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संदर्भ: प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत के चार वर्ष बाद, भारत में चीतों की संख्या बढ़कर 56 हो गई है, जिनमें 36 चीते देश में जन्मे हैं। यह कार्यक्रम के प्रारंभिक पुनर्वास चरण से आगे बढ़कर भारत में प्रजनन करने वाली चीता आबादी स्थापित करने की दिशा में संक्रमण को दर्शाता है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • कूनो राष्ट्रीय उद्यान प्रमुख चीता आवास बना हुआ है, जहाँ 53 चीते हैं, जबकि तीन चीते गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में रखे गए हैं। यह कार्यक्रम के मूल पुनर्वास स्थल से आगे विस्तार को दर्शाता है।
  • भारत में जन्मे चीतों की बढ़ती संख्या, जिसमें देश में जन्मी चीतों की लगातार आने वाली पीढ़ियाँ भी शामिल हैं, यह दर्शाती है कि कार्यक्रम अब स्थानांतरित किए गए चीतों पर निर्भरता से आगे बढ़कर भारतीय भू-दृश्यों में प्राकृतिक प्रजनन और आबादी के स्थापन की ओर बढ़ रहा है।
  • परिणामस्वरूप, कार्यक्रम अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जिसका ध्यान उपयुक्त आवासों के विस्तार, दीर्घकालिक चीता मेटापॉपुलेशन को सुदृढ़ करने तथा भारत में जन्मी पीढ़ियों के अस्तित्व और प्रजनन को सुनिश्चित करने पर है।

प्रोजेक्ट चीता को समझना

  • पृष्ठभूमि: भारत में चीता को 1952 में विलुप्त घोषित कर दिया गया था। इसके प्रमुख कारणों में आवास का क्षरण, शिकार की उपलब्धता में कमी और शिकार करना शामिल थे। वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रायोगिक आधार पर सीमित संख्या में अफ्रीकी चीतों को भारत में लाने की अनुमति दी। प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में की गई।
  • स्थानांतरण: नामीबिया से आठ चीतों का पहला समूह सितंबर 2022 में भारत पहुँचा। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते फरवरी 2023 में तथा बोत्सवाना से नौ चीते फरवरी 2026 में लाए गए। यह विश्व में किसी बड़े जंगली मांसाहारी जीव का पहला अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण है।
  • मुख्य उद्देश्य: कार्यक्रम का उद्देश्य एक व्यवहार्य, आत्मनिर्भर चीता आबादी स्थापित करना है, जिसका प्रबंधन मेटापॉपुलेशन के रूप में किया जाए, साथ ही उपयुक्त खुले पारिस्थितिक तंत्रों में इस प्रजाति की पारिस्थितिक भूमिका को पुनर्स्थापित करना है।
  • संस्थागत ढाँचा: यह कार्यक्रम पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत संचालित है और इसका नेतृत्व राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) द्वारा किया जा रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान तथा राज्य वन विभाग भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

आवास विस्तार और परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण

  • कूनो राष्ट्रीय उद्यान: कूनो को पहले पुनर्वास स्थल के रूप में उपयुक्त आवास, पर्याप्त शिकार-आधार और अपेक्षाकृत कम मानव हस्तक्षेप के कारण चुना गया था।
  • गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य: चंबल नदी के किनारे मालवा क्षेत्र में स्थित गांधी सागर भारत का दूसरा चीता आवास बना। पुनर्वास से पहले इसके शिकार-आधार को मजबूत करने के लिए अन्य बाघ अभयारण्यों से शिकार प्रजातियों को यहाँ स्थानांतरित किया गया।
  • परिदृश्य-स्तरीय दृष्टिकोण: कार्यक्रम अब एकल-स्थल मॉडल से आगे बढ़कर व्यापक परिदृश्य में बहु-आबादी, आवास, शिकार-आधार और पारिस्थितिक संपर्कता के प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है। रणनीतिक ढाँचे में कूनो-गांधी सागर परिदृश्य में लगभग 17,000 वर्ग किमी क्षेत्र में 60–70 चीतों की व्यवहार्य मेटापॉपुलेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
  • भविष्य के स्थल: नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य और बन्नी घासभूमि को संभावित अतिरिक्त आवासों के रूप में चिन्हित किया गया है, जो पारिस्थितिक उपयुक्तता और आवश्यक तैयारियों के पूरा होने पर निर्भर होंगे।

प्रोजेक्ट चीता का महत्व

  • विलुप्त प्रजाति की पुनर्स्थापना: यह परियोजना 1952 में भारत में चीता के विलुप्त होने के बाद उसे देश में पुनर्स्थापित करने का प्रयास करती है।
  • घासभूमि एवं खुले वनों का संरक्षण: प्रमुख एवं छत्र प्रजाति के रूप में चीता ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित घासभूमियों, झाड़ीदार क्षेत्रों और खुले वनों के संरक्षण की ओर ध्यान आकर्षित कर सकता है।
  • जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ: इन आवासों के संरक्षण से शिकार प्रजातियों, अन्य संकटग्रस्त जीव-जंतुओं तथा संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को लाभ मिल सकता है।
  • सामुदायिक लाभ: परियोजना के ढाँचे में पारिस्थितिकी विकास, पारिस्थितिकी पर्यटन, जागरूकता और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना शामिल है, जिससे संरक्षण परिदृश्यों के आसपास रहने वाले समुदायों के लिए आजीविका के अवसर उत्पन्न हो सकते हैं।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • आबादी की व्यवहार्यता: आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करने के लिए निरंतर प्रजनन, शावकों का जीवित रहना तथा कई आबादियों की सफल स्थापना आवश्यक है।
  • आनुवंशिक विविधता: एक व्यवहार्य मेटापॉपुलेशन के लिए आनुवंशिक प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर समय-समय पर अतिरिक्त चीतों को शामिल करना आवश्यक है, ताकि आनुवंशिक विविधता में कमी को रोका जा सके।
  • आवास एवं शिकार-आधार: विस्तार के लिए विभिन्न परिदृश्यों में पर्याप्त आवास, शिकार की उपलब्धता और पारिस्थितिक संपर्कता आवश्यक है।
  • सुरक्षा एवं मानव-वन्यजीव संपर्क क्षेत्र: जैसे-जैसे चीते संरक्षित क्षेत्रों से बाहर फैलेंगे, अवैध शिकार, फंदे, विद्युत करंट लगना, विषाक्तता, सड़क दुर्घटनाएँ और पशुधन से संबंधित संघर्ष जैसे जोखिमों के प्रभावी प्रबंधन की आवश्यकता होगी।

आगे की राह

  • मेटापॉपुलेशन का विकास: अनेक व्यवहार्य आबादियाँ स्थापित की जाएँ और उन्हें एक-दूसरे से जुड़ी मेटापॉपुलेशन के रूप में प्रबंधित किया जाए, जिसमें कूनो–गांधी सागर परिदृश्य दीर्घकालिक रणनीति का मुख्य आधार हो।
  • उपयुक्त आवासों का विस्तार: पर्याप्त शिकार-आधार, आवास और प्रबंधन संबंधी बुनियादी ढाँचा सुनिश्चित करने के बाद नौरादेही और बन्नी तथा अन्य उपयुक्त परिदृश्यों को क्रमिक रूप से विकसित किया जाए।
  • आनुवंशिक स्वास्थ्य बनाए रखना: आनुवंशिक विविधता और आबादी की व्यवहार्यता बनाए रखने के लिए आवश्यकता के अनुसार वैज्ञानिक रूप से नियोजित स्थानांतरण एवं अतिरिक्त चीतों को शामिल करने की प्रक्रिया अपनाई जाए।
  • वैज्ञानिक प्रबंधन को सुदृढ़ करना: आबादी के विस्तार के साथ टेलीमेट्री-आधारित निगरानी, स्वास्थ्य एवं शिकार-आधार का आकलन, अनुकूली प्रबंधन तथा सामुदायिक भागीदारी को निरंतर जारी रखा जाए।
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