संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरणीय प्रभाव, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जारी 2021 के कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया है। इस ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार एवं अन्य नियामक प्राधिकरणों को उन परियोजनाओं को पूर्वव्यापी पश्च-प्रभावी पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान करने की अनुमति दी गई थी, जिन्होंने पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त किए बिना ही अपना निर्माण या संचालन प्रारंभ कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

  • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006:
    • यह अधिसूचना पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी की गई थी।
    • इसके अनुसार, अधिसूचित (निर्दिष्ट) परियोजनाओं के लिए निर्माण अथवा संचालन प्रारंभ करने से पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
  • 2017 की अधिसूचना एवं 2021 का कार्यालय ज्ञापन:
    • उन परियोजनाओं के मामलों के समाधान हेतु, जिन्होंने पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के बिना कार्य प्रारंभ कर दिया था, केंद्र सरकार ने 2017 में एक अधिसूचना जारी कर ऐसे उल्लंघन मामलों के मूल्यांकन के लिए एकमुश्त छह माह की अवधि प्रदान की।
    • इसके पश्चात 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) के माध्यम से मानक संचालन प्रक्रिया निर्धारित की गई, जिससे पश्च-प्रभावी पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए प्राप्त प्रस्तावों के निस्तारण हेतु एक निरंतर प्रशासनिक तंत्र स्थापित किया गया।
  • न्यायिक विकास:
    • इन प्रावधानों की वैधता को वनशक्ति (Vanashakti) के नेतृत्व में पर्यावरणीय संगठनों द्वारा चुनौती दी गई। उनका तर्क था कि पश्च-प्रभावी पर्यावरणीय स्वीकृति सावधानी सिद्धांत को कमजोर करती है तथा पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन को प्रोत्साहित करती है।
    • 2025 में सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने 2017 की अधिसूचना तथा 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) दोनों को निरस्त कर दिया।
    • हालांकि, उसी वर्ष तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने इस निर्णय को वापस लेते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों में, असाधारण परिस्थितियों में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लागू करने के बाद परियोजनाओं को जारी रखने की अनुमति दी गई थी, न कि उन्हें ध्वस्त करने का आदेश दिया गया था।
    • इसके बाद इस मामले की पुनः सुनवाई तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा की गई।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रमुख बिंदु

  • 2021 का कार्यालय ज्ञापन निरस्त
    • सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 के कार्यालय ज्ञापन (OM) को निरस्त करते हुए कहा कि कार्यपालिका केवल प्रशासनिक निर्देश के माध्यम से पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर नहीं कर सकती।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी कोई व्यवस्था आवश्यक समझी जाती है, तो उसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी वैधानिक अधिसूचना के माध्यम से ही लागू किया जाना चाहिए।
  • पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति ही सामान्य नियम
    • न्यायालय ने पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 की पुनः पुष्टि करते हुए कहा कि पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करना ही विधिक रूप से अनिवार्य एवं मूल सिद्धांत है।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पश्च-प्रभावी पर्यावरणीय स्वीकृति को पर्यावरणीय उल्लंघनों को नियमित करने का सामान्य माध्यम नहीं बनाया जा सकता। इसे केवल कानून द्वारा मान्यता प्राप्त सीमित परिस्थितियों में ही अनुमति दी जा सकती है।
  • संतुलित दृष्टिकोण
    • न्यायालय ने पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के महत्व को दोहराते हुए यह भी माना कि पूर्ण हो चुकी परियोजनाओं—विशेषकर लोकहित से जुड़ी परियोजनाओं—को बंद करना या ध्वस्त करना, कुछ मामलों में पर्यावरणीय, आर्थिक तथा जनहित की दृष्टि से अधिक नुकसानदायक हो सकता है।
    • इसलिए न्यायालय ने कहा कि केंद्र सरकार, 2021 के कार्यालय ज्ञापन जैसी व्यापक प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय, विशिष्ट प्रकार के उल्लंघन मामलों के समाधान हेतु उपयुक्त वैधानिक अधिसूचना जारी कर सकती है।
  • भूतलक्षी प्रभाव
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय भूतलक्षी प्रभाव से लागू होगा।
    • अतः 2021 के कार्यालय ज्ञापन के तहत पहले से प्रदान की जा चुकी पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ वैध बनी रहेंगी और इस निर्णय के कारण स्वतः निरस्त नहीं होंगी।

निर्णय का महत्व

  • सावधानी सिद्धांत को सुदृढ़ करता है: यह निर्णय पुनः पुष्टि करता है कि परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन परियोजना के क्रियान्वयन से पूर्व किया जाना चाहिए, न कि पर्यावरणीय उल्लंघन होने के बाद।
  • पर्यावरणीय शासन को मजबूत करता है: यह निर्णय पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति को भारत के पर्यावरणीय नियामक ढांचे का आधारभूत स्तंभ मानते हुए उसकी अनिवार्यता को पुनः स्थापित करता है।
  • विधि के शासन को सुदृढ़ करता है: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कार्यपालिका द्वारा जारी प्रशासनिक निर्देश, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) ढांचे के अंतर्गत निर्धारित वैधानिक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों में मौलिक परिवर्तन या उन्हें कमजोर नहीं कर सकते।
  • विधिक स्पष्टता प्रदान करता है: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भविष्य में यदि पश्च-प्रभावी पर्यावरणीय स्वीकृति से संबंधित कोई व्यवस्था बनाई जाती है, तो उसे वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही लागू किया जाना होगा। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही तथा विधायी निगरानी सुनिश्चित होगी।
Shares: