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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संदर्भ: हाल ही में केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (केबीएलपी) को लेकर मध्य प्रदेश में जनजातीय समुदायों द्वारा विस्थापन, पुनर्वास, वन अधिकारों तथा पर्यावरणीय प्रभावों से संबंधित चिंताओं के कारण विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
अन्य संबंधित जानकारी

- मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में प्रस्तावित दौधन बाँध स्थल पर जनजातीय समुदायों तथा अन्य परियोजना-प्रभावित परिवारों ने उचित पुनर्वास, मुआवजा तथा अपने अधिकारों की सुरक्षा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।
- प्रदर्शनकारियों ने जल सत्याग्रह, चिता आंदोलन (प्रतीकात्मक चिता प्रदर्शन), फाँसी आंदोलन (प्रतीकात्मक फाँसी का फंदा प्रदर्शन), चूल्हाबंदी तथा भूख हड़ताल सहित विभिन्न प्रकार के आंदोलन अपनाए।
- इन विरोध प्रदर्शनों ने बड़े अवसंरचनात्मक परियोजनाओं, पर्यावरण संरक्षण, जनजातीय अधिकारों तथा सतत जल संसाधन प्रबंधन के बीच संतुलन स्थापित करने की बहस को पुनः तेज कर दिया है।
केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की समझ
- नदी अंतर-संबंध कार्यक्रम का हिस्सा: यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (NPP) के अंतर्गत क्रियान्वित की जा रही पहली नदी जोड़ो परियोजना है। इसका उद्देश्य जल-अधिशेष नदी बेसिनों से जल-अभाव वाले नदी बेसिनों तक जल का स्थानांतरण करना है, ताकि सिंचाई, पेयजल आपूर्ति तथा क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा दिया जा सके। इसके लिए जलाशयों और नहरों के नेटवर्क का निर्माण किया जा रहा है।
- परियोजना का विकासक्रम: राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण (NWDA) ने 1980 के दशक के प्रारंभ में इस परियोजना को प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में शामिल किया। मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों तथा केंद्र सरकार ने 2005 में विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार करने पर सहमति व्यक्त की। मार्च 2021 में त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (एमओए) पर हस्ताक्षर किए गए तथा दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस परियोजना को मंजूरी प्रदान की।
- परियोजना का आधार: यह परियोजना इस अवधारणा पर आधारित है कि केन नदी बेसिन अपेक्षाकृत जल-अधिशेष है, जबकि बेतवा नदी बेसिन जल-अभाव वाला क्षेत्र है। इसलिए अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण के माध्यम से केन नदी का जल बेतवा नदी बेसिन तक पहुँचाकर बुंदेलखंड क्षेत्र की दीर्घकालिक जल संकट की समस्या का समाधान करने का लक्ष्य रखा गया है।
- प्रमुख घटक: परियोजना के अंतर्गत केन नदी पर दौधन बाँध, 221 किलोमीटर लंबी संपर्क नहर, सुरंगों तथा अन्य संबंधित अवसंरचना का निर्माण प्रस्तावित है। इसमें लोअर ओर परियोजना, कोठा बैराज तथा बीना बहुउद्देशीय परियोजना भी शामिल हैं। परियोजना के क्रियान्वयन हेतु विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) के रूप में केन–बेतवा लिंक परियोजना प्राधिकरण (KBLPA) का गठन किया गया है।

- अपेक्षित लाभ: इस परियोजना से निम्नलिखित लाभ मिलने की अपेक्षा है—प्रतिवर्ष लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। 103 मेगावाट जलविद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा। सूखा-प्रवण बुंदेलखंड क्षेत्र में जल सुरक्षा तथा कृषि उत्पादकता में वृद्धि होगी।
परियोजना का विरोध क्यों हो रहा है?
- विस्थापन एवं पुनर्वास: हजारों परियोजना-प्रभावित परिवारों, विशेषकर जनजातीय समुदायों, ने विस्थापन को लेकर चिंता व्यक्त की है।उनका आरोप है कि मुआवजा, पुनर्वास तथा दीर्घकालिक आजीविका पुनर्स्थापन की व्यवस्थाएँ पर्याप्त नहीं हैं।
- मुआवजा एवं भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे: प्रदर्शनकारियों ने भूमि के मूल्यांकन, मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया तथा पुनर्वास की धीमी गति पर प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने पुनर्वास उपायों के पारदर्शी एवं न्यायसंगत क्रियान्वयन की मांग की है।
- वन अधिकारों से संबंधित चिंताएँ: जनजातीय समुदायों का आरोप है कि सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकारों तथा अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के अंतर्गत प्राप्त अन्य अधिकारों को विस्थापन से पहले पूर्ण रूप से मान्यता या निस्तारित नहीं किया गया।
- पारिस्थितिकीय चिंताएँ: इस परियोजना के कारण वन क्षेत्रों का जलमग्न होना, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व के कुछ हिस्से भी शामिल हैं, एक प्रमुख चिंता का विषय है। इसके अतिरिक्त केन घड़ियाल अभयारण्य, गिद्धों के आवास तथा व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र की संपर्कता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर भी चिंताएँ व्यक्त की गई हैं। हालाँकि, सरकारी एजेंसियों का कहना है कि पर्यावरण एवं वन्यजीव संबंधी स्वीकृतियाँ आवश्यक शमन उपायों एवं परिदृश्य प्रबंधन योजनाओं की शर्तों के साथ प्रदान की जा चुकी हैं।
- प्रक्रियात्मक एवं सुशासन संबंधी मुद्दे: प्रदर्शनकारियों ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास तथा परियोजना के क्रियान्वयन से जुड़े निर्णयों में अधिक पारदर्शिता, व्यापक जन-परामर्श तथा ग्राम सभाओं की सार्थक भागीदारी की मांग की है।
परियोजना का महत्त्व
- भारत के नदी अंतर-संबंध कार्यक्रम के लिए एक आदर्श परियोजना: क्रियान्वयन के चरण में पहुँची पहली नदी जोड़ो परियोजना होने के कारण केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना भविष्य में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत प्रस्तावित अन्य नदी जोड़ो परियोजनाओं के लिए मानक (बेंचमार्क) का कार्य करेगी।
- बुंदेलखंड में जल सुरक्षा को सुदृढ़ करना: यह परियोजना भारत के सबसे अधिक सूखा-प्रवण क्षेत्रों में से एक बुंदेलखंड में सिंचाई तथा पेयजल उपलब्धता बढ़ाकर दीर्घकालिक जल संकट का समाधान करने का प्रयास करती है।
- समेकित जल संसाधन प्रबंधन को बढ़ावा: अंतर-बेसिन जल स्थानांतरण के माध्यम से यह परियोजना भिन्न-भिन्न जल उपलब्धता वाले नदी बेसिनों के बीच जल संसाधनों का अधिकतम एवं संतुलित उपयोग सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
- क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक विकास को गति: सिंचाई में वृद्धि, जल की बेहतर उपलब्धता तथा ऊर्जा उत्पादन से मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में कृषि उत्पादकता, रोजगार के अवसर तथा ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलने की अपेक्षा है।
