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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—विकास एवं उनके अनुप्रयोग तथा दैनिक जीवन पर उनका प्रभाव; जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जागरूकता।

संदर्भ: केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्टेम सेल थेरेपी के विनियमन के संबंध में एक परामर्श जारी किया है। इसमें दोहराया गया है कि केवल अनुमोदित रोगों/स्थितियों के लिए ही स्टेम सेल थेरेपी को मानक नैदानिक देखभाल के रूप में प्रदान किया जा सकता है। साथ ही, अप्रमाणित उपचारों के उपयोग को प्रतिबंधित किया गया है।

परामर्श के प्रमुख बिंदु

• अनुमोदित रोग/स्थितियाँ: स्टेम सेल थेरेपी को केवल मंत्रालय द्वारा अनुमोदित रोगों/स्थितियों के लिए मानक नैदानिक देखभाल के रूप में प्रदान किया जा सकता है। इनमें वयस्कों से संबंधित 18 तथा बाल चिकित्सा से संबंधित 14 रोग/स्थितियाँ शामिल हैं।

  • इन रोगों/स्थितियों के लिए केवल उचित रूप से किया गया हीमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण अनुशंसित है। मेसेनकाइमल स्टेम सेल प्रत्यारोपण किसी भी रोग के लिए अनुशंसित नहीं है।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD): ASD के उपचार के लिए किसी भी प्रकार के स्टेम सेल के उपयोग को केवल विधिवत अनुमोदित नैदानिक परीक्षणों तक सीमित रखा गया है। इसे नियमित, मानक अथवा व्यावसायिक नैदानिक उपचार के रूप में प्रदान नहीं किया जा सकता।

कार्यान्वयन: जिन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने नैदानिक स्थापन (रजिस्ट्रीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 को अपनाया है, उन्हें यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि राज्य/जिला नियामक प्राधिकरण तथा संबंधित सरकारी और निजी नैदानिक प्रतिष्ठान इसके प्रावधानों का अनुपालन करें।

व्यावसायिक जवाबदेही: अनुमोदित रोगों/स्थितियों से इतर स्टेम सेल थेरेपी का अनधिकृत प्रशासन, प्रिस्क्रिप्शन, प्रचार अथवा विज्ञापन व्यावसायिक अवचार माना जाएगा। उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए राज्य चिकित्सा परिषदें अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती हैं।

स्टेम सेल थेरेपी 

स्टेम सेल थेरेपी: यह एक चिकित्सीय पद्धति है, जिसमें स्टेम कोशिकाओं का उपयोग क्षतिग्रस्त अथवा रोगग्रस्त कोशिकाओं और ऊतकों के प्रतिस्थापन, मरम्मत अथवा पुनर्जनन के लिए किया जाता है। यह पुनर्योजी चिकित्सा (Regenerative Medicine) के व्यापक क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

स्टेम कोशिकाएँ: ये अविभेदित कोशिकाएँ होती हैं, जिनमें दो प्रमुख गुण पाए जाते हैं:

  • स्व-नवीकरण (Self-renewal): कोशिका विभाजन के माध्यम से नई स्टेम कोशिकाएँ उत्पन्न करने की क्षमता।
  • विभेदन (Differentiation): विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता। विभेदन की सीमा स्टेम कोशिका के प्रकार और उसकी क्षमता पर निर्भर करती है।

• स्टेम कोशिकाओं के प्रमुख प्रकार:

  • भ्रूणीय स्टेम कोशिकाएँ (Embryonic Stem Cells—ESCs): ये प्रारंभिक अवस्था के भ्रूण के आंतरिक कोशिका समूह से प्राप्त प्लुरिपोटेंट कोशिकाएँ होती हैं, जो अनेक प्रकार की विशिष्ट कोशिकाओं में विभेदित हो सकती हैं।
  • वयस्क/दैहिक स्टेम कोशिकाएँ (Adult/Somatic Stem Cells): ये विकसित ऊतकों में पाई जाती हैं और सामान्यतः इनकी विभेदन क्षमता सीमित होती है। उदाहरण के लिए, हीमेटोपोएटिक स्टेम कोशिकाएँ विभिन्न प्रकार की रक्त कोशिकाएँ उत्पन्न कर सकती हैं।
  • प्रेरित प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएँ (Induced Pluripotent Stem Cells—iPSCs): ये परिपक्व एवं विभेदित कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें आनुवंशिक रूप से पुनःप्रोग्राम करके प्लुरिपोटेंट गुण प्रदान किए जाते हैं।

चिकित्सीय संभावनाएँ: स्टेम कोशिकाओं का उपयोग ऊतक रिकवरी एवं पुनर्जनन तथा कुछ रोगों के उपचार में संभावित रूप से किया जा सकता है। हालाँकि, किसी उपचार में चिकित्सीय संभावना होना अपने-आप में यह सिद्ध नहीं करता कि वह चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित उपचार है।

भारत में स्टेम सेल अनुसंधान और थेरेपी का नियामक ढाँचा

स्टेम सेल अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश, 2017: इन्हें भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा संयुक्त रूप से जारी किया गया था। ये स्टेम सेल अनुसंधान और उसके नैदानिक अनुप्रयोग के लिए नियामक रूपरेखा प्रदान करते हैं।

नैदानिक परीक्षण: जिन स्टेम सेल उपचारों की प्रकृति अभी अनुसंधानात्मक है, उन्हें स्थापित उपचार के रूप में उपलब्ध कराने के बजाय निर्धारित नैदानिक परीक्षण और नियामक अनुमोदन प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है।

नियामक व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण: वर्ष 2026 में औषधि नियम, 1945 में संशोधन कर कोशिका अथवा स्टेम सेल से प्राप्त उत्पादों, जीन-चिकित्सीय उत्पादों तथा जीनोग्राफ्ट्स (Xenografts) को केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण के ढाँचे के अंतर्गत लाया गया।

व्यावसायिक विनियमन: राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के सितंबर 2026 के परामर्श में दोहराया गया है कि स्टेम सेल थेरेपी केवल अनुमोदित रोगों/स्थितियों के लिए ही प्रदान की जा सकती है। साथ ही, राज्य चिकित्सा परिषदों को कथित उल्लंघनों की जाँच करने तथा उचित प्रक्रिया के बाद व्यावसायिक अवचार सिद्ध होने पर उपयुक्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।

परामर्श के सुरक्षा उपाय एवं महत्त्व

रोगी सुरक्षा: अप्रमाणित उपचारों पर प्रतिबंध लगाने से रोगियों को ऐसी चिकित्सा पद्धतियों से बचाने में सहायता मिलती है, जिनकी सुरक्षा और प्रभावकारिता पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुई है।

साक्ष्य-आधारित चिकित्सा: यह परामर्श अनुमोदित नैदानिक अनुप्रयोगों और अनुसंधानात्मक उपचारों के बीच अंतर को स्पष्ट करता है और अनुसंधानात्मक उपचारों के लिए नैदानिक परीक्षणों की आवश्यकता पर बल देता है।

भ्रामक दावों से संरक्षण: अनधिकृत प्रचार और व्यावसायिक रूप से उपचार उपलब्ध कराने पर प्रतिबंध से ऐसे अप्रमाणित चिकित्सीय दावों को रोकने में सहायता मिल सकती है, जो रोगियों के उपचार संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।

नियामक जवाबदेही: यह परामर्श राज्य/जिला नियामक प्राधिकरणों, नैदानिक प्रतिष्ठानों तथा राज्य चिकित्सा परिषदों के माध्यम से नियामक ढाँचे के प्रभावी कार्यान्वयन और जवाबदेही को सुदृढ़ करता है।

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