लक्षद्वीप 100% साक्षर केंद्रशासित प्रदेश बना
संदर्भ: लक्षद्वीप को हाल ही में उल्लास – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम के अंतर्गत पूर्ण साक्षर केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया गया।
उल्लास और पूर्ण साक्षरता के बारे में
- पूर्ण साक्षरता का मानदंड: शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, 95% या उससे अधिक साक्षरता दर वाले राज्य/केंद्रशासित प्रदेश को पूर्ण साक्षर माना जाता है।
- साक्षरता में समझ के साथ पढ़ने, लिखने और गणना करने की क्षमता के साथ-साथ डिजिटल और वित्तीय साक्षरता जैसे महत्त्वपूर्ण जीवन कौशल भी शामिल हैं।
- लक्षद्वीप से पहले यह दर्जा प्राप्त करने वाले राज्य/केंद्रशासित प्रदेश: शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024 से 2026 के बीच दस राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने स्वयं को पूर्ण साक्षर घोषित किया था। ये हैं—लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, सिक्किम, उत्तराखंड तथा जम्मू-कश्मीर।
- जून 2024 में लद्दाख यह दर्जा प्राप्त करने वाली पहली प्रशासनिक इकाई बना था।
- प्रकृति और अवधि: यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 के अनुरूप केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे वित्त वर्ष 2022–23 से 2026–27 तक लागू किया जा रहा है।
- लक्षित समूह: 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के वे गैर-साक्षर व्यक्ति, जो औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह गए। इस योजना का लक्ष्य पाँच वर्षों में पाँच करोड़ शिक्षार्थियों को लाभान्वित करना है। इसके लिए कुल ₹1,037.90 करोड़ का व्यय निर्धारित किया गया है।
- योजना के पाँच घटक हैं:
- बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान।
- महत्त्वपूर्ण जीवन कौशल, जिनमें वित्तीय, डिजिटल और कानूनी साक्षरता, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता तथा बाल देखभाल शामिल हैं।
- बुनियादी शिक्षा।
- व्यावसायिक कौशल।
- सतत शिक्षा।
- कार्यान्वयन: उल्लास मिश्रित शिक्षण मॉडल के माध्यम से स्वयंसेवा और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देता है। इसके मोबाइल अनुप्रयोग में 27 भाषाओं में शिक्षण-अधिगम सामग्री उपलब्ध है। शिक्षार्थियों का आकलन बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान आकलन परीक्षा (FLNAT) के माध्यम से किया जाता है।
गन्ना किसानों और चीनी क्षेत्र से संबंधित मुद्दों की जाँच के लिए सरकार ने समिति गठित की
संदर्भ: सरकार ने गन्ना किसानों द्वारा उठाए गए मुद्दों की जाँच करने और उनकी चिंताओं के समाधान के लिए उपाय सुझाने हेतु नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है।
समिति के बारे में
- विचारार्थ विषय:
- खेती की लागत और अन्य प्रासंगिक कारकों को ध्यान में रखते हुए गन्ना किसानों को अधिक लाभकारी मूल्य दिलाने की माँगों की जाँच करना।
- उत्पादन लागत, बाजार से प्राप्त आय और चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता को ध्यान में रखते हुए मिल-स्तर पर चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य की समीक्षा करना।
- पारदर्शी सत्यापन सुनिश्चित करने के लिए चीनी की रिकवरी की जाँच और रिपोर्टिंग की प्रक्रियाओं की समीक्षा करना।
- चीनी मिलों में गन्ने के वजन करने की प्रथाओं की समीक्षा करना, जिसमें अंशांकन, निरीक्षण और सत्यापन की व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
- मशीनों से काटे गए गन्ने पर की जाने वाली कटौतियों, वास्तविक हानि (यदि कोई हो) तथा किसानों को देय मूल्य पर उनके वित्तीय प्रभाव का आकलन करना।
भारत में गन्ने के मूल्य निर्धारण की व्यवस्था
- कानूनी ढाँचा: गन्ने का मूल्य निर्धारण आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत जारी गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1966 द्वारा विनियमित होता है।
- केंद्र सरकार, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर तथा राज्य सरकारों और अन्य संबंधित पक्षों से परामर्श करने के बाद उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) निर्धारित करती है।
- उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP): यह वह न्यूनतम मूल्य है, जिसका भुगतान चीनी मिलों के लिए गन्ना किसानों को कानूनी रूप से करना अनिवार्य है। यह चीनी की मूल रिकवरी दर से जुड़ा होता है। अधिक रिकवरी पर अतिरिक्त मूल्य दिया जाता है तथा कम रिकवरी पर, लागू सुरक्षा प्रावधानों के अधीन, मूल्य में तदनुसार कमी की जाती है।
- एफआरपी निर्धारित करने में गन्ने की उत्पादन लागत, चीनी की रिकवरी दर, उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर चीनी की उपलब्धता तथा वैकल्पिक फसलों से प्राप्त होने वाले लाभ जैसे कारकों पर विचार किया जाता है।
- राज्य परामर्शित मूल्य (SAP): उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा सहित कुछ राज्य अपना राज्य परामर्शित मूल्य घोषित करते हैं, जो सामान्यतः केंद्र द्वारा निर्धारित एफआरपी से अधिक होता है।
- मिल-स्तर पर चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य (MSP): यह वह न्यूनतम मूल्य है, जिस पर चीनी मिलें चीनी बेच सकती हैं। यह एफआरपी से अलग है, क्योंकि एफआरपी गन्ना किसानों को किए जाने वाले भुगतान को निर्धारित करता है। चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य चीनी (नियंत्रण) आदेश, 2025 के अंतर्गत विनियमित होता है।
- वर्तमान एफआरपी: वर्ष 2026–27 के चीनी सत्र (अक्टूबर–सितंबर) के लिए केंद्र सरकार ने 10.25% की मूल चीनी रिकवरी दर पर एफआरपी ₹365 प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।
दक्षिण कोरिया ने स्वदेशी हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन का परीक्षण किया
संदर्भ: दक्षिण कोरिया ने हाल ही में अपने पहले स्वदेशी रूप से विकसित हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन (HGV) का परीक्षण प्रक्षेपण किया।
हाइपरसोनिक हथियारों के बारे में
- परिभाषा: हाइपरसोनिक हथियार मैक 5 या उससे अधिक की गति से चलते हैं, अर्थात ध्वनि की गति से कम-से-कम पाँच गुना अधिक गति से।
- प्रकार: हाइपरसोनिक हथियारों को मुख्यतः दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
- हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन (HGV): एक रॉकेट बूस्टर वाहन को ऊपरी वायुमंडल तक गति प्रदान करता है। बूस्टर से अलग होने के बाद यह वाहन हाइपरसोनिक गति से ग्लाइड करता है और अपने लक्ष्य की ओर दिशा बदल सकता है।
- हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल (HCM): यह वायुमंडल के भीतर संचालित हाइपरसोनिक उड़ान को बनाए रखने के लिए स्क्रैमजेट जैसे वायु-श्वसन इंजन का उपयोग करती है।
- सामरिक महत्त्व: इनकी उच्च गति, उड़ान के कुछ चरणों में कम ऊँचाई वाला पथ और दिशा बदलने की क्षमता चेतावनी के लिए उपलब्ध समय को कम कर सकती है तथा मिसाइल रक्षा प्रणालियों द्वारा इनका पता लगाने और इन्हें रोकने की प्रक्रिया को जटिल बना सकती है। हालाँकि, इन्हें रोकना कठिन है, असंभव नहीं।
भारत का हाइपरसोनिक हथियार कार्यक्रम
- हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक वाहन (HSTDV): रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने सितंबर 2020 में स्क्रैमजेट-आधारित हाइपरसोनिक प्रौद्योगिकी का सफल प्रदर्शन किया। इस दौरान वाहन ने लगभग मैक 6 की गति से 20 सेकंड से अधिक समय तक दहन प्रक्रिया बनाए रखी।
- लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल: नवंबर 2024 में डीआरडीओ ने भारत में स्वदेशी रूप से विकसित लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल का पहला उड़ान परीक्षण सफलतापूर्वक किया। इसे सशस्त्र बलों के लिए 1,500 किमी से अधिक दूरी तक विभिन्न प्रकार के पेलोड ले जाने के लिए विकसित किया गया है।
- स्क्रैमजेट प्रणोदन में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि: मई 2026 में डीआरडीओ की रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (DRDL) ने सक्रिय शीतलन युक्त पूर्ण आकार के स्क्रैमजेट दहन कक्ष का 1,200 सेकंड से अधिक समय तक सफल भू-परीक्षण किया। इससे भारत के हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल कार्यक्रम के विकास को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
समुद्री राज्य विकास परिषद की 21वीं बैठक
संदर्भ: समुद्री राज्य विकास परिषद की 21वीं बैठक 13 अक्टूबर 2026 को मुंबई में केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल की अध्यक्षता में संपन्न हुई। भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के तहत वैधानिक दर्जा प्राप्त करने के बाद यह परिषद की पहली बैठक थी।
बैठक के प्रमुख परिणाम
- एक राष्ट्र, एक पत्तन प्रक्रिया: मार्च 2027 तक सभी पत्तनों पर मानकीकृत दस्तावेज़ीकरण, पत्तन प्रक्रियाओं का पुनर्गठन और मंत्रालयों के बीच सुधार लागू किए जाने हैं।
- डिजिटलीकरण और पारदर्शिता: मार्च 2027 तक सभी पत्तनों को समुद्री एकल खिड़की (एमएसडब्ल्यू–सागर सेतु) से जोड़ना अनिवार्य होगा तथा पत्तन शुल्कों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रकाशित करना होगा।
- पत्तन-आधारित औद्योगीकरण और संपर्क: राज्य सुगम स्थापना और संचालन की सुविधाओं तथा त्वरित अनुमोदन वाली पत्तन-संबद्ध औद्योगिक संकुलों का विकास करेंगे। परिषद ने गैर-प्रमुख पत्तनों के लिए पत्तन मास्टर प्लान तैयार करने और बहु-माध्यम संपर्क में सुधार करने का भी आह्वान किया।
- जहाज निर्माण को समर्थन: जहाज निर्माण विकास योजना के तहत ऋण जोखिम बीमा के दो उत्पाद शुरू किए गए—निर्यात परियोजनाओं के लिए ईसीजीसी लिमिटेड द्वारा विकसित एसबीपीसीपी तथा घरेलू परियोजनाओं के लिए द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (NIACL) द्वारा विकसित बीसीएसपीएस।
- दीर्घकालिक समुद्री नियोजन: परिषद ने समुद्री भारत दृष्टि 2030 और समुद्री अमृत काल दृष्टि 2047 के अंतर्गत लक्ष्य अपनाए। इनमें पत्तनों, जहाजरानी, अंतर्देशीय जलमार्गों, जहाज निर्माण और हरित जहाजरानी से संबंधित 500 से अधिक पहल शामिल हैं।
समुद्री राज्य विकास परिषद के बारे में
- उत्पत्ति: भारत के समुद्री क्षेत्र के समन्वित विकास को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1997 में इसका गठन किया गया था।
- वैधानिक दर्जा: भारतीय पत्तन अधिनियम, 2025 के तहत इसे वैधानिक परामर्शदात्री निकाय के रूप में मान्यता दी गई। इस अधिनियम ने भारतीय पत्तन अधिनियम, 1908 का स्थान लिया।
- अध्यक्ष: केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री।
- उद्देश्य: पत्तन अवसंरचना, संपर्क, दक्षता और पारदर्शिता सहित समुद्री क्षेत्र के एकीकृत विकास तथा केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को सुगम बनाना।
अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस
संदर्भ: आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस प्रतिवर्ष 13 अक्टूबर को मनाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस के बारे में
- उत्पत्ति: जोखिम के प्रति जागरूकता और आपदा न्यूनीकरण की वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के आह्वान के बाद वर्ष 1989 में इसकी स्थापना की गई थी।
- 2026 की विषयवस्तु – “लचीलापन घर से शुरू होता है”: यह रेखांकित करती है कि सुरक्षित आवास, जोखिम के अनुरूप भूमि उपयोग नियोजन, आपदा-रोधी निर्माण और घरेलू तैयारी किस प्रकार आपदा जोखिमों को कम कर सकते हैं।
- वैश्विक रूपरेखा: यह दिवस आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंदाई रूपरेखा (2015–2030) के अनुरूप आपदा जोखिम न्यूनीकरण को बढ़ावा देता है। यह आपदा जोखिमों को रोकने और कम करने तथा लचीलापन मजबूत करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय रूपरेखा है।
आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंदाई फ्रेमवर्क (2015–2030)
- अंगीकरण: इसे मार्च 2015 में जापान के सेंदाई में आयोजित आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन में अपनाया गया था।
- उद्देश्य: एकीकृत उपायों के माध्यम से नए आपदा जोखिमों को रोकना और मौजूदा जोखिमों को कम करना, ताकि जोखिम के संपर्क और संवेदनशीलता में कमी आए, तैयारी मजबूत हो तथा लचीलापन बढ़े।
- कार्रवाई की चार प्राथमिकताएँ:
- आपदा जोखिम को समझना।
- आपदा जोखिम के प्रबंधन के लिए आपदा जोखिम शासन को मजबूत करना।
- लचीलेपन के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश करना।
- प्रभावी प्रतिक्रिया के लिए आपदा तैयारी को बढ़ाना तथा पुनर्बहाली, पुनर्वास और पुनर्निर्माण में “बेहतर पुनर्निर्माण” करना।
- भारत की पहल – आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन: भारत द्वारा सितंबर 2019 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन में शुरू किया गया यह गठबंधन, नई दिल्ली में मुख्यालय वाला एक वैश्विक साझेदारी मंच है, जो जलवायु और आपदा जोखिमों के प्रति अवसंरचना प्रणालियों के लचीलेपन को बढ़ावा देता है।
