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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।

संदर्भ: विश्व भर के 200 से अधिक संगठनों ने हानि एवं क्षति के प्रति प्रतिक्रिया कोष(FRLD) के बोर्ड को एक खुला पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि तत्काल वित्तीय अंशदान के अभाव में यह कोष शीघ्र ही रिक्त हो सकता है।

हानि एवं क्षति के प्रति प्रतिक्रिया कोष (FRLD) के बारे में

  • FRLD संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के वित्तीय तंत्र के अंतर्गत एक परिचालन इकाई है। इसका सृजन उन विकासशील देशों की सहायता के लिए किया गया है जो जलवायु परिवर्तन के अपरिवर्तनीय प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
  • इसे COP27 के दौरान स्थापित किया गया था और COP28 में इसे क्रियान्वित किया गया। यह प्रभावित राष्ट्रों की दशकों पुरानी मांग के पश्चात एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • यह कोष आर्थिक हानि (जैसे बुनियादी ढांचे की क्षति और आजीविका का नुकसान) और गैर-आर्थिक हानि (जिसमें जैव विविधता की हानि, सांस्कृतिक विरासत का क्षरण और विस्थापन सम्मिलित है) दोनों का समाधान करता है।
  • यह कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज (COP) और पेरिस समझौते के पक्षकारों की बैठक (CMA) के मार्गदर्शन में कार्य करता है।
  • इसकी परिचालन प्रक्रिया में एक प्रमुख कदम वर्ष 2025-26 के दौरान बारबाडोस कार्यान्वयन तौर-तरीकों (BIM) के अंतर्गत वित्तपोषण के प्रथम आह्वान की शुरुआत रही है, जो अनुदान-आधारित और देश-नेतृत्व वाली परियोजनाओं को सक्षम बनाता है।

कोष का महत्व

  • जलवायु न्याय की मान्यता: FRLD जलवायु न्याय के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह उन विकासशील और अल्पविकसित देशों द्वारा वहन किए जा रहे अत्यधिक बोझ को स्वीकार करता है, जिनका वैश्विक उत्सर्जन में योगदान नगण्य रहा है।
  • समर्पित वित्तीय तंत्र: यह ‘हानि और क्षति’—जिसमें समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएं, हीटवेव और मरुस्थलीकरण सम्मिलित हैं—के समाधान हेतु एक समर्पित वित्तीय तंत्र प्रदान करता है।
  • अनुकूलन अंतराल को पाटना: यह कोष अनुकूलन की सीमाओं और वास्तविक जलवायु प्रभावों के बीच के अंतर को कम करता है। इसके तहत दी जाने वाली सहायता के अनुदान-आधारित, ऋण-मुक्त और पूर्वानुमानित होने की अपेक्षा है।
  • कानूनी और नैतिक उत्तरदायित्व: यह कानूनी और नैतिक उत्तरदायित्व की बढ़ती वैश्विक मान्यता को दर्शाता है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के जलवायु संबंधी परामर्शदात्री मत जैसे व्याख्यानों द्वारा बल मिला है।

कोष के समक्ष चुनौतियाँ

  • वित्तपोषण का अभाव: वर्तमान में कुल प्रतिबद्धताएं लगभग $822 मिलियन हैं, जिसमें से लगभग $448 मिलियन वितरित किए गए हैं—यह अनुमानित $400 बिलियन की वार्षिक आवश्यकता के 0.1% से भी कम है।
  • कोष के रिक्त होने का जोखिम: नवीन वित्तीय योगदान के बिना, वर्ष 2027 तक इस कोष के संसाधन समाप्त होने का संकट बना हुआ है।
  • बढ़ती वित्तीय आवश्यकताएं: विकासशील देशों को 2030 तक प्रतिवर्ष $724 बिलियन से अधिक की आवश्यकता हो सकती है। बिगड़ते जलवायु प्रभावों और मुद्रास्फीति के कारण वास्तविक आवश्यकताएं इससे भी अधिक होने की संभावना है।
  • विकसित देशों द्वारा प्रतिबद्धताओं की पूर्ति में विलंब: वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूर्ण करने में विलंब, विश्वास और इस तंत्र की प्रभावशीलता को कमतर करता है।
  • सीमित प्रारंभिक आवंटन: स्टार्टअप चरण के अंतर्गत $250 मिलियन का प्रारंभिक वित्तपोषण लिफाफा अत्यंत अपर्याप्त है।
  • शासन और समता संबंधी चिंताएं: एक मानवाधिकार-आधारित, समावेशी और न्यायसंगत संसाधन संग्रहण रणनीति की मांग की जा रही है।

प्रस्तावित वित्तीय तंत्र

  • न्याय-उन्मुख वैश्विक कर और शुल्क:
    • जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण और उत्पादन पर जलवायु क्षति कर।
    • जीवाश्म ईंधन निगमों के लाभ पर ‘विंडफॉल टैक्स’ (अप्रत्याशित लाभ कर) या स्थायी शुल्क।
    • वैश्विक पूंजी प्रवाह को एकत्रित करने के लिए वित्तीय लेनदेन कर: अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सौदों पर कर का प्रावधान।
    • विलासितापूर्ण विमानन और ‘प्रीमियम फ्रीक्वेंट फ्लायर्स’ पर शुल्क।
    • कोष की समर्पित हिस्सेदारी के साथ  समुद्री मालवहन पर लगने वाले शुल्क।
  • पुनर्वितरण और धन-आधारित उपाय:
    • अति-धनी व्यक्तियों को लक्षित करने वाला संपत्ति कर।
    • जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को जलवायु वित्त की ओर पुनर्निर्देशित करना।
    • सैन्य व्यय के कुछ हिस्सों सहित अन्य सार्वजनिक खर्चों को पुन: आवंटित करना।
  • प्रणालीगत वित्तीय सुधार: वैश्विक कर चोरी और कर अपवंचन को रोकने के उपाय।
  • क्रमिक वित्तपोषण रोडमैप:
    • 2027 तक प्रतिवर्ष कम से कम $50 बिलियन।
    • 2031 तक प्रतिवर्ष $100 बिलियन तक विस्तार।
    • 2035 तक प्रतिवर्ष $400 बिलियन के लक्ष्य तक पहुँचना।

भारत के लिए निहितार्थ

  • अपनी विविध भौगोलिक स्थिति के कारण भारत विश्व के सर्वाधिक जलवायु-संवेदनशील देशों में सम्मिलित है, जिसमें हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और 7,500 कि.मी. (मुख्य भूमि और द्वीप समूहों सहित कुल 11,000 किमी से अधिक) से लंबी तटरेखा शामिल है।
  • असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य बाढ़, सूखे और चक्रवात के निरंतर जोखिम का सामना करते हैं।
  • 35 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 उच्च जल-मौसम विज्ञान संबंधी आपदा जोखिमों के प्रति संवेदनशील हैं।
  • भारत के लिए FRLD वित्तपोषण का महत्व:
    • जलवायु प्रेरित आपदाओं और आर्थिक नुकसान का समाधान करना।
    • संवेदनशील समुदायों और उनकी आजीविका को सहायता प्रदान करना।
    • लचीले बुनियादी ढांचे और रिकवरी प्रणालियों में निवेश करना।
    • ऋण-आधारित जलवायु वित्त पर निर्भरता को कम करना।
  • अपर्याप्त वित्तपोषण के जोखिम: FRLD के अपर्याप्त संसाधन बढ़ते जलवायु प्रभावों के प्रति प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने की भारत की क्षमता को सीमित कर सकते हैं, विशेष रूप से आपदा-प्रवण और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में।

Source:
Downtoearth
Frld
Fiftrustee

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