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GS-2: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से उत्पन्न विषय।

संदर्भ: प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खनन से प्रभावित समुदायों को कल्याणकारी पहलों, पर्यावरण संरक्षण और सतत आजीविका के अवसरों के माध्यम से खनिज संपदा का लाभ मिले।

प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के बारे में

• खनन संबंधी गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के कल्याण एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए इस योजना की शुरुआत 17 सितंबर 2015 को की गई थी।

• योजना का कार्यान्वयन जिला खनिज फाउंडेशन (DMFs) द्वारा खनन पट्टाधारकों से एकत्रित निधि के माध्यम से किया जाता है।

• इसका उद्देश्य खनन के कारण पर्यावरण, स्वास्थ्य और स्थानीय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को न्यूनतम करना तथा सतत आजीविका को बढ़ावा देना है।

• यह योजना खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 के अंतर्गत संचालित होती है। इसके तहत राज्यों के लिए PMKKKY के प्रावधानों को अपने DMF नियमों में शामिल करना आवश्यक है। जनवरी 2024 में जारी संशोधित दिशा-निर्देश विकास एवं कल्याणकारी परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए एक अद्यतन रूपरेखा प्रदान करते हैं।

योजना की प्रमुख विशेषताएँ

जिला खनिज फाउंडेशन (DMFs): जिला खनिज फाउंडेशन गैर-लाभकारी न्यास हैं, जिन्हें खान और खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 में वर्ष 2015 में किए गए संशोधन के तहत स्थापित किया गया था। इनका उद्देश्य संबंधित राज्य सरकारों की निगरानी में खनन गतिविधियों से प्रभावित लोगों और क्षेत्रों के हित एवं कल्याण के लिए कार्य करना है।

वित्तपोषण तंत्र: खनन पट्टाधारक निकाले गए खनिजों पर देय रॉयल्टी के आधार पर DMF में योगदान करते हैं। 12 जनवरी 2015 से पहले प्रदान किए गए पट्टों के लिए रॉयल्टी का 30% और इस तिथि को या इसके बाद प्रदान किए गए पट्टों के लिए रॉयल्टी का 10% योगदान निर्धारित किया गया है।

खनन-प्रभावित क्षेत्रों का दायरा: PMKKKY के अंतर्गत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं। प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्र वे हैं जहाँ खनन और उससे संबंधित गतिविधियाँ संचालित होती हैं, जबकि अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्रों में खनन के कारण प्रदूषण, भूजल का ह्रास अथवा पर्यावरणीय गुणवत्ता में गिरावट देखने को मिलती है। प्रभावित व्यक्तियों में पारंपरिक अथवा व्यवसायगत अधिकार रखने वाले परिवार और व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं।

निधि का उपयोग: संशोधित रूपरेखा के अंतर्गत PMKKKY की कम-से-कम 70% निधि उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में व्यय की जानी है। इनमें पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और आजीविका सृजन शामिल हैं। वहीं, अधिकतम 30% निधि का उपयोग भौतिक अवसंरचना, सिंचाई, ऊर्जा और जल-संभर विकास के लिए किया जा सकता है।

कमजोर समुदायों के लिए सुरक्षा उपाय: राज्य सरकारों को DMF नियम तैयार करते समय अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) तथा अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अनुरूप कार्य करना आवश्यक है। इसका उद्देश्य कमजोर समुदायों के अधिकारों और आवश्यकताओं पर समुचित ध्यान सुनिश्चित करना है।

महत्त्व

खनन-प्रभावित क्षेत्रों का विकास: PMKKKY खनन से प्राप्त राजस्व को आवश्यक सेवाओं, अवसंरचना और कल्याणकारी परियोजनाओं की ओर निर्देशित करती है। इससे प्रभावित समुदायों के जीवन स्तर में सुधार करने में सहायता मिलती है।

व्यापक स्तर पर कार्यान्वयन: जुलाई 2026 तक ₹1,09,938 करोड़ मूल्य की 4.70 लाख से अधिक परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी थी, जिनमें से 2,92,156 परियोजनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं। इसके अतिरिक्त, 78,809 परियोजनाएँ क्रियान्वयनाधीन थीं, जिनके लिए ₹30,512 करोड़ से अधिक की निधि प्रतिबद्ध की गई थी।

पर्यावरण एवं आजीविका संरक्षण: यह योजना प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, स्वास्थ्य सेवाओं, कौशल विकास और सतत आजीविका के अवसरों को समर्थन प्रदान करती है। इससे समुदायों को खनन के दीर्घकालिक प्रभावों से निपटने में सहायता मिलती है।

सामाजिक न्याय एवं समावेशी विकास: विस्थापित परिवारों, जनजातीय समुदायों और पारंपरिक अधिकार रखने वाले लोगों की आवश्यकताओं को मान्यता देकर PMKKKY यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि खनिज संसाधनों से प्राप्त लाभ उनके उत्खनन से प्रभावित लोगों तक भी पहुँचे।

चुनौतियाँ

प्रभावी कार्यान्वयन: स्वीकृत परियोजनाओं को समयबद्ध रूप से पूरा करना और DMF निधियों का कुशल एवं प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि प्रभावित समुदायों तक ठोस लाभ पहुँच सके।

सहभागितापूर्ण शासन: ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को सुदृढ़ करने से पारदर्शिता बढ़ सकती है। इससे यह सुनिश्चित करने में भी सहायता मिलेगी कि परियोजनाएँ वास्तविक स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हों।

निधि का लक्षित उपयोग: यह सुनिश्चित करना कि संसाधन वास्तव में प्रभावित लोगों तक पहुँचें और उनकी सबसे आवश्यक कल्याण एवं विकास संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता मिले, एक महत्त्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।

दीर्घकालिक सततता: खनन-आधारित आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही, खनन गतिविधियाँ समाप्त होने के बाद भी सतत आजीविका सुनिश्चित करने के लिए निरंतर नीतिगत ध्यान जरूरी है।

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