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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान; संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढांचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियां, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियां ।

संदर्भ: ‘एक देश, एक चुनाव’ (ONOE) के प्रस्तावित ढाँचे की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने हाल ही में कहा कि एक साथ चुनाव कराने से समय के साथ लगभग ₹7 लाख करोड़ की बचत हो सकती है और भारत की जीडीपी में 1.6% तक की संभावित वृद्धि हो सकती है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • संयुक्त संसदीय समिति (JPC) वर्तमान में संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जाँच कर रही है, जो भारत में एक साथ चुनाव कराने को व्यावहारिक बनाने का प्रयास करते हैं।
  • संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी. पी. चौधरी हैं और इसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त कुल 39 सदस्य शामिल हैं, जिनमें लोकसभा से 27 और राज्यसभा से 12 सांसद हैं।
  • संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 का प्राथमिक उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराना है, जबकि स्थानीय निकायों के चुनावों को एक साथ कराने का प्रस्ताव एक आगामी चरण के रूप में अलग से प्रस्तावित किया गया है, जिसके लिए अतिरिक्त संवैधानिक संशोधनों और कम से कम आधे राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होगी।
  • ‘एक देश, एक चुनाव’ (ONOE) का विचार पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति की सिफारिशों पर आधारित है, जिसकी रिपोर्ट को वर्ष 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार कर लिया गया था।

एक राष्ट्र, एक चुनाव (ONOE) के बारे में

  • ‘एक देश, एक चुनाव’ का तात्पर्य एक निश्चित चक्र के भीतर लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने और उसके पश्चात स्थानीय निकायों के चुनावों को भी संरेखित करने के प्रस्ताव से है।
  • वर्तमान में, भारत में चुनाव व्यक्तिगत विधायिकाओं के कार्यकाल के आधार पर अलग-अलग आयोजित किए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न राज्यों में निरंतर चुनाव चक्र चलते रहते हैं।
  • भारत में वर्ष 1951-52 से 1967 के बीच एक साथ चुनाव कराने की पद्धति का पालन किया गया था, जिसके पश्चात विधानसभाओं के समय-पूर्व भंग होने, अनुच्छेद 356 के बार-बार उपयोग और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह चक्र बाधित हो गया।

कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ

  • संवैधानिक संशोधन: समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन करने की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 में भी संशोधन करने की आवश्यकता होगी, जो आम चुनावों और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के समय को नियंत्रित करता है।
  • लॉजिस्टिक संबंधी आवश्यकताएं: एक साथ चुनाव कराने से अत्यधिक लागत आएगी, जिसमें अतिरिक्त ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों की आवश्यकता शामिल है। यह व्यय हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, क्योंकि इन मशीनों को प्रत्येक 15 वर्ष में बदलने की आवश्यकता होगी।
  • सरकार की स्थिरता: ऐसी स्थितियों से निपटना जहां सरकारें समय से पहले गिर जाती हैं या विधायिकाएं अपने कार्यकाल के दौरान ही भंग हो जाती हैं, एक लोकतांत्रिक चुनौती प्रस्तुत करता है। ‘एक देश, एक चुनाव’ (ONOE) को लागू करने से लोकतांत्रिक मानदंडों और स्थानीय सशक्तिकरण के प्रयास हतोत्साहित हो सकते हैं।
  • चुनावी व्यय पर प्रभाव: ‘एक देश, एक चुनाव’ का उद्देश्य चुनावी खर्च को कम करना है, लेकिन यह चुनावों में काले धन की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम नहीं हो सकता है।

आगे की राह

  • आम सहमति आधारित कार्यान्वयन: संघीय संतुलन और लोकतांत्रिक जवाबदेही को बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों, राज्यों तथा संवैधानिक संस्थाओं के साथ व्यापक परामर्श के माध्यम से ‘एक देश, एक चुनाव’ (ONOE) को धीरे-धीरे लागू किया जाना चाहिए।
  • पूरक चुनावी सुधार: एक साथ चुनाव कराने के साथ-साथ राजनीतिक वित्तपोषण में अधिक पारदर्शिता, आंतरिक-दलीय लोकतंत्र को मजबूत करने और चुनावों के राज्य द्वारा वित्तपोषण की संभावनाओं को तलाशने जैसे सुधार भी किए जाने चाहिए।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना: राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने से चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास और जवाबदेही बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
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