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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण; औद्योगिक नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर उनके प्रभाव।
संदर्भ: केंद्र सरकार ने हाल ही में पेट्रोलियम रिफाइनरियों और कपड़ा इकाइयों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्यों में संशोधन किया है। भारत के कार्बन-बाजार ढाँचे के तहत उनके आधार-वर्षों और अनुपालन समय-सारिणी में संशोधन किया गया है।
उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्यों में प्रमुख बदलाव
- संशोधित समय-सारिणी: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य (संशोधन) नियम, 2026 के तहत पेट्रोलियम रिफाइनरी और कपड़ा क्षेत्रों के लिए दूसरी अनुसूची में दिए गए मौजूदा प्रविष्टियों को बदला गया है।
- रिफाइनरियों के आधार-वर्ष: कई रिफाइनरियों के आधारभूत उत्सर्जन-तीव्रता मूल्यों में संशोधन किया गया है। इनमें डिगबोई, गुजरात, गुवाहाटी, हल्दिया, मथुरा, पानीपत और पारादीप स्थित इंडियन ऑयल की रिफाइनरियाँ शामिल हैं। इनके संबंधित लक्ष्यों में भी बदलाव किए गए हैं।
- अनुपालन समय-सारिणी: संशोधित समय-सारिणी में 2026–27 के लिए संख्यात्मक लक्ष्य बनाए रखे गए हैं, जबकि 2025–26 के लक्ष्य कॉलम में कोई संख्यात्मक लक्ष्य नहीं दिया गया है।
- दायरा: संशोधित समय-सारिणी में 21 पेट्रोलियम रिफाइनरियों और 173 कपड़ा इकाइयों को शामिल किया गया है, जो निर्दिष्ट कपड़ा उप-क्षेत्रों के अंतर्गत आती हैं।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्यों को समझना
- GEI क्या है? ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता (GEI) से आशय औद्योगिक उत्पादन की प्रति इकाई होने वाले ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन की मात्रा से है, जिसे कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य के रूप में व्यक्त किया जाता है।
- तीव्रता बनाम पूर्ण उत्सर्जन: पूर्ण उत्सर्जन लक्ष्य का उद्देश्य कुल उत्सर्जन को कम करना होता है, जबकि उत्सर्जन-तीव्रता लक्ष्य का उद्देश्य उत्पादन की प्रति इकाई उत्सर्जन को कम करना होता है। इस प्रकार, उत्सर्जन-तीव्रता में कमी के साथ उत्पादन में वृद्धि जारी रह सकती है।
- ढाँचे का विकास: सरकार ने पहली बार अक्टूबर 2025 में एल्युमिनियम, सीमेंट, क्लोर-एल्कली और लुगदी एवं कागज क्षेत्रों के लिए जीईआई लक्ष्य अधिसूचित किए थे, जिनमें 282 बाध्यकारी संस्थाओं को शामिल किया गया था। जनवरी 2026 में इस ढाँचे का विस्तार द्वितीयक एल्युमिनियम, पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल और कपड़ा क्षेत्रों तक किया गया, जिससे 208 अतिरिक्त संस्थाएँ जुड़ीं और कुल कवरेज 490 बाध्यकारी संस्थाओं तक पहुँच गई।
- वर्तमान संशोधन: सितंबर 2026 के संशोधन में अब पेट्रोलियम रिफाइनरी और कपड़ा क्षेत्रों के लिए पहले अधिसूचित प्रविष्टियों को प्रतिस्थापित किया गया है तथा उनकी आधारभूत उत्सर्जन-तीव्रता और संबंधित लक्ष्यों में संशोधन किया गया है।
- आधारभूत मान और लक्ष्य: प्रत्येक बाध्यकारी संस्था का आकलन एक निर्दिष्ट आधारभूत उत्सर्जन-तीव्रता और संबंधित अनुपालन वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य के आधार पर किया जाता है। वर्तमान ढाँचे में जनवरी 2026 में अधिसूचित अतिरिक्त क्षेत्रों के लिए 2023–24 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग किया गया है।
- तीव्रता-आधारित लक्ष्यों की आवश्यकता क्यों? ये लक्ष्य उद्योगों को ऊर्जा दक्षता, उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार और कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जबकि आर्थिक गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति देते हैं।
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना: यह कैसे काम करती है?
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS): 2023 में अधिसूचित सीसीटीएस भारत के भारतीय कार्बन बाजार (आईसीएम) के लिए व्यापक ढाँचा प्रदान करती है। इसका उद्देश्य कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्रों (CCC) के व्यापार के माध्यम से उत्सर्जन का मूल्य निर्धारण करके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, हटाना या रोकना है।
- अनुपालन तंत्र: निर्दिष्ट ऊर्जा-गहन उद्योगों को बाध्यकारी संस्थाओं के रूप में नामित किया जाता है और उन्हें संस्था-विशिष्ट जीईआई लक्ष्य दिए जाते हैं। जो संस्थाएँ अपने निर्धारित लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, वे सीसीसी प्राप्त करने के लिए पात्र होती हैं। इन सीसीसी का व्यापार उन बाध्यकारी संस्थाओं के साथ किया जा सकता है, जो अपने निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में असमर्थ रहती हैं।
- दो तंत्र: भारतीय कार्बन बाजार में बाध्यकारी उद्योगों के लिए अनुपालन तंत्र तथा ऑफसेट तंत्र शामिल हैं। ऑफसेट तंत्र के तहत पात्र उत्सर्जन-कमी, उत्सर्जन-हटाने या उत्सर्जन-परिहार परियोजनाएँ स्वीकृत कार्यप्रणालियों के अनुसार कार्बन क्रेडिट उत्पन्न कर सकती हैं।
- निगरानी और सत्यापन: इस ढाँचे में निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रक्रियाएँ तथा कार्बन सत्यापन एजेंसियों का प्रत्यायन शामिल है, ताकि उत्सर्जन में कमी और कार्बन क्रेडिट की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।
- संस्थागत संरचना: भारतीय कार्बन बाजार के समग्र प्रशासन के लिए एक राष्ट्रीय संचालन समिति है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) प्रशासक के रूप में तथा ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया रजिस्ट्री के रूप में कार्य करता है।
- गैर-अनुपालन: निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करने में विफल रहने वाली बाध्यकारी संस्थाओं पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जा सकती है। वर्तमान जीईआई ढाँचे में इस क्षतिपूर्ति को कार्बन क्रेडिट बाजार की कीमतों से जोड़ा गया है।
भारत का कार्बन बाजार: महत्त्व और चिंताएँ
- औद्योगिक कार्बन-मुक्ति: जीईआई लक्ष्य ऊर्जा-गहन उद्योगों को स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने, दक्षता में सुधार करने और उत्सर्जन-तीव्रता को कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।
- कार्बन मूल्य निर्धारण: उत्सर्जन में कमी को व्यापार योग्य मूल्य प्रदान करके, भारतीय कार्बन बाजार का उद्देश्य औद्योगिक निर्णय-निर्माण में कार्बन उत्सर्जन की लागत को शामिल करना है।
- जलवायु लक्ष्य: कार्बन बाजार भारत की कम-कार्बन विकास और 2070 तक दीर्घकालिक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। सरकार ने अपने 2035 के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) लक्ष्यों को भी मजबूत किया है, जिसमें 2005 के स्तर की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन-तीव्रता में 47% की कमी का लक्ष्य शामिल है।
- बाजार की अखंडता: प्रभावी निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV), सत्यापन तथा विश्वसनीय कार्यप्रणालियाँ यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि व्यापार किए जाने वाले क्रेडिट वास्तविक उत्सर्जन-कमी के अनुरूप हों और दोहरी गणना जैसे जोखिमों को न्यूनतम किया जा सके।
- पूर्वानुमेयता: लक्ष्यों की समय पर अधिसूचना और स्थिर अनुपालन आवश्यकताएँ उद्योगों के लिए दीर्घकालिक कार्बन-मुक्ति निवेश की योजना बनाने तथा कार्बन बाजार में विश्वसनीय मूल्य संकेत विकसित करने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
