संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—विकास तथा अनुप्रयोग एवं रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) 27–29 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित उभरते विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार सम्मेलन (ESTIC-2026) में चर्चा की गई उभरती ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में शामिल था।

अन्य संबंधित जानकारी

  • ESTIC-2026: सम्मेलन के दूसरे संस्करण का आयोजन वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा “रचनात्मक मस्तिष्क, विज्ञान को उत्प्रेरित करना, प्रौद्योगिकियों को सशक्त बनाना” विषय के अंतर्गत किया गया।
  • भारत के कार्बन उत्सर्जन में कमी की चुनौती: CCUS पर ऐसे संभावित उपाय के रूप में ध्यान दिया जा रहा है, जो उन औद्योगिक क्षेत्रों से उत्सर्जन कम करने में सहायता कर सकता है, जहाँ उत्सर्जन में कमी लाना कठिन है। साथ ही, यह वर्ष 2070 तक भारत के शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सहायक हो सकता है।

CCUS के बारे में

  • परिचय: कार्बन संग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) में औद्योगिक स्रोतों या अन्य उत्सर्जन धाराओं से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को वायुमंडल में प्रवेश करने से पहले अलग किया जाता है। इसके बाद इसका उपयोग उपयोगी उत्पादों के निर्माण में किया जाता है या इसे भूवैज्ञानिक संरचनाओं में स्थायी रूप से भंडारित किया जाता है।
  • प्रमुख चरण:
    • कैप्चर: औद्योगिक उत्सर्जन या अन्य स्रोतों से CO₂ को अलग किया जाता है।
    • शुद्धीकरण एवं संपीडन: संग्रहित CO₂ को इस प्रकार संसाधित किया जाता है कि वह परिवहन तथा आगे उपयोग या भंडारण के लिए उपयुक्त हो जाए।
    • परिवहन: CO₂ को पाइपलाइनों, जहाजों या परिवहन के अन्य उपयुक्त साधनों के माध्यम से ले जाया जाता है।
    • उपयोग या भंडारण: CO₂ को उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित किया जाता है या दीर्घकालिक भंडारण के लिए उपयुक्त भूवैज्ञानिक संरचनाओं में प्रविष्ट कराया जाता है।
  • प्रमुख भंडारण माध्यम: इनमें तेल एवं गैस के समाप्त हो चुके भंडार, गहरे लवणीय जलभृत और उपयुक्त बेसाल्ट संरचनाएँ शामिल हैं।
  • कार्बन का उपयोग: संग्रहित CO₂ का उपयोग निर्माण सामग्री, रसायनों, कृत्रिम ईंधनों, बहुलकों और जैविक उत्पादों के निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है। इससे होने वाले जलवायु संबंधी लाभ उपयोग के तरीके के अनुसार अलग-अलग होते हैं और जीवन-चक्र के दौरान होने वाले उत्सर्जन पर निर्भर करते हैं।
  • CCUS केंद्र एवं क्लस्टर: अनेक औद्योगिक उत्सर्जकों को साझा CO₂ परिवहन एवं भंडारण अवसंरचना से जोड़ा जा सकता है। इससे लागत कम हो सकती है और बड़े पैमाने पर इस प्रौद्योगिकी को अपनाना संभव हो सकता है।

आवश्यकता एवं महत्त्व

  • उत्सर्जन की एक प्रमुख चुनौती का समाधान: जिन औद्योगिक क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करना कठिन है तथा ताप विद्युत उत्पादन से होने वाला उत्सर्जन वर्ष 2030 तक लगभग 2,300 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुँचने की आशा है। कार्बन ग्रहण, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) ऐसे उत्सर्जन से निपटने का एक मार्ग प्रदान करता है, जिन्हें केवल विद्युतीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से समाप्त करना कठिन है।
  • वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो प्राप्त करना: CCUS नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और औद्योगिक विद्युतीकरण का पूरक बन सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए उच्च तापमान या कार्बन-आधारित आगतों की आवश्यकता होती है।
  • आवश्यक उद्योगों का कार्बन उत्सर्जन कम करना: यह इस्पात, सीमेंट, रसायन, तेल शोधन और उर्वरक उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने में सहायता कर सकता है, जबकि आवश्यक औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन जारी रखा जा सकता है।
  • निम्न-कार्बन हाइड्रोजन और औद्योगिक नवाचार को बढ़ावा देना: कार्बन ग्रहण जीवाश्म ईंधनों से हाइड्रोजन उत्पादन में सहायता कर सकता है। ग्रहण की गई CO₂ का उपयोग कंक्रीट, रसायनों और कृत्रिम ईंधनों के निर्माण में भी किया जा सकता है, बशर्ते संपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया के उत्सर्जन और जीवन-चक्र संबंधी प्रभावों को ध्यान में रखा जाए।

सरकारी पहलें एवं प्रायोगिक परियोजनाएँ

  • केंद्रीय बजट 2026–27: पाँच क्षेत्रों—विद्युत, इस्पात, सीमेंट, तेल शोधन और रसायन—में CCUS प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ाने के लिए पाँच वर्षों में ₹20,000 करोड़ के व्यय का प्रस्ताव किया गया। इसमें अंतिम उपयोग संबंधी अनुप्रयोगों के लिए प्रौद्योगिकी की तत्परता में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • CCUS अनुसंधान एवं विकास रोडमैप, 2025: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा दिसंबर 2025 में जारी यह रूपरेखा अनुसंधान, वित्तपोषण, प्रौद्योगिकी विकास और कार्यान्वयन के लिए रणनीतिक दिशा प्रदान करती है। इसमें व्यावसायिक उपयोग के लिए तत्परता पर विशेष ध्यान दिया गया है।
  • प्रदर्शन संबंधी अवसंरचना: मई 2026 में आईआईटी बॉम्बे ने भारत की पहली एकीकृत CCUS क्षेत्रीय प्रयोगशाला का उद्घाटन किया। यह औद्योगिक उत्सर्जन और परिवेशी वायु से प्रतिदिन अधिकतम 3 टन CO₂ ग्रहण करने में सक्षम है। साथ ही, यह उपयोग एवं भूवैज्ञानिक भंडारण संबंधी अनुसंधान को भी समर्थन प्रदान करती है।
  • नीति आयोग का CCUS नीति ढाँचा: नवंबर 2022 में जारी यह रिपोर्ट उन क्षेत्रों के गहन कार्बन-मुक्तीकरण के लिए उत्सर्जन में कमी की रणनीति के रूप में CCUS का अध्ययन करती है, जहाँ उत्सर्जन कम करना कठिन है। साथ ही, इसके कार्यान्वयन के लिए क्षेत्र-विशिष्ट नीतिगत हस्तक्षेपों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।

प्रमुख चुनौतियाँ एवं चिंताएँ

  • उच्च लागत एवं ऊर्जा की आवश्यकता: कार्बन ग्रहण, शुद्धीकरण, संपीड़न, परिवहन और भंडारण के लिए पर्याप्त निवेश एवं ऊर्जा की आवश्यकता होती है। वहीं, इसकी व्यावसायिक व्यवहार्यता क्षेत्र और प्रौद्योगिकी के अनुसार अलग-अलग होती है।
  • भंडारण संबंधी अनिश्चितता एवं अवसंरचना की कमी: नीति आयोग के अनुसार, भारत की सैद्धांतिक भूवैज्ञानिक CO₂ भंडारण क्षमता 395–614 गीगाटन (Gt) है। वास्तविक कार्यान्वयन के लिए स्थल-विशिष्ट भूवैज्ञानिक आकलन, सत्यापन, परिवहन नेटवर्क और उपयुक्त भंडारण अवसंरचना की आवश्यकता होती है।
  • उपयोग से होने वाले जलवायु लाभों को लेकर अनिश्चितता: कुछ उत्पादों में उपयोग की गई CO₂ थोड़े समय बाद पुनः वायुमंडल में मुक्त हो सकती है। इसलिए, इसके जलवायु संबंधी लाभों का आकलन उत्पाद के संपूर्ण जीवन-चक्र के आधार पर किया जाना चाहिए। तेल की वसूली बढ़ाने के लिए CO₂ के उपयोग से जुड़े उत्सर्जन की भी जाँच आवश्यक है।
  • दीर्घकालिक सुरक्षा एवं जवाबदेही: भूवैज्ञानिक भंडारण के लिए प्रभावी निगरानी, रिसाव प्रबंधन तथा दीर्घकालिक दायित्व और पर्यावरण संरक्षण की स्पष्ट व्यवस्थाएँ आवश्यक हैं।

आगे की राह

  • प्राथमिकता वाले क्षेत्रों एवं स्थानों की पहचान: प्रारंभिक कार्यान्वयन उन उद्योगों पर केंद्रित किया जाना चाहिए जहाँ उत्सर्जन को समाप्त करना कठिन है। साथ ही, उत्सर्जन के प्रमुख स्रोतों के निकट उपयुक्त भंडारण स्थलों की पहचान की जानी चाहिए।
  • साझा CCUS केंद्रों का विकास: लागत कम करने और व्यापक स्तर पर आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए अनेक औद्योगिक उत्सर्जकों को साझा परिवहन एवं भंडारण अवसंरचना से जोड़ा जाना चाहिए। ब्रिटेन, नीदरलैंड और नॉर्वे में विकसित किए जा रहे क्षेत्रीय औद्योगिक क्लस्टर इस दृष्टिकोण के उदाहरण हैं।
  • वित्तपोषण को मापनीय परिणामों से जोड़ना: सार्वजनिक सहायता का उपयोग प्रदर्शन परियोजनाओं और व्यावसायिक कार्यान्वयन को आगे बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए कार्बन ग्रहण दक्षता, ऊर्जा खपत, लागत में कमी और सत्यापित उत्सर्जन कटौती के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए।
  • CCUS को प्रत्यक्ष उत्सर्जन न्यूनीकरण का पूरक बनाना सुनिश्चित करना: नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और उत्सर्जन कम करने के अन्य व्यावहारिक उपायों को प्राथमिकता देना जारी रखा जाना चाहिए। उपयोग संबंधी परियोजनाओं का मूल्यांकन जीवन-चक्र आकलन के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि ग्रहण की गई CO₂ के उपयोग को स्वतः ही शुद्ध जलवायु लाभ न मान लिया जाए।

Shares: