संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास और उससे संबंधित विषय।
संदर्भ: प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने ” देखभाल अर्थव्यवस्था की पुनर्कल्पना: निजी बोझ से सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना तक” शीर्षक से एक कार्यपत्र जारी किया, जो भारत के देखभाल इकोसिस्टम को औपचारिक रूप देने और सुदृढ़ करने की तत्काल आवश्यकता पर बल देता है।
अन्य संबंधित जानकारी
- इस कार्यपत्र में तर्क दिया गया है कि तीव्र जनसांख्यिकीय संक्रमण, जनसंख्या का वृद्ध होना, शहरीकरण, परिवारों का एकल होना और महिला श्रम बल की भागीदारी में वृद्धि, पेशेवर देखभाल सेवाओं की मांग को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा रहे हैं।
- यह इस बात पर बल देता है कि देखभाल के कार्य को केवल एक निजी घरेलू जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जाना चाहिए।
कार्य पत्र की मुख्य सिफारिशें
- एकीकृत देखभाल संरचना का सृजन: यह कार्यपत्र एक अंतर-मंत्रालयी संस्थागत ढांचे की सिफारिश करता है, जिसमें महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, श्रम, कौशल विकास और सामाजिक न्याय से संबंधित मंत्रालय शामिल हों, ताकि सार्वजनिक नीति और सेवा वितरण में देखभाल को मुख्यधारा में लाया जा सके।
- परिवार सेवा कोष: यह पत्र वित्त मंत्रालय के अंतर्गत “परिवार सेवा कोष” नामक परिणाम-आधारित सार्वजनिक वित्तपोषण तंत्र को प्रस्तावित करता है, जो समुदाय- संचालित और बहु-पीढ़ीगत देखभाल अवसंरचना परियोजनाओं को सहायता प्रदान करेगा।
- समर्पित वित्तपोषण तंत्र: यह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) मंत्रालय के तहत एक विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) के रूप में “केयरप्रेन्योर फंड” (Carepreneur Fund) बनाने की सिफारिश करता है, ताकि देखभाल क्षेत्र के उद्यमियों और सहकारी समितियों को रियायती वित्त उपलब्ध कराया जा सके।
- यह कार्यपत्र शिशु देखभाल, वृद्धों की देखभाल और दिव्यांगता देखभाल सेवाओं के क्षेत्र में नवाचार, उद्यमिता और विस्तार को समर्थन देने के लिए ‘केयर इंक्यूबेटर्स’ की स्थापना का भी प्रस्ताव करता है।
- सीएसआर (CSR) और परोपकारी वित्तपोषण का संग्रहण: यह कार्यपत्र कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) और परोपकारी निधियों को देखभाल क्षेत्र की परियोजनाओं और अवसंरचना विकास की ओर मोड़ने के लिए ‘राष्ट्रीय और राज्य सीएसआर एक्सचेंज पोर्टल्स’ के उपयोग की सिफारिश करता है।
- कुशल देखभाल कार्यबल का विकास: यह वर्ष 2050 तक 3.1 से 3.8 करोड़ देखभाल कर्मियों की अनुमानित मांग को पूरा करने के लिए मानकीकृत प्रमाणन, कौशल प्रशिक्षण और औपचारिक रोजगार मार्गों के माध्यम से देखभाल करने वालों के बड़े पैमाने पर व्यवसायीकरण का प्रस्ताव करता है।
- लिंग-संवेदनशील श्रम और सामाजिक नीतियां: यह कार्यपत्र ‘पैरेंटल लीव’ नीतियों में चरणबद्ध सुधारों की वकालत करता है, जिसकी शुरुआत निजी क्षेत्र में वैधानिक वैतनिक पितृत्व अवकाश से की जाए और अंततः लिंग-संतुलित पैरेंटल फ्रेमवर्क की ओर बढ़ा जाए।
- यह महिलाओं पर अवैतनिक देखभाल के अत्यधिक बोझ को कम करने और उनकी श्रम बल भागीदारी में सुधार लाने के लिए लचीली कार्य व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा उपायों और सहायक कार्यस्थल नीतियों का भी आह्वान करता है।
देखभाल अर्थव्यवस्था के बारे में
- देखभाल अर्थव्यवस्था (केयर इकोनॉमी) में बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य सहायता, घरेलू कार्य, दिव्यांगता सहायता और सामुदायिक देखभाल से संबंधित वैतनिक और अवैतनिक दोनों गतिविधियाँ शामिल हैं।
- देखभाल कार्य प्रत्यक्ष (जैसे- भोजन कराना, पढ़ाना, नर्सिंग, भावनात्मक सहायता) या अप्रत्यक्ष (जैसे- खाना बनाना, सफाई करना, घरेलू प्रबंधन) हो सकता है।
- भारत में देखभाल कार्य का एक बड़ा हिस्सा अवैतनिक और अनौपचारिक बना हुआ है, जिसमें महिलाएं घरेलू और देखभाल की जिम्मेदारियों का अत्यधिक असमान हिस्सा वहन करती हैं।
- इस कार्यपत्र के अनुसार, भारत में अवैतनिक देखभाल और घरेलू कार्य का अनुमानित आर्थिक मूल्य सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 15-17% है, हालांकि यह पारंपरिक आर्थिक लेखांकन से काफी हद तक बाहर रहता है।
देखभाल अर्थव्यवस्था के औपचारिकीकरण की आवश्यकता
- लैंगिक असमानता और समय के अभाव का समाधान: भारत में महिलाएँ प्रतिदिन लगभग 289 मिनट अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्यों पर व्यय करती हैं, जबकि पुरुषों के लिए यह समय लगभग 88 मिनट है। यह स्थिति शिक्षा, औपचारिक रोजगार और उद्यमिता में महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती है।
- महिला श्रम बल भागीदारी का समर्थन: शिशु देखभाल (चाइल्डकेयर) और वृद्धों की देखभाल जैसी औपचारिक सेवाएँ अवैतनिक घरेलू बोझ को कम कर सकती हैं और श्रम बाजार में महिलाओं की अधिक भागीदारी को सक्षम बना सकती हैं, जिससे वे आर्थिक विकास में योगदान दे सकती हैं।
- जनसांख्यिकीय संक्रमण के प्रति अनुक्रिया: भारत में वृद्धों की जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है। वर्ष 2050 तक वरिष्ठ नागरिकों की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग 21% होने की संभावना है, जिससे संगठित वृद्ध देखभाल सेवाओं की आवश्यकता बढ़ जाएगी।
- रोजगार सृजन की क्षमता: देखभाल अवसंरचना में निवेश में रोजगार की व्यापक संभावनाएँ हैं। कार्यपत्र के अनुसार, देखभाल क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 2% के बराबर निवेश से लगभग 11 मिलियन रोजगारों का सृजन हो सकता है, विशेष रूप से महिलाओं के लिए।
- अदृश्य श्रम को मान्यता: औपचारिकरण से देखभाल करने को आर्थिक रूप से उत्पादक कार्य के रूप में मान्यता देने और व्यापक विकास नियोजन एवं सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों में देखभाल संबंधी योगदान को एकीकृत करने में सहायता मिलेगी।
