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सामान्य अध्ययन-3: भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग — कार्यक्षेत्र एवं महत्व, अवस्थिति, अग्रगामी एवं पश्चगामी आवश्यकताएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।
संदर्भ: प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम औपचारिकीकरण योजना (PMFME) ने ऋण-संबद्ध (Credit-Linked) 2 लाख लाभार्थियों का लक्ष्य पार कर लिया है। यह भारत के सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के औपचारीकरण तथा सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
अन्य संबंधित जानकारी
- इस योजना के अंतर्गत 2 लाख से अधिक सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को ऋण स्वीकृत किया गया है, जिससे ₹20,300 करोड़ से अधिक की परियोजना निवेश राशि को प्रोत्साहन मिला है।
- इस योजना के माध्यम से लगभग 11 लाख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।
- लगभग 90% लाभार्थी प्रथम पीढ़ी के उद्यमी हैं तथा 44% लाभार्थी महिला उद्यमी हैं।
- PMFME योजना से समर्थित 75,000 से अधिक उद्यम, उद्यम (Udyam), उद्यम असिस्ट (Udyam Assist), भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) तथा वस्तु एवं सेवा कर (GST) के अंतर्गत पंजीकरण कराकर औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं।
- योजना के अंतर्गत सीड कैपिटल की सहायता से 4.18 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह (SHG) के सदस्य लाभान्वित हुए हैं।
PMFME योजना के बारे में
शुभारम्भ एवं उद्देश्य
- इस योजना का शुभारम्भ वर्ष 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत किया गया था तथा इसका क्रियान्वयन खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) द्वारा किया जा रहा है।
- इसका उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को वित्तीय, तकनीकी एवं व्यावसायिक सहायता प्रदान करके उनका औपचारीकरण करना तथा उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना है।
वित्तपोषण व्यवस्था एवं परिव्यय
- यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसका वर्ष 2020–21 से 2025–26 की अवधि के लिए ₹10,000 करोड़ का कुल परिव्यय निर्धारित किया गया है।
- वित्तपोषण का स्वरूप: केंद्र एवं राज्य : 60 : 40; पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए : 90 : 10; केंद्र शासित प्रदेशों के लिए : 100% केंद्रीय सहायता
प्रमुख विशेषताएँ
- जिला-विशिष्ट खाद्य उत्पादों तथा उनकी मूल्य श्रृंखला को बढ़ावा देने के लिए एक जिला–एक उत्पाद (ODOP) दृष्टिकोण अपनाया गया है।
- पात्र परियोजना लागत पर 35% ऋण-संबद्ध पूँजीगत अनुदान प्रदान किया जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹10 लाख प्रति इकाई है।
- प्रत्येक स्वयं सहायता समूह (SHG) के सदस्य को कार्यशील पूँजी एवं छोटे उपकरणों के लिए अधिकतम ₹40,000 तक की बीज पूँजी सहायता प्रदान की जाती है।
- साझा अवसंरचना, ब्रांडिंग, विपणन, क्षमता निर्माण तथा हैंडहोल्डिंग के लिए भी सहायता प्रदान की जाती है।
कार्यक्षेत्र
- यह योजना व्यक्तिगत उद्यमियों, स्वयं सहायता समूहों (SHGs), कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी समितियों तथा उत्पादक कंपनियों को खाद्य प्रसंस्करण मूल्य शृंखला के विभिन्न चरणों में सहायता प्रदान करती है।
योजना का महत्त्व
- भारत के खाद्य प्रसंस्करण तंत्र का औपचारिकीकरण: यह योजना सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को वित्तीय सहायता, पंजीकरण, गुणवत्ता मानकों तथा संस्थागत सहयोग उपलब्ध कराकर उन्हें अनौपचारिक अर्थव्यवस्था से औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने में सहायता करती है।
- ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा: प्रथम पीढ़ी के उद्यमियों तथा स्थानीय खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को समर्थन देकर यह योजना ग्रामीण औद्योगिकीकरण एवं स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करती है।
- ODOP मूल्य शृंखला को सुदृढ़ बनाना: एक जिला–एक उत्पाद (ODOP) दृष्टिकोण जिला-विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देता है, उनकी ब्रांडिंग एवं बाज़ार तक पहुँच को बेहतर बनाता है तथा क्षेत्र-आधारित खाद्य प्रसंस्करण समूहों के विकास में सहायता करता है।
- महिला-नेतृत्व वाला एवं समावेशी विकास: महिला उद्यमियों तथा स्वयं सहायता समूहों (SHGs) एवं कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) जैसी सामुदायिक संस्थाओं की उल्लेखनीय भागीदारी समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है।
- रोज़गार सृजन एवं मूल्य संवर्धन: स्थानीय खाद्य प्रसंस्करण क्षमता के विस्तार से रोज़गार के अवसरों का सृजन होता है, किसानों की आय में वृद्धि होती है तथा कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहन मिलता है।

