7वाँ एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026
संदर्भ: 7वाँ एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन 2026 (21–23 अक्टूबर के दौरान नई दिल्ली में “वैश्विक दक्षिण को सशक्त बनाना” विषय के अंतर्गत आयोजित किया गया।
एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन 2026 के बारे में

- इस सम्मेलन की मेजबानी भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने जर्मनी के पर्यावरण, जलवायु कार्रवाई, प्रकृति संरक्षण एवं परमाणु सुरक्षा के संघीय मंत्रालय (BMUV) के सहयोग से की।
- यह वैश्विक दक्षिण में आयोजित होने वाला इस सम्मेलन का पहला संस्करण था। इसमें किसान, नीति-निर्माता, शोधकर्ता, उद्योग जगत के प्रमुख और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ एक साथ आए।
- प्रमुख परिणाम:
- नीति निर्माण: ओडिशा ने घोषणा की कि वह अपनी समर्पित एग्रीवोल्टाइक्स नीति 2026 को अंतिम रूप दे रहा है। इसका लक्ष्य 2030 तक 1 गीगावाट क्षमता हासिल करना है। इसमें कृषि योग्य भूमि की सुरक्षा, किसानों की सहमति और फसल बीमा से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
- किसान-केंद्रित कार्यान्वयन: चर्चाओं में कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर नियोजन, फसलों का चयन, जल उपयोग दक्षता, किसानों का प्रशिक्षण, भूमि स्वामित्व की सुरक्षा और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य कारोबारी मॉडलों पर बल दिया गया।
- प्रौद्योगिकी एवं वित्त: प्रतिभागियों ने कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए उन्नत सौर प्रौद्योगिकियों, नवाचारी वित्तपोषण, रियायती ऋण, मिश्रित वित्तपोषण और जोखिम कम करने के तंत्रों पर विचार-विमर्श किया।
- ज्ञान संसाधन: तीन संसाधन जारी किए गए—नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा एग्रीपीवी नीति पुस्तिका, इंडिया एग्रीवोल्टाइक्स एलायंस का निर्णय-निर्माण उपकरण और अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) की सार-संग्रह पुस्तिका।
- मान्यता एवं सहयोग: छह वैज्ञानिक विषयों के अंतर्गत उत्कृष्टता पुरस्कार, राष्ट्रीय एग्रीवोल्टाइक्स पिच-हब पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ शोधपत्र पुरस्कारों के माध्यम से इस क्षेत्र में योगदान को मान्यता दी गई। वर्ष 2027 में 8वें सम्मेलन की मेजबानी फ्रांस करेगा।
काशीपुर में उत्खनन एवं चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति
संदर्भ: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने उत्तराखंड के काशीपुर में स्थित 90 एकड़ के एक टीले पर उत्खनन कार्य फिर से शुरू किया है। इसका उद्देश्य इस स्थल के सांस्कृतिक क्रम को स्थापित करना तथा इसके ऐतिहासिक महत्त्व और महाभारत की परंपराओं से संभावित संबंधों की जाँच करना है।
प्रमुख निष्कर्ष

- ऐतिहासिक पहचान: अलेक्जेंडर कनिंघम ने काशीपुर की पहचान चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा वर्णित किउ-पि-श्वांग-ना (Kiu-pi-shwang-na) अथवा गोविषाण (Govisana) से की थी। ह्वेनसांग ने छठी शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र की यात्रा की थी।
- कनिंघम ने स्थल के सर्वोच्च बिंदु भीम-गजा (Bhim-Gaja) पर स्थित एक विशाल संरचना का भी पता लगाया था।
- पूर्ववर्ती उत्खनन: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1939–40, 1965–66 और 1970–71 में इस स्थल पर उत्खनन किया था, जिसमें तीन चरणों में निर्मित एक मंदिर के साक्ष्य मिले थे।
- गुप्त काल में इसकी शुरुआत मिट्टी और ईंटों से बने एक ऊँचे चबूतरे के रूप में हुई थी, जो संभवतः गर्भगृह को सहारा देता था। इसके बाद छठी–सातवीं शताब्दी ईस्वी में दो घेरने वाली दीवारें बनाई गईं।
- हालिया उत्खनन: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के देहरादून मंडल ने ईंटों से बनी संरचनाओं और एक वृत्ताकार संरचना का पता लगाया है।
- वर्तमान उत्खनन का उद्देश्य पहले प्राप्त निष्कर्षों की वैज्ञानिक रूप से जाँच करना तथा इस स्थल के सांस्कृतिक क्रम को स्थापित करना है, जिसकी पूर्ववर्ती उत्खननों में पूरी तरह जाँच नहीं की गई थी।
- पुरातात्त्विक साक्ष्य: चित्रित धूसर मृद्भांड, कुषाण, गुप्त और मध्यकालीन कालखंडों के मृद्भांड इस स्थल पर विभिन्न ऐतिहासिक कालों में मानव गतिविधियों का संकेत देते हैं।
- स्थानीय परंपराएँ इस स्थल को ऋषि द्रोणाचार्य और पांडवों से जोड़ती हैं, लेकिन इन संबंधों की पुष्टि के लिए पुरातात्त्विक साक्ष्य आवश्यक हैं।
हस्तिनापुर स्थल के बारे में
- अवस्थिति एवं उत्खनन: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित हस्तिनापुर का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्गत बी. बी. लाल ने 1950–52 में किया था।
- लाल ने हस्तिनापुर, मथुरा, कुरुक्षेत्र और बरनावा सहित चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति से संबंधित स्थलों को महाभारत में वर्णित स्थानों से जोड़ा था।
- वर्ष 2026 में हस्तिनापुर को एक अनुभवात्मक सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में विकसित करने के लिए चुने गए 15 पुरातात्त्विक स्थलों में शामिल किए जाने की घोषणा की गई। यह जैन धर्म का एक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल भी है।
खजुराहो के मंदिर
संदर्भ: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में 11वीं शताब्दी की विष्णु प्रतिमा का खोया हुआ बलुआ पत्थर से बना सिर मिल गया है। विशेषज्ञों की जाँच के बाद इसे प्रतिमा से दोबारा जोड़ने की योजना है।
अन्य संबंधित जानकारी
- सात फुट ऊँची इस प्रतिमा के पुनर्स्थापन का मामला तब विवादास्पद हो गया, जब इसके पुनर्स्थापन, प्रतिस्थापन या पुनर्निर्माण की माँग करने वाली एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय पहुँची।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यदुबीर सिंह रावत ने बताया कि विशेषज्ञ, बरामद किए गए सिर को प्रतिमा से दोबारा जोड़ने से पहले उसकी जाँच कर रहे हैं।
खजुराहो के मंदिरों के बारे में

- अवस्थिति: मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में।
- निर्माता: चंदेल राजवंश, जिसने मुख्य रूप से 10वीं और 11वीं शताब्दी के दौरान मंदिर निर्माण को संरक्षण दिया।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कहा जाता है कि खजुराहो में कभी लगभग 13 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले करीब 85 मंदिर थे, जिनमें से लगभग 20–23 मंदिर आज भी विद्यमान हैं।
- धार्मिक महत्त्व: ये मंदिर हिंदू और जैन परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा धार्मिक भक्ति, राजकीय संरक्षण, राजनीतिक वैधता और सांस्कृतिक उपलब्धियों को दर्शाते हैं।
- वास्तुकला: ये मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनकी विशेषताओं में ऊँचे शिखर, जटिल नक्काशी और सुडौल अनुपात शामिल हैं।
- लक्ष्मण और विश्वनाथ मंदिर पंचायतन शैली का अनुसरण करते हैं, जिसमें मुख्य मंदिर के चारों ओर चार सहायक मंदिर होते हैं।
- मंदिरों के तीन समूह: पश्चिमी समूह में कंदरिया महादेव और लक्ष्मण मंदिर शामिल हैं; पूर्वी समूह में जवारी मंदिर और जैन मंदिर शामिल हैं; तथा दक्षिणी समूह में दुलादेव और चतुर्भुज मंदिर शामिल हैं।
- मूर्तिकला: मूर्तियों में देवी-देवताओं, दिव्य आकृतियों, नर्तकों, संगीतकारों, योद्धाओं, घरेलू जीवन और प्रेमी युगलों के चित्रण शामिल हैं। ये धार्मिक मान्यताओं और तत्कालीन समाज को दर्शाते हैं।
- पुनर्खोज एवं संरक्षण: कैप्टन टी. एस. बर्ट ने 1838 में इन मंदिरों का दस्तावेजीकरण किया। इसके बाद अलेक्जेंडर कनिंघम ने इनका सर्वेक्षण किया और छतरपुर के महाराजा प्रताप सिंह ने 1843 से 1847 के बीच इनकी मरम्मत करवाई।
- यूनेस्को की मान्यता: खजुराहो स्मारक समूह को 1986 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
PHP2Shell की कमियां
संदर्भ: पीएचपी (PHP) विकास दल ने 21 अक्टूबर, 2026 को दो गंभीर सुरक्षा कमियों के लिए आपातकालीन सुरक्षा अपडेट जारी किए। इन दोनों कमियों को सामूहिक रूप से पीएचपी2शेल (PHP2Shell) कहा जाता है। इनके माध्यम से हमलावर बिना प्रमाणीकरण के दूरस्थ रूप से दुर्भावनापूर्ण कोड निष्पादित कर सकते हैं।
पीएचपी (PHP) के बारे में

- पीएचपी (PHP: Hypertext Preprocessor) एक निःशुल्क, मुक्त स्रोत, सर्वर-पक्षीय प्रोग्रामिंग भाषा है, जिसका उपयोग गतिशील वेबसाइटों और अनुप्रयोगों के विकास के लिए किया जाता है।
- यह उपयोगकर्ताओं के अनुरोधों को संसाधित करती है, डेटाबेस के साथ अंतःक्रिया करती है और वेब पृष्ठ तैयार करती है।
- साइबर सुरक्षा कंपनी विज़ (Wiz) के अनुसार, जिन वेबसाइटों की सर्वर-पक्षीय प्रोग्रामिंग भाषा की पहचान की जा सकती है, उनमें से लगभग 70% वेबसाइटें पीएचपी पर आधारित हैं। वर्डप्रेस, जो विश्वभर की 40% से अधिक वेबसाइटों को संचालित करता है, पीएचपी पर निर्भर है।
- पीएचपी फाउंडेशन इसके दीर्घकालिक विकास में सहयोग करता है।
प्रमुख कमियां
- इन दो कमियों की पहचान CVE-2026-109618 और CVE-2026-109619 के रूप में की गई है। इनकी गंभीरता का स्तर 10 में से 9.2 बताया गया है। ये कमजोरियाँ वेबसाइट-स्तर पर प्रमाणीकरण की जाँच होने से पहले ही सक्रिय हो सकती हैं।
- मेमोरी करप्शन (Memory Corruption): मेमोरी से संबंधित त्रुटियों के दौरान पीएचपी अपूर्ण या अमान्य डेटा को अनुचित तरीके से संसाधित कर सकता है।
- चोरी हुई मेमोरी के संदर्भ (Stale Memory References): पीएचपी ऐसी मेमोरी तक पहुँचने का प्रयास कर सकता है जिसे पहले ही साफ़ किया जा चुका है, जिससे डेटा के दूषित होने की आशंका रहती है।
बोधना शिवानंदन: शतरंज में सबसे कम आयु की महिला अंतर्राष्ट्रीय मास्टर
संदर्भ: 11 वर्षीय बोधना शिवानंदन शतरंज के इतिहास में सबसे कम आयु की महिला अंतर्राष्ट्रीय मास्टर (IM) बनीं। उन्होंने जूडिट पोल्गार का वह रिकॉर्ड तोड़ दिया, जो 1988 से कायम था।
ग्रैंडमास्टर (GM), अंतर्राष्ट्रीय मास्टर (IM), महिला ग्रैंडमास्टर (WGM) और महिला अंतर्राष्ट्रीय मास्टर (WIM) के बीच अंतर के बारे में

भारतीय शतरंज में प्रथम एवं सबसे कम आयु में उपलब्धि प्राप्त करने वाले खिलाड़ी
- भारत के प्रथम ग्रैंडमास्टर: विश्वनाथन आनंद (1988)।
- भारत के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय मास्टर: मैनुअल आरोन (1961)।
- भारत की प्रथम महिला ग्रैंडमास्टर: कोनेरू हम्पी (2002)।
- सबसे कम आयु के विश्व शतरंज चैंपियन: गुकेश डी. (18 वर्ष, 2024)।
- सबसे कम आयु के ग्रैंडमास्टर: अभिमन्यु मिश्रा (12 वर्ष, 2021)।
- सबसे कम आयु की महिला अंतर्राष्ट्रीय मास्टर: बोधना शिवानंदन (11 वर्ष, 2026)।
- विश्व में प्रथम स्थान (सर्वाधिक उच्चतम रेटिंग): मैग्नस कार्लसन (नॉर्वे) — 2,882 एलो रेटिंग।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ऑपरेशन ट्राइडेंट शुरू किया
संदर्भ: नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने मिजोरम पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के समन्वय से असम, मिजोरम और मणिपुर में सक्रिय एक अंतर्राष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क को नष्ट करने के लिए ऑपरेशन ट्राइडेंट शुरू किया।
ऑपरेशन ट्राइडेंट के बारे में
- कार्यान्वयन: तीनों राज्यों में चिह्नित 38 स्थानों पर एक साथ तलाशी लेने के लिए विभिन्न एजेंसियों की 38 टीमों ने कार्रवाई की। इसका लक्ष्य गिरोह के परिचालन और वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाना था।
- प्रमुख परिणाम: इस अभियान के परिणामस्वरूप 18 गिरफ्तारियाँ हुईं, लगभग ₹100 करोड़ के हवाला लेन-देन का पता चला, 1,424 बैंक खातों को फ्रीज किया गया और ₹17.82 करोड़ की संपत्तियाँ कुर्क की गईं। अधिकारियों ने 500 डेटोनेटर और ₹12 लाख नकद भी जब्त किए।
- मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क: जाँच में इस नेटवर्क का संबंध म्यांमार, मिजोरम, मणिपुर, असम और त्रिपुरा को जोड़ने वाले मार्गों से मेथामफेटामाइन तथा हेरोइन की तस्करी से पाया गया। इन मार्गों के माध्यम से मादक पदार्थों को आगे मुख्यभूमि भारत और बांग्लादेश तक पहुँचाया जाता था।
- जाँच: खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, वित्तीय रूपरेखा विश्लेषण और डिजिटल फॉरेंसिक के माध्यम से इस गिरोह से जुड़े कथित सहयोगियों, मुखौटा कंपनियों और धन हस्तांतरण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्तियों की पहचान की गई।
- महत्त्व: यह अभियान केवल मादक पदार्थों की जब्ती पर केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर पूरे तस्करी नेटवर्क और उसके वित्तीय ढाँचे को बाधित करने की रणनीति को दर्शाता है। इसमें मादक पदार्थों की तस्करी की रसद व्यवस्था और अवैध वित्तीय प्रवाह, दोनों को निशाना बनाया गया है।
- नीतिगत संबंध: यह अभियान नारकोटिक्स नियंत्रण पर दृष्टि दस्तावेज़ (2026–2029) तथा 31 दिसंबर 2029 तक प्रत्येक मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क को समाप्त करने के सरकारी लक्ष्य के अनुरूप है।
कमला जलविद्युत परियोजना
संदर्भ: सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी NHPC ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 1,720 मेगावाट की कमला जलविद्युत परियोजना के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के अपवर्तन हेतु वन स्वीकृति माँगी है।
कमला जलविद्युत परियोजना के बारे में
- स्थान: अरुणाचल प्रदेश में तामेन गाँव के ऊपरी क्षेत्र में कमला नदी पर स्थित है। कमला नदी, सुबनसिरी नदी की दाहिने तट की सहायक नदी है।
- पूर्व नाम: सुबनसिरी मध्य जलविद्युत परियोजना।
- कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय जलविद्युत विद्युत निगम (NHPC)।
- स्थापित क्षमता: लगभग 1,720 मेगावाट, जिसमें एक भूमिगत विद्युत गृह और एक सतही विद्युत गृह शामिल हैं।
- परियोजना की लागत: लगभग ₹24,000 करोड़।
- प्रमुख विशेषताएँ: इसमें विद्युत उत्पादन और बाढ़ के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से एक जलाशय सहित 216 मीटर ऊँचा कंक्रीट गुरुत्व बाँध बनाने की योजना है।
- भूमि की आवश्यकता: परियोजना के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के अपवर्तन का प्रस्ताव है। इसमें 439 हेक्टेयर अत्यंत सघन वन और 1,119 हेक्टेयर मध्यम सघन वन शामिल हैं।
- जैव विविधता: क्षेत्रीय सर्वेक्षणों में 69 कुलों से संबंधित पौधों की 155 प्रजातियाँ दर्ज की गईं। परियोजना से वन्यजीवों के आवास और नदी के दोनों तटों के बीच पशुओं की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
- क्षतिपूरक वनीकरण: मध्य प्रदेश के कई जिलों में 7,018 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण का प्रस्ताव है।
- सामाजिक प्रभाव: 126 गाँवों के लगभग 5,440 परिवारों के प्रभावित होने की आशंका है।
- पर्यावरणीय स्वीकृति: परियोजना को जनवरी में पर्यावरणीय स्वीकृति देने की सिफारिश की गई थी। अंतिम स्वीकृति से पहले सैद्धांतिक वन स्वीकृति प्राप्त करने की शर्त रखी गई है।
