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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय’ बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबधित विषय।
संदर्भ: कॉम्पेटेयर फाउंडेशन (Competere Foundation) की रिपोर्ट ‘इंडियाज नेक्स्ट ग्रोथ फ्रंटियर: रिड्यूसिंग एंटी-कॉम्पिटिटिव मार्केट डिस्टॉर्शन टू बिल्ड ऑन इंडियाज 2010–2023 रिफॉर्म प्रोग्रेस’ के अनुसार, मार्केट डिस्टॉर्शन परफॉर्मेंस इंडेक्स (MDPI) में भारत 2010 में 82वें स्थान से 2023 में 57वें स्थान पर पहुँच गया है। यह संरचनात्मक एवं प्रतिस्पर्धा-अनुकूल सुधारों के माध्यम से बाजार में प्रतिस्पर्धा-विरोधी विकृतियों को कम करने की दिशा में भारत की महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाता है।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
• 2010 से 2023 के बीच भारत ने वैश्विक रैंकिंग में 25 स्थानों का सुधार किया और आकलन की गई अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत संरचनात्मक सुधारकर्ताओं में से एक के रूप में उभरा।
• रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में किए गए सुधारों ने भारत के अनुमानित पांच वर्षीय प्रति व्यक्ति जीडीपी नुकसान को 11 प्रतिशत अंक तक कम किया, अर्थात प्रति व्यक्ति जीडीपी में लगभग 1% अतिरिक्त वार्षिक वृद्धि हुई।
• इस प्रगति के बावजूद, रिपोर्ट का अनुमान है कि शेष बाजार विकृतियां अगले पांच वर्षों में लगभग 173.6 अरब डॉलर का आर्थिक बोझ डालेंगी, जो जीडीपी के लगभग 4.2% के बराबर है।
• विदेशी निवेश संबंधी प्रतिबंध इन नुकसानों के सबसे बड़े हिस्से (लगभग 127.2 अरब डॉलर) के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि प्रतिस्पर्धा नीति से संबंधित विकृतियां, विशेषकर डिजिटल बाजारों में, लगभग 46.4 अरब डॉलर के नुकसान का कारण बनती हैं।
• रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने घरेलू प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किया है, किंतु बाहरी विनियामक बाधाएं तथा घरेलू निवेश प्रतिबंध अभी भी इसकी विकास क्षमता को सीमित करते हैं।
मार्केट डिस्टॉर्शन परफॉर्मेंस इंडेक्स (MDPI) के बारे में
• कॉम्पेटेयर फाउंडेशन द्वारा विकसित MDPI उन प्रतिस्पर्धा-विरोधी बाजार विकृतियों का आकलन करता है, जिन्हें सरकार प्रत्यक्ष रूप से लागू करती है अथवा जो सरकार की सहमति या उपेक्षा के कारण बनी रहती हैं तथा स्वैच्छिक विनिमय एवं प्रतिस्पर्धा को बाधित करती हैं।
• विश्व बैंक के अब बंद हो चुके ‘व्यापार सुगमता सूचकांक’ के विपरीत, MDPI उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली प्रतिस्पर्धा-विरोधी बाजार विकृतियों पर केंद्रित है।
• यह तीन स्तंभों के आधार पर देशों का मूल्यांकन करता है:
- संपत्ति अधिकार संरक्षण (Property Rights Protection – PR): संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा तथा निवेश को समर्थन देने वाले कानूनी वातावरण का आकलन करता है।
- घरेलू प्रतिस्पर्धा (Domestic Competition – DC): घरेलू अर्थव्यवस्था में बाजार प्रवेश, व्यावसायिक संचालन, निवेश, दिवालियापन तथा प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाले नियमों का मूल्यांकन करता है।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा (International Competition – IC): अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी निवेश, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं तथा सीमा-पार प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाली बाधाओं का आकलन करता है।
• रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सबसे अधिक सुधार ‘घरेलू प्रतिस्पर्धा’ स्तंभ में हुआ है, जो घरेलू विनियामक एवं व्यावसायिक वातावरण में हुए व्यापक सुधारों को दर्शाता है।
भारत की बेहतर रैंकिंग के प्रमुख चालक
• वस्तु एवं सेवा कर (GST, 2017): इसने भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को एकीकृत किया, आंतरिक राजकोषीय विखंडन को कम किया तथा अधिक एकीकृत घरेलू बाजार के निर्माण में सहायता की।
• दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC, 2016): इसने दिवाला समाधान प्रक्रिया को सुदृढ़ किया, परिसंपत्तियों के पुनर्विनियोजन में सुधार किया तथा निवेशकों का विश्वास बढ़ाया।
• बेहतर व्यावसायिक वातावरण: महत्वपूर्ण विनियामक सुधारों के परिणामस्वरूप भारत विश्व बैंक की ‘डूइंग बिजनेस 2015’ रैंकिंग में 142वें स्थान से सुधरकर ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस 2020’ में 63वें स्थान पर पहुंच गया।
• व्यापार सुविधा सुधार: ICEGATE, SWIFT, AEO कार्यक्रम, DPD, DPE तथा RMS जैसी पहलों ने लेनदेन लागत को कम किया तथा सीमा शुल्क प्रणाली की दक्षता में सुधार किया।
• प्रतिस्पर्धा नीति, निवेश परिस्थितियों, डिजिटल बाजारों तथा विनियामक शासन में सुधार ने भी भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें
• विशेषकर डिजिटल बाजारों में प्रतिस्पर्धा नीति के प्रति साक्ष्य-आधारित एवं प्रभाव-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाया जाए, जिसमें फर्म के आकार के बजाय सिद्ध उपभोक्ता हानि पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
• उपभोक्ता कल्याण, निवेश एवं उत्पादकता पर उनके प्रभाव के आधार पर स्वामित्व सीमा, अनुमोदन आवश्यकताओं तथा व्यावसायिक मॉडल संबंधी प्रतिबंधों सहित क्षेत्र-विशिष्ट विदेशी निवेश प्रतिबंधों की समीक्षा की जाए।
• लॉजिस्टिक्स दक्षता, प्रौद्योगिकी प्रसार, आपूर्तिकर्ताओं तक पहुंच तथा उपभोक्ता लाभ बढ़ाने के लिए खुदरा एवं ई-कॉमर्स सुधारों को निरंतर सुदृढ़ किया जाए।
• अनावश्यक बाहरी विनियामक बाधाओं, विशेषकर स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता (SPS) उपायों, तकनीकी नियमों तथा निर्यात को प्रतिबंधित करने वाले स्थिरता संबंधी मानकों का सक्रिय रूप से विरोध किया जाए।
• संरक्षणवादी विनियामक प्रथाओं का विरोध करते हुए व्यापारिक साझेदारों के साथ विज्ञान-आधारित मानकों, पारस्परिक मान्यता, विनियामक सहयोग तथा समानता को बढ़ावा दिया जाए।
• सुधारों का निरंतर मूल्यांकन करने, शेष बाजार विकृतियों की पहचान करने तथा दीर्घकालिक उत्पादकता एवं प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि को अधिकतम करने वाले उपायों को प्राथमिकता देने के लिए MDPI ढांचे का उपयोग किया जाए।
