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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल ढाँचा; विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति; विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य एवं उत्तरदायित्व।
संदर्भ: हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न पर विभाजित निर्णय दिया कि क्या मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाले मामले पर बड़ी संविधान पीठ द्वारा विचार किया जाना चाहिए।
विभाजित निर्णय के प्रमुख बिंदु
- बड़ी पीठ को संदर्भित करना:दो न्यायाधीशों वाली पीठ के न्यायाधीश इस मुद्दे पर अलग-अलग मत रखते थे कि क्या संबंधित कानून अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान पीठ के समक्ष विचार किए जाने योग्य विधि का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
- हालांकि, मामले को बड़ी पीठ को संदर्भित करने के मुद्दे पर अलग-अलग मत होने के बावजूद, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत थे कि मामले को उचित बड़ी पीठ के गठन पर विचार करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाना चाहिए।
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता: निर्णय में इस बात की जाँच की गई कि क्या 2023 का अधिनियम निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के एकाधिकार वाले प्रभाव से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से संबंधित पहलू है।
- कार्यपालिका का प्रभुत्व: 2023 के अधिनियम ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री को शामिल किया, जिससे प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और नामित मंत्री वाली तीन सदस्यीय चयन समिति में कार्यपालिका के दो सदस्य हो गए।
- धारणा की कसौटी: न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए दिखाई भी देना चाहिए; प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री, प्रधानमंत्री के विरुद्ध स्वतंत्र संतुलन प्रदान नहीं कर सकता है।
- संवैधानिक प्रश्न: इस चुनौती से संस्थागत स्वतंत्रता, तटस्थता, अनुच्छेद 14, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद की शक्ति की संवैधानिक सीमाओं से संबंधित प्रश्न उठते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
- अनुच्छेद 324(2): इसमें संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन राष्ट्रपति द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति का प्रावधान है; 2023 से पहले चयन तंत्र निर्धारित करने वाला ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं था।
- अनूप बरनवाल निर्णय, 2023: जब तक संसद द्वारा कोई कानून नहीं बनाया जाता, तब तक सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP) वाली चयन समिति निर्धारित की, जिसमें स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
- 2023 का अधिनियम: संसद ने CJI के स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक मंत्री को शामिल किया, जिससे वर्तमान प्रधानमंत्री–LoP–मंत्री चयन तंत्र स्थापित हुआ।
- वर्तमान चुनौती: याचिकाओं में 2023 के अधिनियम की धारा 6, 7 और 8(2) सहित अन्य प्रावधानों को मुख्य रूप से निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और तटस्थता से संबंधित आधारों पर चुनौती दी गई है।
संवैधानिक और कानूनी ढाँचा
- अनुच्छेद 324: यह चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग में निहित करता है तथा नियुक्तियों के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 324(2): यह संसद को कानून के माध्यम से मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित करने में सक्षम बनाता है।
- अनुच्छेद 145(3): संविधान की व्याख्या से संबंधित विधि के किसी महत्वपूर्ण प्रश्न का निर्णय करने के लिए कम से कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ का होना आवश्यक है।
- मूल संरचना: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा उन्हें संचालित करने के लिए आवश्यक संस्थागत स्वतंत्रता को सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण सिद्धांतों के रूप में मान्यता दी है।
मामले का महत्त्व
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता: यह एक स्वतंत्र और तटस्थ निर्वाचन आयोग के लिए आवश्यक संवैधानिक सुरक्षा उपायों को स्पष्ट कर सकता है।
- संसदीय शक्ति: यह नियुक्ति तंत्र तैयार करने के दौरान अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद के अधिकार की सीमाओं को परिभाषित कर सकता है।
- निर्वाचन की शुचिता: यह निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के बीच संबंध को और स्पष्ट कर सकता है।
- संविधान पीठ का न्यायशास्त्र: यह स्पष्ट कर सकता है कि किसी मौजूदा संवैधानिक सिद्धांत को नियमित पीठ द्वारा कब लागू किया जा सकता है और कब किसी नए संवैधानिक प्रश्न के लिए बड़ी पीठ की आवश्यकता होती है।
- न्यायिक प्रशासन: इस मामले ने संवैधानिक संदर्भों के निपटारे में होने वाली देरी तथा प्रमुख संवैधानिक मामलों के लिए स्थायी पाँच-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के प्रस्ताव को भी उजागर किया है।
