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सामान्य अध्ययन-2: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, एजेंसियाँ और मंच – उनकी संरचना, अधिदेश।
संदर्भ: हाल ही में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने निर्णय दिया है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत एक “लोक प्राधिकारी” नहीं है, और इसलिए इसे इस कानून के तहत जानकारी प्रकट करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
अन्य संबंधित जानकारी:
- केंद्रीय सूचना आयोग ने यह निर्णय आरटीआई (RTI) अधिनियम के तहत बीसीसीआई से मांगी गई जानकारी से संबंधित अपीलों की सुनवाई के दौरान दिया है।
- इससे पहले, वर्ष 2018 में सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलु की अध्यक्षता वाली सीआईसी की एक पीठ ने बीसीसीआई को एक लोक प्राधिकारी माना था और उसे केंद्रीय जन सूचना अधिकारी (CPIOs) नियुक्त करने तथा आरटीआई अधिनियम के तहत प्रकटीकरण दायित्वों का पालन करने का निर्देश दिया था।
- बीसीसीआई ने वर्ष 2018 के इस आदेश को मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी थी, जिसने वर्ष 2025 में सीआईसी के आदेश को रद्द कर दिया था और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के प्रासंगिक निर्णयों के आलोक में नए सिरे से विचार करने के लिए इस मामले को वापस आयोग (CIC) के पास भेज दिया था।
- अब, अपने नए निर्णय में केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने ही वर्ष 2018 के आदेश को पलट दिया है और यह माना है कि बीसीसीआई न तो सरकार द्वारा “सारभूत रूप से वित्तपोषित” (substantially financed) होने की वैधानिक आवश्यकता को पूरा करता है, और न ही केवल इसलिए स्वतः कोई लोक प्राधिकारी बन जाता है क्योंकि यह भारत में क्रिकेट को विनियमित करता है।
सीआईसी के निर्णय के मुख्य बिंदु
- धारा 2(h) के तहत बीसीसीआई “लोक प्राधिकारी” नहीं है:
- सीआईसी ने यह माना कि बीसीसीआई, आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h) के तहत एक “लोक प्राधिकारी” के रूप में अर्हता पूरी नहीं करता है। इस धारा के अंतर्गत वे निकाय आते हैं जो संविधान द्वारा, संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए कानून द्वारा स्थापित किए गए हों, अथवा सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सारभूत रूप से वित्तपोषित हों।
- आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि बीसीसीआई ‘तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण अधिनियम’ के तहत एक निजी सोसायटी के रूप में पंजीकृत है और इसका निर्माण किसी संविधि/कानून के माध्यम से नहीं हुआ है।
- सरकार द्वारा कोई सारभूत वित्तपोषण नहीं:
- सीआईसी ने यह रेखांकित किया कि बीसीसीआई, वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर है और मुख्य रूप से मीडिया अधिकारों, प्राहैयोजन, प्रसारण समझौतों तथा क्रिकेट से संबंधित व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से राजस्व अर्जित करता है।
- आयोग ने यह माना कि कर रियायतें, भूमि आवंटन या सुरक्षा व्यवस्था जैसे अप्रत्यक्ष लाभ, आरटीआई अधिनियम के तहत “सारभूत वित्तपोषण” की श्रेणी में नहीं आते हैं।
- केवल सार्वजनिक कार्य करना ही अपर्याप्त है:
- आयोग ने यह पाया कि यद्यपि बीसीसीआई राष्ट्रीय क्रिकेट टीम का चयन करने, क्रिकेट को विनियमित करने, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने और प्रमुख टूर्नामेंटों का आयोजन करने जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्य करता है, फिर भी केवल इन कार्यों के आधार पर इसे आरटीआई अधिनियम के तहत लोक प्राधिकारी के रूप में वर्गीकृत करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
- इस आदेश में आरटीआई ढांचे के तहत “सार्वजनिक महत्व” और वैधानिक दर्जे के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित किया गया।
- सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों पर निर्भरता:
- सीआईसी ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों, जैसे ‘ज़ी टेलीफिल्म्स लिमिटेड बनाम भारत संघ (2005)’ और लोढ़ा समिति से जुड़े ‘बीसीसीआई सुधार मामले (2016)’ का संदर्भ लिया।
- ज़ी टेलीफिल्म्स मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना था कि बीसीसीआई, संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” (State) नहीं है, भले ही वह कुछ सार्वजनिक कर्तव्यों का निष्पादन करता हो।

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के बारे में
- सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 को नागरिकों को लोक प्राधिकारियों के पास मौजूद सूचनाओं तक पहुँच प्रदान करके पारदर्शिता, जवाबदेही और सहभागी शासन को बढ़ावा देने के लिए अधिनियमित किया गया था।
- यह अधिनियम माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त, संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के तहत सूचना के मौलिक अधिकार को व्यावहारिक/क्रियाशील बनाता है।
- धारा 2(h) के तहत, एक “लोक प्राधिकारी” में वे निकाय शामिल हैं जो संविधान द्वारा, संसदीय/राज्य कानूनों द्वारा, सरकारी अधिसूचनाओं द्वारा स्थापित किए गए हों, अथवा सरकार द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सारभूत रूप से वित्तपोषित हों।
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के बारे में
- केंद्रीय सूचना आयोग, आरटीआई अधिनियम 2005 के तहत स्थापित शीर्ष वैधानिक निकाय है, जिसका कार्य केंद्रीय लोक प्राधिकारियों के अंतर्गत सूचना तक पहुँच से संबंधित अपीलों और शिकायतों की सुनवाई करना है।
- केंद्रीय सूचना आयोग में निम्नलिखित शामिल होते हैं:
- एक मुख्य सूचना आयुक्त,
- और अधिकतम दस सूचना आयुक्त, जिनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- आयोग के पास रिकॉर्ड मंगवाने, साक्ष्यों की जांच करने और सूचना प्रकट करने का निर्देश देने से जुड़े मामलों में एक सिविल न्यायालय के समान शक्तियाँ होती हैं।
- सीआईसीआरटी, आई अधिनियम के तहत द्वितीय अपीलों का न्यायनिर्णयन करता है और सार्वजनिक प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही को लागू करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
