग को लेकर एक हिंसक आंदोलन का नेतृत्व किया और “गोरखालैंड” शब्द को लोकप्रिय बनाया। 

  • इसके बाद 1988 के गोरखा समझौते के परिणामस्वरूप दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन हुआ। 

• गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का आंदोलन और गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन: 2007 में बिमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) का गठन किया और अलग राज्य की मांग को फिर से उठाया। इसके परिणामस्वरूप 2011 में DGHC के स्थान पर गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन (GTA) की स्थापना की गई। 

• 2017 का आंदोलन: 2017 में यह आंदोलन अपने हाल के सबसे तीव्र चरण में पहुंचा। सरकारी स्कूलों में बंगाली भाषा के शिक्षण को लेकर विवाद के बाद 104 दिनों तक आंदोलन और बंद रहा। इस दौरान 11 लोगों की मृत्यु, हिंसा तथा पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों में गंभीर व्यवधान हुआ।

स्थायी समाधान के प्रमुख मुद्दे

• मौजूदा स्वायत्तता की सीमाएँ: गोरखालैंड प्रादेशिक प्रशासन (GTA) को 59 विषयों की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन यह पश्चिम बंगाल के कानूनों के तहत कार्य करता है और महत्वपूर्ण विधायी, वित्तीय तथा प्रशासनिक शक्तियों के लिए राज्य सरकार पर निर्भर रहता है। 

• छठी अनुसूची और अनुच्छेद 244: अनुच्छेद 244(2) छठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों के लिए संवैधानिक ढांचा प्रदान करता है। 

  • 2005 में दार्जिलिंग पहाड़ियों के लिए छठी अनुसूची पर आधारित और अधिक विधायी शक्तियों वाले परिषद का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन राजनीतिक विरोध तथा प्रतिनिधित्व और भूमि अधिकारों से जुड़ी चिंताओं के कारण यह आगे नहीं बढ़ सका। 

• क्षेत्रीय प्रश्न: गोरखालैंड की मांग तीन प्रमुख पहाड़ी उपखंडों से आगे बढ़कर तराई और डुआर्स के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है। इन क्षेत्रों में गोरखा समुदाय के अलावा अन्य प्रमुख समुदाय भी निवास करते हैं, जिससे क्षेत्रीय पुनर्गठन का प्रश्न संवेदनशील हो जाता है। 

• सामरिक विचार: किसी भी समझौते में क्षेत्र की नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से निकटता तथा सिलीगुड़ी गलियारे के पास इसकी स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक है। सिलीगुड़ी गलियारा मुख्यभूमि भारत को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण स्थल-मार्ग है।

महत्व

• राजनीतिक समाधान: एक टिकाऊ संवैधानिक व्यवस्था, पहले की संस्थाओं द्वारा प्रदान की गई सीमित स्वायत्तता से आगे बढ़कर पहचान, स्वशासन और राजनीतिक मान्यता से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही मांगों का समाधान कर सकती है। 

• शांति और स्थिरता: एक विश्वसनीय समझौता दार्जिलिंग की पहाड़ियों में समय-समय पर होने वाले बंद, हिंसा और राजनीतिक अशांति को रोकने में मदद कर सकता है, जिनसे क्षेत्र की सामान्य गतिविधियाँ प्रभावित होती रही हैं। 

• समावेशी विकास: अधिक राजनीतिक और वित्तीय स्थिरता से पहाड़ी क्षेत्रों, तराई और डुआर्स में बुनियादी ढाँचे, पर्यटन, रोजगार और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है। 

• राष्ट्रीय सुरक्षा: पड़ोसी देशों से निकटता और सिलीगुड़ी गलियारे के कारण इस क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। सिलीगुड़ी गलियारा भारत के मुख्य भू-भाग को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। 

• संवैधानिक संघवाद: यह मुद्दा इस बात की महत्वपूर्ण परीक्षा है कि भारत क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता की मांगों को किस प्रकार समायोजित कर सकता है, साथ ही विविध समुदायों के अधिकारों और देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा भी कर सकता है। 

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