अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026
संदर्भ: अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 को 5 सितंबर को मनाया गया। इस अवसर पर भारत ने पंचकूला, हरियाणा में “संकट से पुनर्प्राप्ति तक—भारत के गिद्धों का संरक्षण” (From Crisis to Recovery—Conserving India’s Vultures) विषय पर एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इसमें गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों तथा प्राकृतिक पर्यावासों में गिद्धों की आबादी की पुनर्प्राप्ति को प्रमुखता से रेखांकित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के बारे में
- तिथि: प्रत्येक वर्ष सितंबर के प्रथम शनिवार को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिवस 5 सितंबर को मनाया गया।
- उद्भव: इसकी शुरुआत 2006 में एंडेंजर्ड वाइल्डलाइफ ट्रस्ट (दक्षिण अफ्रीका) के बर्ड्स ऑफ प्रे प्रोग्राम और हॉक कंजरवेंसी ट्रस्ट (इंग्लैंड) के सहयोग से हुई थी।
- उद्देश्य: गिद्धों के पारिस्थितिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके संरक्षण के लिए समन्वित संरक्षण कार्रवाई को बढ़ावा देना।
- वैश्विक चिंता: विश्व की लगभग 70% गिद्ध प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं, जिससे गिद्ध पक्षियों के सबसे अधिक संकटग्रस्त समूहों में शामिल हैं।
गिद्धों और भारत में उनकी संख्या में गिरावट
- पारिस्थितिक भूमिका: गिद्ध अत्यंत प्रभावी मृतभक्षी (Scavengers) हैं, जो पशुओं के शवों को तेजी से नष्ट करके पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में सहायता करते हैं तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- प्रजातीय विविधता: विश्व में गिद्धों की 23 प्रजातियों में से भारत में 9 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें सफेद-पीठ वाला गिद्ध, लंबी चोंच वाला गिद्ध, पतली चोंच वाला गिद्ध, लाल सिर वाला गिद्ध, मिस्र का गिद्ध, हिमालयी ग्रिफॉन, यूरेशियाई ग्रिफॉन, सिनेरियस गिद्ध तथा दाढ़ी वाला गिद्ध शामिल हैं।
- गिद्ध संकट: विशेष रूप से Gyps वंश की गिद्ध प्रजातियों की संख्या में 1990 के दशक से भारी गिरावट आई। इसका प्रमुख कारण पशु चिकित्सा में प्रयुक्त डाइक्लोफेनाक से उपचारित पशुओं के शवों को खाने के कारण गिद्धों का इस दवा के संपर्क में आना था।
- अन्य खतरे: गिद्धों के लिए विषाक्त अन्य पशु चिकित्सा दवाएँ, खाद्य-श्रृंखला में व्यवधान, विषप्रयोग तथा शवों के असुरक्षित प्रबंधन की प्रक्रियाएँ भी गिद्धों की आबादी की पुनर्प्राप्ति के लिए लगातार खतरा बनी हुई हैं।
भारत के गिद्ध संरक्षण प्रयास
- नीति एवं दवा विनियमन: भारत की गिद्ध संरक्षण के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना (2006) और गिद्ध संरक्षण के लिए कार्ययोजना 2020–2025 सुरक्षित पर्यावास, निगरानी, संरक्षण प्रजनन तथा दवाओं के कारण होने वाली मृत्यु को कम करने पर केंद्रित हैं। पशु चिकित्सा में प्रयुक्त डाइक्लोफेनाक पर 2006 में प्रतिबंध लगाया गया, जबकि मेलॉक्सिकैम जैसे सुरक्षित विकल्पों को बढ़ावा दिया गया है।
- गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र: संरक्षण प्रयासों में गिद्धों के अनुकूल सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियों तथा सुरक्षित खाद्य उपलब्धता को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है, ताकि गिद्धों की आबादी को सहारा देने वाले सुरक्षित परिदृश्य विकसित किए जा सकें।
- संरक्षण प्रजनन: जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र (JCBC), पिंजौर की स्थापना हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) द्वारा संयुक्त रूप से की गई है। यह केंद्र सफेद-पीठ वाले, लंबी चोंच वाले और पतली चोंच वाले गिद्धों के संरक्षण पर केंद्रित है। 2025–26 के दौरान केंद्र में 356 गिद्ध थे, 35 चूजों का प्रजनन हुआ तथा 87 गिद्धों को पुनःप्रवेश के लिए छोड़ा गया अथवा इसमें योगदान दिया गया।
- सामुदायिक एवं तकनीकी क्षमता: भारत प्राकृतिक पर्यावासों में गिद्धों की पुनर्प्राप्ति के लिए “संपूर्ण सरकार (Whole-of-Government) और संपूर्ण समाज (Whole-of-Society)” दृष्टिकोण अपना रहा है। इसमें पशु चिकित्सकों, पशुधन मालिकों, स्थानीय प्रशासन और समुदायों को शामिल करने के साथ-साथ संरक्षण के लिए तकनीकी क्षमता निर्माण पर भी जोर दिया जा रहा है।
कॉस्मोक्यूब द्वारा ब्रह्मांड के ब्रह्मांडीय अंधकार युग का अध्ययन
संदर्भ: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के नेतृत्व में एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने कॉस्मोक्यूब (CosmoCube) का प्रस्ताव दिया है। यह एक सूटकेस के आकार का, चंद्रमा की कक्षा में परिक्रमा करने वाला अंतरिक्ष यान होगा, जिसका उद्देश्य तटस्थ हाइड्रोजन से आने वाले अत्यंत कमजोर 21 सेमी रेडियो संकेतों का पता लगाकर ब्रह्मांड के प्रारंभिक और अभी तक पूरी तरह समझे न गए चरणों का अध्ययन करना है।
कॉस्मोक्यूब मिशन के बारे में
- उद्देश्य: ब्रह्मांडीय अंधकार युग (Cosmic Dark Ages) और कॉस्मिक डॉन (Cosmic Dawn) का अध्ययन करना, विशेष रूप से पहले तारों के निर्माण से पहले की अवधि की जांच करना।
- डिजाइन: यह एक हल्का, क्यूबसैट जैसा अंतरिक्ष यान होगा, जिसे चंद्रमा की सतह से लगभग 100 किमी की ऊँचाई पर कक्षा में स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसका अपेक्षित मिशन जीवनकाल दो वर्ष है।
- अवलोकन: इसमें एक हल्के रेडियो एंटीना का उपयोग किया जाएगा और यह लगभग 10–50 MHz की अत्यंत निम्न आवृत्तियों पर कार्य करेगा।
- प्रत्येक दो घंटे की चंद्र कक्षा के दौरान यह लगभग 40 मिनट चंद्रमा के पीछे रह सकता है। इस प्रकार दो वर्षों में लगभग 1,000 घंटे के अवलोकन एकत्र किए जा सकते हैं।
- यह मिशन अभी प्रस्तावित चरण में है और टीम को उम्मीद है कि इसे अगले कुछ वर्षों में लॉन्च किया जा सकता है।
21 सेमी संकेत को समझना
- उदासीन हाइड्रोजन एक विशिष्ट 21 सेमी तरंगदैर्ध्य का विकिरण उत्पन्न करता है। यह विकिरण क्वांटम यांत्रिकी से संबंधित स्पिन-फ्लिप संक्रमण के माध्यम से उत्पन्न होता है।
- ब्रह्मांडीय विस्तार इस विकिरण को खींचकर अधिक लंबी तरंगदैर्ध्य और कम आवृत्तियों में परिवर्तित कर देता है। इससे प्रारंभिक ब्रह्मांड के विभिन्न विकासात्मक चरणों का अध्ययन किया जा सकता है।
- ब्रह्मांडीय अंधकार युग बिग बैंग के लगभग 3,80,000 वर्ष बाद, पुनर्संयोजन के पश्चात शुरू हुआ और लगभग 10–30 करोड़ वर्ष बाद पहले तारों के उद्भव तक जारी रहा।
- इस रेडशिफ्टेड संकेत के अध्ययन से हाइड्रोजन के तापमान और वितरण, ब्रह्मांडीय संरचनाओं के विकास, पहले तारों और आकाशगंगाओं के निर्माण तथा डार्क मैटर की भूमिका के बारे में जानकारी मिल सकती है।
चंद्रमा से अवलोकन का महत्व
- पृथ्वी-आधारित सीमाओं से पार पाना: आयनमंडल तथा मानव-निर्मित रेडियो-फ्रीक्वेंसी हस्तक्षेप के कारण इतनी निम्न आवृत्तियों का अवलोकन करना कठिन है। लगभग 45 MHz से कम आवृत्तियों पर पृथ्वी से आधारित अवलोकन प्रभावी रूप से संभव नहीं हैं।
- प्राकृतिक रेडियो ढाल: चंद्रमा का दूरस्थ भाग पृथ्वी से आने वाले रेडियो संकेतों को रोक सकता है, जिससे अत्यंत कमजोर ब्रह्मांडीय संकेतों का पता लगाने के लिए अपेक्षाकृत रेडियो-शांत वातावरण उपलब्ध हो सकता है।
- अवलोकन की एक महत्वपूर्ण कमी को पूरा करना: प्रारंभिक ब्रह्मांड की लक्षित अवधि का अब तक प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन नहीं किया गया है, इसलिए यह ब्रह्मांडीय विकास को समझने के लिए एक नई खिड़की खोल सकता है।
- व्यापक वैज्ञानिक संभावनाएँ: इन मापों से डार्क मैटर, संरचना निर्माण तथा प्रारंभिक ब्रह्मांड से तारों और आकाशगंगाओं के उद्भव तक के संक्रमण को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिल सकती है।
- चंद्रमा पर रेडियो हस्तक्षेप की चुनौती: भविष्य के चंद्र मिशनों से रेडियो हस्तक्षेप उत्पन्न हो सकता है, जिससे वह अत्यंत रेडियो-शांत वातावरण प्रभावित हो सकता है, जिसका उपयोग कॉस्मोक्यूब करना चाहता है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग में नियुक्तियाँ
संदर्भ: सरकार ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (NCSK) में नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन सदस्यों की नियुक्ति की है। इससे सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और कल्याण की सुरक्षा के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत किया गया है।
अन्य संबंधित जानकारी
- भगवत प्रसाद मकवाना को अध्यक्ष तथा कैशब बिहारी को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
- मनोज कुमार बाल्मीकि, सुषमा गौड़ियाल और रवि रामू कालोसे को सदस्य नियुक्त किया गया है।
- इनकी नियुक्तियाँ 31 मार्च 2028 तक प्रभावी रहेंगी, जो 10वें राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के शेष कार्यकाल के अनुरूप है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के बारे में
- गठन: राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का गठन 12 अगस्त 1994 को राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधिनियम, 1993 के तहत किया गया था। प्रारंभ में इसका कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित किया गया था। यह अधिनियम 29 फरवरी 2004 को समाप्त हो गया।
- वर्तमान स्थिति: वर्ष 2004 से NCSK एक अस्थायी, गैर-सांविधिक निकाय के रूप में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन कार्य कर रहा है। इसका कार्यकाल समय-समय पर सरकारी प्रस्तावों के माध्यम से बढ़ाया जाता रहा है। वर्तमान कार्यकाल 31 मार्च 2028 तक है।
- संरचना: इसमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और पाँच सदस्य होते हैं, जिनमें एक महिला सदस्य शामिल होती है। आयोग को संयुक्त सचिव स्तर के सचिव का सहयोग प्राप्त होता है।
NCSK के अधिदेश एवं कार्य
- मैनुअल स्कैवेंजिंग संबंधी कानून: आयोग हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 के कार्यान्वयन की निगरानी करता है, शिकायतों की जांच करता है तथा इसके कार्यान्वयन के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देता है।
- कल्याण एवं पुनर्वास: आयोग विभिन्न कार्यक्रमों की सिफारिश, पुनर्वास योजनाओं का मूल्यांकन तथा सफाई कर्मचारियों से संबंधित शिकायतों की जांच करता है।
- कार्य दशाएँ: सरकारों, नगरपालिकाओं, पंचायतों तथा अन्य नियोक्ताओं द्वारा नियोजित सफाई कर्मचारियों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मजदूरी की निगरानी करता है।
- स्वतः संज्ञान एवं सूचना: आयोग कल्याणकारी उपायों/कानूनों के कार्यान्वयन न होने पर स्वतः संज्ञान ले सकता है तथा सरकारों और स्थानीय प्राधिकरणों से आवश्यक जानकारी मांग सकता है।
- सीवर में होने वाली मौतें: आयोग सीवर/सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों तथा उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। इसमें 2023 के डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्णय के तहत सीवर में होने वाली मौतों के लिए ₹30 लाख के मुआवजे का प्रावधान भी शामिल है।
