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सामान्य अध्ययन-2:संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ।
संदर्भ: यमुना बेसिन के छह राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने 15 सितंबर 2026 को लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे परियोजना के कार्यान्वयन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
समझौते के मुख्य बिंदु
- छह हस्ताक्षरकर्ता: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने नई दिल्ली में समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- केंद्र की सहायता: केंद्र सरकार जल घटक की लागत का 90% केंद्रीय सहायता के रूप में प्रदान करेगी, जबकि शेष हिस्सा सहमत व्यवस्था के अनुसार सहभागी राज्यों द्वारा वहन किया जाएगा।
- लागत-लाभ व्यवस्था: हिमाचल प्रदेश के जल हिस्से का आवंटन दिल्ली और राजस्थान को किया जाएगा। ये दोनों राज्य हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत में उसके हिस्से को क्रमशः 75:25 के अनुपात में वहन करेंगे।
- अगला कदम: यह समझौता लंबे समय से चले आ रहे अंतर-राज्यीय गतिरोध के बाद परियोजना के कार्यान्वयन को सुगम बनाएगा। इसके बाद परियोजना आवश्यक अनुमोदन प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ेगी।
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के बारे में

- स्थान: यह परियोजना टोंस नदी पर, हिमाचल प्रदेश–उत्तराखंड सीमा के निकट प्रस्तावित है। यह हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले और उत्तराखंड के देहरादून जिले के कुछ हिस्सों को कवर करती है।
- बाँध: यहाँ 232.6 मीटर ऊँचे कंक्रीट ग्रेविटी बाँध के निर्माण का प्रस्ताव है।
- बहुउद्देशीय प्रकृति: परियोजना में जल भंडारण, सिंचाई, पेयजल एवं औद्योगिक जलापूर्ति तथा जलविद्युत उत्पादन को शामिल किया गया है।
- विद्युत उत्पादन: परियोजना की स्थापित क्षमता 422 मेगावाट है तथा इससे प्रतिवर्ष लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन होने की उम्मीद है।
- सिंचाई: परियोजना से लगभग 97,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित होने की संभावना है।
- जल आपूर्ति: परियोजना से हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को लाभ मिलने की संभावना है, जबकि समझौते के तहत उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लिए भी जल के विशिष्ट हिस्से निर्धारित किए गए हैं।
किशाऊ और ऊपरी यमुना जल-बंटवारा ढाँचा
- 1994 का ऊपरी यमुना समझौता: 12 मई 1994 को हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली ने ऊपरी यमुना बेसिन के उपयोग योग्य सतही जल के बंटवारे पर सहमति व्यक्त की। वर्ष 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद वह भी इस समझौते का पक्षकार बन गया।
- जल भंडारण की आवश्यकता: इस ढाँचे में मौसमी जलप्रवाह को नियंत्रित करने और ऊपरी यमुना के जल का अधिक विश्वसनीय एवं प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए जल भंडारण परियोजनाओं की आवश्यकता को स्वीकार किया गया।
- तीन प्रमुख परियोजनाएँ: ऊपरी यमुना प्रणाली में प्रमुख जल भंडारण परियोजनाओं के रूप में किशाऊ, लखवाड़ और रेणुकाजी परियोजनाओं की परिकल्पना की गई थी।
- अलग-अलग परियोजना समझौते: वर्ष 1994 के ढाँचे में प्रत्येक जल भंडारण परियोजना के लिए अलग समझौते किए जाने की व्यवस्था की गई थी। इसी ने वर्तमान किशाऊ समझौते के लिए संस्थागत आधार प्रदान किया।
किशाऊ परियोजना में देरी क्यों हुई?
- लागत-वितरण से जुड़ी चिंताएँ: राज्यों के बीच परियोजना की लागत और उससे मिलने वाले लाभों के बंटवारे को लेकर मतभेद थे। विशेष रूप से हिमाचल प्रदेश पर पड़ने वाले वित्तीय भार को लेकर सहमति नहीं बन पाई।
- जलमग्नता एवं विस्थापन: प्रस्तावित जलाशय के कारण परियोजना क्षेत्र में भूमि के जलमग्न होने के साथ-साथ पुनर्वास एवं विस्थापन से संबंधित चिंताएँ उत्पन्न हुईं।
- लाभों का असमान वितरण: हिमाचल प्रदेश को अपने क्षेत्र में परियोजना के प्रभावों का सामना करना पड़ता, जबकि जल के महत्वपूर्ण लाभ निचले क्षेत्रों में स्थित राज्यों को मिलने थे। स्वीकार्य लागत-लाभ व्यवस्था का अभाव लंबे समय तक गतिरोध का कारण बना।
- 2026 में सफलता: जून 2026 में केंद्र और सहभागी राज्यों के बीच लागत-वितरण व्यवस्था पर सहमति बनी। इसमें हिमाचल प्रदेश के जल एवं विद्युत घटकों के लिए एक विशेष व्यवस्था भी शामिल थी।
समझौते का महत्व
- ऊपरी यमुना में जल सुरक्षा: जल के विनियमित भंडारण से लाभार्थी क्षेत्रों में पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए जल की उपलब्धता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
- यमुना का प्रवाह एवं संरक्षण: परियोजना से यमुना में अधिक विनियमित जलप्रवाह सुनिश्चित होने की उम्मीद है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस समझौते को जल की बेहतर उपलब्धता और यमुना संरक्षण से जोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते से 25% जल उपलब्ध होगा।
- सिंचाई एवं स्वच्छ ऊर्जा: किशाऊ परियोजना से लगभग 97,000 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता और 422 मेगावाट जलविद्युत क्षमता का सृजन होगा, जिससे कृषि तथा नवीकरणीय ऊर्जा दोनों क्षेत्रों को लाभ मिलेगा।
- सहकारी संघवाद: यह समझौता दर्शाता है कि केंद्रीय सहायता और सहमति-आधारित लागत-लाभ बंटवारे के माध्यम से लंबे समय से लंबित अंतर-राज्यीय जल अवसंरचना परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है।
- एकीकृत बेसिन विकास: लखवाड़ और रेणुकाजी परियोजनाओं के साथ मिलकर किशाऊ परियोजना ऊपरी यमुना बेसिन के लिए प्रस्तावित जल भंडारण अवसंरचना को सुदृढ़ करती है।
