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सामान्य अध्ययन-1: विश्व में प्रमुख प्राकृतिक संसाधनों का वितरण।
सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण।
संदर्भ: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने वैश्विक जल संसाधनों की स्थिति में बढ़ती अनियमितता की सूचना दी है, जिसमें वर्ष 2022–2025 के दौरान भारत में भूजल की लगातार कमी दर्ज की गई है।
वैश्विक जल संसाधनों की स्थिति रिपोर्ट को समझना
• रिपोर्ट के बारे में: विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित की जाने वाली यह रिपोर्ट वैश्विक मीठे जल की उपलब्धता, जल विज्ञान संबंधी परिवर्तनशीलता और प्रवृत्तियों का मानकीकृत आकलन प्रस्तुत करती है। वर्ष 2025 का संस्करण इसका पाँचवाँ संस्करण है।
• दायरा: यह रिपोर्ट नदी प्रवाह, भूजल, जलाशयों और झीलों, मृदा नमी, वाष्पोत्सर्जन, स्थलीय जल भंडारण, हिम एवं बर्फ, जल का तापमान तथा जल विज्ञान संबंधी चरम घटनाओं का आकलन करती है।
• कार्यप्रणाली: इसमें स्थल-आधारित अवलोकनों, जल विज्ञान संबंधी मॉडलों और उपग्रह अवलोकनों को एकीकृत किया जाता है। वर्ष 2025 के संस्करण में 68 देशों के आँकड़ों को शामिल किया गया, जिनमें नदी प्रवाह के 3,115 और भूजल के 43,529 अवलोकन केंद्र शामिल थे।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
A. वैश्विक निष्कर्ष
• नदी प्रवाह: पिछले सात वर्षों में प्रतिवर्ष केवल 34–38% वैश्विक नदी बेसिन क्षेत्र में सामान्य प्रवाह की स्थिति रही, जबकि 1991–2020 का औसत 46% था।
• 2025 में नदी प्रवाह: वर्ष 2025 वैश्विक नदी प्रवाह के संदर्भ में 35 वर्षों के सबसे शुष्क वर्षों में से एक रहा; वैश्विक जलग्रहण क्षेत्र के 36% में सामान्य से कम प्रवाह दर्ज किया गया।
• स्थलीय जल भंडारण: वर्ष 2014–2016 से स्थलीय जल भंडारण (TWS) में लगातार गिरावट देखी गई है, जिसमें 2021–2025 के दौरान गंगा–सिंधु के उद्गम क्षेत्रों सहित कई क्षेत्रों में बार-बार कमी दर्ज की गई।
• भूजल: वर्ष 2025 में 34% निगरानी केंद्रों पर सामान्य से कम से लेकर बहुत कम भूजल स्तर दर्ज किया गया, जबकि 2024 में यह आँकड़ा 25% था।
• हिमनद: वर्ष 2025 के जल विज्ञान वर्ष में हिमनदों के द्रव्यमान में 408 ± 132 गीगाटन की कमी हुई, जो सभी प्रमुख हिमाच्छादित क्षेत्रों में लगातार चौथे वर्ष द्रव्यमान हानि को दर्शाता है।
• जल-संबंधी चरम घटनाएँ: पिछले पाँच वर्षों में एशिया और अफ्रीका में संयुक्त रूप से दर्ज की गई लगभग आधी जल-संबंधी चरम घटनाएँ हुईं तथा इनसे संबंधित रिपोर्ट की गई संबंधित मौतों में 80% से अधिक इन्हीं क्षेत्रों में हुईं।
B. भारत से संबंधित निष्कर्ष
• भूजल की कमी: भारत में 2022–2025 के दौरान लगातार भूजल की कमी देखी गई। वर्ष 2025 में उत्तर-पश्चिमी भारत में सामान्य से कम से लेकर बहुत कम भूजल स्तर लगातार और व्यापक रूप से दर्ज किए गए।
• स्थलीय जल भंडारण: वर्ष 2025 में उत्तरी भारत में सामान्य से कम स्थलीय जल भंडारण (TWS) दर्ज किया गया, जबकि गंगा–सिंधु के उद्गम क्षेत्रों में 2021–2025 के दौरान बार-बार सामान्य से कम स्थिति देखी गई।
• सतही जल में विरोधाभास: वर्ष 2025 में सिंधु, गंगा, गोदावरी और कृष्णा बेसिनों में सामान्य से अधिक से लेकर बहुत अधिक नदी प्रवाह दर्ज किया गया, इसके बावजूद भूजल पर लगातार दबाव बना रहा।
भारत में भूजल में गिरावट के पीछे के कारक
• अत्यधिक दोहन: WMO के अनुसार, कई क्षेत्रों में लगातार बनी भूजल की कमी का एक प्रमुख कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है।
• निकासी–पुनर्भरण असंतुलन: भूजल का गहन उपयोग, विशेष रूप से सिंचाई के लिए, संकटग्रस्त जलभृतों के प्राकृतिक और कृत्रिम पुनर्भरण की क्षमता से अधिक हो सकता है।
• जलवायु परिवर्तनशीलता: वर्षा के बदलते स्वरूप और लंबे समय तक चलने वाली शुष्क अवधि भूजल पुनर्भरण को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि बढ़ा हुआ वाष्पोत्सर्जन जल की माँग को बढ़ा सकता है।
• पुनर्भरण में बाधाएँ: शहरीकरण और स्थानीय जल निकायों के क्षरण से जल का अंतःस्रवण तथा भूजल पुनर्भरण कम हो सकता है।
भारत के लिए निहितार्थ
• कृषि: लगातार भूजल ह्रास से भूजल-आधारित सिंचाई की विश्वसनीयता कम हो सकती है और सूखे के प्रति कृषि की संवेदनशीलता बढ़ सकती है।
• पेयजल सुरक्षा: भूजल स्तर में गिरावट से विशेष रूप से शुष्क अवधि के दौरान भूजल-आधारित पेयजल स्रोतों की सततता प्रभावित हो सकती है।
• सूखा प्रतिरोधक क्षमता: वर्षा की कमी के दौरान भूजल एक बफर के रूप में कार्य करता है; इसलिए इसका लगातार ह्रास भारत की सूखे से निपटने की क्षमता को कम करता है।
• एकीकृत जल सुरक्षा: सामान्य से अधिक नदी प्रवाह और लगातार भूजल की कमी के बीच का विरोधाभास इस आवश्यकता को रेखांकित करता है कि सतही जल और भूजल को परस्पर संबद्ध संसाधनों के रूप में प्रबंधित किया जाए।
भारत की प्रतिक्रिया
• NAQUIM: राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम जलभृतों का मानचित्रण करता है और सतत भूजल उपयोग के लिए प्रबंधन योजनाएँ तैयार करता है।
• अटल भूजल योजना: जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में समुदाय-आधारित भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है, जिसमें जल बजट और जल सुरक्षा योजनाएँ शामिल हैं।
• कैच द रेन: जल शक्ति अभियान के तहत वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जाता है।
• मिशन अमृत सरोवर: स्थानीय जल संरक्षण और भंडारण को मजबूत करने के लिए जल निकायों के निर्माण और पुनर्जीवन पर ध्यान केंद्रित करता है।
आगे की राह
• माँग का प्रबंधन: जल-कुशल सिंचाई, फसल विविधीकरण और बेहतर कृषि पद्धतियों के माध्यम से अस्थिर एवं अत्यधिक भूजल निकासी को कम करना।
• पुनर्भरण को मजबूत करना: जल निकायों और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों का संरक्षण करते हुए वैज्ञानिक रूप से नियोजित वर्षा जल संचयन उपायों का विस्तार करना।
• जलभृत-आधारित नियोजन अपनाना: नियोजन में भूजल, सतही जल, वर्षा और स्थानीय जल माँग को एकीकृत करना।
• निगरानी में सुधार: निगरानी नेटवर्क, वास्तविक समय आधारित निगरानी तथा पारदर्शी जल विज्ञान संबंधी आँकड़ों के आदान-प्रदान का विस्तार करना।
