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सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय करार; भारत के हितों पर विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव|

संदर्भ: ईरान के चाबहार बंदरगाह पर आधारित भारत की रणनीतिक कनेक्टिविटी परियोजना क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों में वृद्धि तथा अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली छूट की अवधि समाप्त होने के कारण एक बार फिर चुनौतियों का सामना कर रही है। इससे परियोजना के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, हालांकि भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास एवं संचालन के प्रति अपनी निरंतर प्रतिबद्धता दोहराई है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • हाल ही में ईरान पर अमेरिकी हवाई हमलों के दौरान चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र के निकट कुछ क्षेत्रों को क्षति पहुँचने की सूचना मिली, जिससे भारत की इस महत्वपूर्ण रणनीतिक संपर्क परियोजना की सुरक्षा को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
  • हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया है कि शहीद बेहेश्ती टर्मिनल, जिसका संचालन इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) द्वारा किया जा रहा है, सुरक्षित है तथा उसका संचालन सामान्य रूप से जारी है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा 2018 में अफगानिस्तान के आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए चाबहार परियोजना को प्रतिबंधों से छूट प्रदान की गई थी। यह छूट सितंबर 2025 में समाप्त कर दी गई, बाद में छह माह के लिए पुनः लागू की गई, किंतु अप्रैल 2026 में इसकी अवधि समाप्त हो गई। इससे चाबहार में भारत की गतिविधियों को लेकर पुनः अनिश्चितता उत्पन्न हो गई।
  • ये घटनाक्रम दर्शाते हैं कि क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनाव दक्षिण एशिया को मध्य एशिया एवं यूरेशिया से जोड़ने वाली संपर्क परियोजनाओं को लगातार प्रभावित कर रहे हैं।

चाबहार बंदरगाह के बारे में

  • रणनीतिक स्थिति: चाबहार, ईरान का एकमात्र महासागरीय गहरे जल का बंदरगाह है, जो सिस्तान–बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर तथा हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के बाहर स्थित है।
  • बंदरगाह की संरचना: चाबहार बंदरगाह में शहीद बेहेश्ती तथा शहीद कलंतरी दो टर्मिनल हैं। इनमें शहीद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) द्वारा किया जाता है।
  • भारत की भागीदारी: भारत वर्ष 2003 से चाबहार बंदरगाह के विकास में सहयोग कर रहा है। मई 2024 में भारत और ईरान के बीच 10-वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड को शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन एवं आधुनिकीकरण का अधिकार मिला। यह भारत का विदेश में सबसे लंबी अवधि का बंदरगाह प्रबंधन समझौता है।
  • संस्थागत ढाँचा: भारत–ईरान–अफगानिस्तान त्रिपक्षीय समझौता (2016) चाबहार को क्षेत्रीय व्यापार एवं पारगमन केंद्र के रूप में विकसित करने का आधार प्रदान करता है।
  • भारत का निवेश: भारत ने टर्मिनल के उन्नयन एवं उपकरणों की स्थापना के लिए 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता जताई है तथा संबंधित अवसंरचना परियोजनाओं के लिए 25 करोड़ अमेरिकी डॉलर की ऋण सहायता भी प्रदान की है।
  • क्षेत्रीय संपर्क का केंद्र: चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान, मध्य एशिया एवं यूरेशिया तक सीधी पहुँच उपलब्ध कराता है तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्त्वपूर्ण समुद्री केंद्र भी है।

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह का महत्त्व

  • पाकिस्तान को दरकिनार करने का विकल्प: चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तानी क्षेत्र का उपयोग किए बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच प्रदान करता है, जिससे भारत की रणनीतिक स्वायत्तता सुदृढ़ होती है।
  • क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करता है: यह अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक महत्त्वपूर्ण प्रवेश द्वार है, जो मध्य एशिया, रूस और यूरोप के साथ व्यापार में परिवहन समय एवं लागत को कम करता है।
  • रणनीतिक संतुलन स्थापित करता है: पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के निकट स्थित होने के कारण चाबहार, चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के माध्यम से क्षेत्र में बढ़ते चीन के प्रभाव के बीच उत्तर-पश्चिमी हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करता है।
  • व्यापार एवं ऊर्जा संपर्क में विविधता: यह भारत के व्यापारिक मार्गों में विविधता लाता है, प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध मध्य एशिया तक पहुँच आसान बनाता है तथा क्षेत्रीय आपूर्ति श्रृंखला का लचीलापन बढ़ाता है।
  • मानवीय सहायता का माध्यम: चाबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत, पाकिस्तान के रास्ते की अनुपलब्धता के बावजूद, अफगानिस्तान को गेहूँ, दवाइयाँ तथा अन्य मानवीय सहायता पहुँचाने में सफल रहा है।

चाबहार परियोजना भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना क्यों कर रही है?

  • क्षेत्रीय संघर्ष में वृद्धि: ईरान–अमेरिका–इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा दिया है, जिससे समुद्री परिवहन, बंदरगाह संचालन एवं क्षेत्रीय व्यापार को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है।
  • अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली छूट की समाप्ति: प्रतिबंधों से मिली छूट समाप्त होने के कारण वित्तपोषण, समुद्री परिवहन, बीमा तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी जटिल हो गई है, जिससे बंदरगाह की व्यावसायिक व्यवहार्यता प्रभावित हुई है।
  • रणनीतिक संतुलन की चुनौती: भारत को एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी बनाए रखना है। प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक हितों के बीच चाबहार परियोजना का प्रभावी संचालन चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
  • रणनीतिक बढ़त खोने का जोखिम: यदि चाबहार को लेकर अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहती है, तो चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के अंतर्गत ग्वादर बंदरगाह का रणनीतिक महत्त्व और बढ़ सकता है, जिससे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के क्षेत्र में भारत की रणनीतिक बढ़त कमजोर पड़ सकती है।

आगे की राह

  • संचालन में स्थिरता सुनिश्चित करना: भारत को अमेरिका और ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद जारी रखते हुए चाबहार बंदरगाह के निर्बाध संचालन के लिए एक स्थिर एवं पूर्वानुमेय व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, साथ ही प्रतिबंधों से संबंधित चिंताओं का समाधान भी करना चाहिए।
  • मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी में तेजी लाना: चाबहार को अंतरराष्ट्रीय उत्तर–दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जोड़ने वाले रेल एवं लॉजिस्टिक नेटवर्क के विकास में तेजी लाने से माल परिवहन अधिक सुगम होगा तथा बंदरगाह की व्यावसायिक व्यवहार्यता बढ़ेगी।
  • क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को मजबूत करना: ईरान, मध्य एशियाई देशों तथा INSTC के अन्य साझेदार देशों के साथ सहयोग का विस्तार कर माल परिवहन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है तथा चाबहार को क्षेत्रीय पारगमन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
  • दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिबद्धता बनाए रखना: भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद, निरंतर निवेश, अवसंरचना विकास तथा नीतिगत निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है, ताकि चाबहार बंदरगाह को अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरेशिया के लिए भारत के विश्वसनीय प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित किया जा सके।
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