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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास एवं नई प्रौद्योगिकी का विकास; सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष के क्षेत्र में जागरूकता।
संदर्भ: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के कई कर्मचारी संघों ने अंतरिक्ष एजेंसी की मुख्य प्रक्रियाओं को निजी क्षेत्र की कंपनियों को हस्तांतरित किए जाने को लेकर चिंता जताई है।
अन्य संबंधित जानकारी
- निजी भागीदारी की ओर बदलाव:अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को लेकर चिंता तब सामने आई जब IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका ने कहा कि इसरो अंततः सभी प्रक्षेपण यानों का निर्माण और निर्माणाधीन अंतरिक्ष बंदरगाह का संचालन बंद कर देगा।
- इसरो के अध्यक्ष वी. नारायणन ने स्पष्ट किया कि इन गतिविधियों को निजी संस्थाओं को हस्तांतरित करने का उद्देश्य भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का विस्तार करना है, न कि इसरो का निजीकरण करना।
- मुख्य भूमिका: इसरो उन्नत अंतरिक्ष अनुसंधान, राष्ट्रीय एवं सामरिक मिशनों, अंतरिक्ष विज्ञान, अन्वेषण तथा महत्वपूर्ण अग्रणी क्षमताओं के लिए प्रमुख संस्था बना रहेगा।
- भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023: इस विकास को भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023 के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जो इसरो, IN-SPACe, NSIL और निजी संस्थाओं की भूमिकाओं को पुनर्परिभाषित करती है।
- बढ़ती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था: भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का वर्तमान अनुमान लगभग 8.4 अरब डॉलर है, जो तेजी से विस्तार कर रही वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अभी भी अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है। भारत का लक्ष्य 2033 तक वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 44 अरब डॉलर करना है।
भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023: अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए नया ढाँचा
- अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोले जाने और 2020 में IN-SPACe की स्थापना के बाद, भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023 तैयार की गई, जिसका उद्देश्य इसरो, IN-SPACe, न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और निजी संस्थाओं की भूमिकाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना था।
- इसरो: परिचालन विनिर्माण से उन्नत अनुसंधान की ओर
- अनुसंधान-उन्मुख भूमिका: नए अनुप्रयोगों, प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों का विकास करना; उद्योग के साथ प्रौद्योगिकियाँ साझा करना; उपग्रह आँकड़ों का भंडारण एवं उपलब्ध कराना; तथा अंतरिक्ष में दीर्घकालिक मानव उपस्थिति के लिए मानव अंतरिक्ष उड़ान की क्षमता का प्रदर्शन करना।
- विनिर्माण में बदलाव: परिचालन अंतरिक्ष प्रणालियों के विनिर्माण से धीरे-धीरे बाहर निकलते हुए नई प्रौद्योगिकियों का विकास करना।
- IN-SPACe: उद्योग के लिए अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को खोलना
- प्रोत्साहन एवं प्राधिकरण: निजी अंतरिक्ष गतिविधियों को बढ़ावा देना, उद्योगों को मार्गदर्शन एवं सहायता प्रदान करना तथा अनुकूल वातावरण तैयार करना; साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय/विदेश नीति संबंधी दायित्वों को ध्यान में रखते हुए गतिविधियों को अधिकृत करना।
- NSIL: इसरोकी वाणिज्यिक शाखा
- वाणिज्यीकरण: न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), अंतरिक्ष विभाग का सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम और इसरो की वाणिज्यिक शाखा है, जो सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा विकसित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों का वाणिज्यीकरण करती है तथा अंतरिक्ष-आधारित आवश्यकताओं को पूरा करती है।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार: NSIL का राजस्व वित्त वर्ष 2021-22 में ₹321.77 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में ₹3,246.09 करोड़ हो गया।
- 31 जनवरी 2026 तक, IN-SPACe ने उद्योग और स्टार्टअप्स को इसरो की 71 प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण में सुविधा प्रदान की थी।
हस्तांतरित की जा रही प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ एवं प्रक्रियाएँ
- SSLV: लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) को 3 विकासात्मक उड़ानों के बाद 2024 में परिचालन में लाया गया। इसे उद्योग के लिए तैयार किया गया है, जिसमें 3 दिन में संयोजन, 6 लोगों और ₹30 करोड़ की लागत की आवश्यकता होती है, जबकि PSLV के लिए 70 दिन, 60 लोग और ₹100 करोड़ की आवश्यकता होती है।
- PSLV: 2022 में यह भारत का पहला वाणिज्यीकृत प्रक्षेपण यान बना। 5 PSLV के निर्माण का अनुबंध HAL–L&T कंसोर्टियम को दिया गया था।
- 2026 में जारी एक नए रुचि की अभिव्यक्ति (EoI) में इसरो द्वारा 36 महीने या 2 प्रक्षेपण यानों के एंड-टू-एंड निर्माण तक सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव है।
- LVM3: इसरो ने 2024 में LVM3 का वाणिज्यीकरण शुरू किया, लेकिन इसकी बोली कभी प्रदान नहीं की गई। शुरुआत में NSIL ने 2 वर्षों की विकासात्मक सहायता देने की योजना बनाई थी, जिसके बाद उद्योग को 12 वर्षों तक प्रति वर्ष 4–6 LVM3 रॉकेट बनाने थे।
- नया EoI (2026): नए EoI में 42 महीने या कम से कम 2 प्रक्षेपण यानों के साकार होने तक इसरो की सहायता का प्रावधान है। इसके बाद उद्योग अपना स्वयं का बाजार विकसित करने में सक्षम होगा।
- कुलसेकरपट्टिनम में उपग्रह प्रक्षेपण परिसर: 2026 में IN-SPACe ने तमिलनाडु के तूतीकोरिन स्थित कुलसेकरपट्टिनम में निर्माणाधीन लघु उपग्रह प्रक्षेपण अंतरिक्ष बंदरगाह के संचालन के लिए EoI आमंत्रित किया। यह सरकारी अंतरिक्ष क्षेत्र सुधारों और भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023 के अनुरूप है।
भारत निजी भागीदारी की ओर क्यों बढ़ रहा है?

- भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार:क्षेत्र को निजी भागीदारों के लिए खोलने का उद्देश्य वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की 2% से कम हिस्सेदारी को बढ़ाना है।
- इसका लक्ष्य अगले दशक में इस क्षेत्र को 2026 में 9 अरब डॉलर से बढ़ाकर 40–45 अरब डॉलर करना है। इसके तहत निजी भागीदार नियमित सेवाओं का संचालन करेंगे और भारतीय तथा अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को विश्वसनीय एवं लागत-प्रभावी प्रक्षेपण सेवाएँ उपलब्ध कराएँगे।
- निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में निवेश पहले ही छह गुना बढ़कर 100.5 मिलियन डॉलर (2021–22) से 31 मार्च 2026 तक 618.5 मिलियन डॉलर हो गया है।
- वाणिज्यीकरण और सामरिक क्षमता के बीच संतुलन:जबकि वाणिज्यीकरण का मुख्य ध्यान नागरिक अंतरिक्ष गतिविधियों पर है, इसरो को चंद्रयान-4 और 5, गगनयान तथा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे सामरिक उद्देश्यों और प्रमुख मिशनों के लिए आंतरिक विशेषज्ञता बनाए रखने की आवश्यकता है।
- निजी क्षेत्र अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है और अभी इसरो के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं है, इसलिए इसरो की विशेषज्ञता को संरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।
प्रमुख चिंताएँ
- आंतरिक विशेषज्ञता की आवश्यकता: इस बदलाव से इसरो की महत्वपूर्ण आंतरिक विशेषज्ञता को बनाए रखने को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं, क्योंकि निजी अंतरिक्ष क्षेत्र अभी शुरुआती चरण में है और वर्तमान में इसरो की क्षमताओं की बराबरी नहीं कर सकता।
- सामरिक एवं वैज्ञानिक आवश्यकताएँ: इस विशेषज्ञता को बनाए रखना भारत की सामरिक आवश्यकताओं के लिए आवश्यक है, विशेषकर जब मिशन की विफलता या देरी के लिए विशेषीकृत ज्ञान की आवश्यकता होती है। यह चंद्रयान-4 और 5, गगनयान तथा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
- सीमित वाणिज्यिक पैमाना: मजबूत तकनीकी क्षमताओं और लागत-प्रभावी प्रक्षेपणों के बावजूद, उच्च-मूल्य वाली डाउनस्ट्रीम अंतरिक्ष गतिविधियों में भारत की उपस्थिति सीमित है और उसे वैश्विक बाजार तक अधिक मजबूत पहुँच की आवश्यकता है।
- वित्तपोषण एवं प्रतिभा का अभाव: अंतरिक्ष स्टार्टअप्स को उच्च पूंजी आवश्यकताओं, तकनीकी एवं बाजार जोखिमों, लंबी परिपक्वता अवधि और सीमित धैर्यपूर्ण पूंजी की चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही, विशेषीकृत अंतरिक्ष प्रतिभाओं की भी कमी है।
- प्रौद्योगिकी एवं आयात पर निर्भरता: भारत के पास एंड-टू-एंड मिशन क्षमता है, लेकिन उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, विशेषीकृत सामग्रियों और उच्च-स्तरीय विनिर्माण उपकरण जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता है, जिससे आपूर्ति शृंखला संबंधी कमजोरियाँ उत्पन्न होती हैं।
- प्रक्षेपण विश्वसनीयता एवं परिचालन संबंधी बाधाएँ: यान में आने वाली विसंगतियाँ, पेलोड विफलताएँ, विनिर्माण और गुणवत्ता-आश्वासन संबंधी चुनौतियाँ वाणिज्यिक प्रक्षेपणों, सामरिक तैनाती और समग्र क्रियान्वयन क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
आगे की राह
- सुधार एवं पारिस्थितिकी तंत्र: भारतीय अंतरिक्ष नीति–2023, उदारीकृत FDI मानदंड और समर्पित वित्तपोषण पहलों ने संभावित निजी भागीदारों के लिए संपूर्ण अंतरिक्ष मूल्य शृंखला खोल दी है, जिससे स्टार्टअप्स, स्वदेशी नवाचार और वाणिज्यिक गतिविधियों के विस्तार को बढ़ावा मिल रहा है।
- धैर्यपूर्ण पूंजी एवं जोखिम वित्तपोषण: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की पूंजी-गहन और लंबी परिपक्वता अवधि वाली प्रकृति के अनुरूप ऋण गारंटी, प्रक्षेपण-विफलता बीमा, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण और मिश्रित वित्तपोषण का विस्तार करना।
- स्वदेशी प्रौद्योगिकी एवं विनिर्माण: अंतरिक्ष-ग्रेड सेमीकंडक्टर, सेंसर, परमाणु घड़ियों, ऑप्टिकल प्रणालियों और उन्नत प्रणोदन में घरेलू क्षमताओं को बढ़ावा देना तथा भारतीय MSME को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करना।
- घरेलू मांग एवं कुशल प्रतिभा: बहुवर्षीय खरीद और परिणाम-आधारित अनुबंधों के माध्यम से सुनिश्चित सरकारी मांग का सृजन करना तथा विशेषीकृत शिक्षा और इसरो–शैक्षणिक जगत–उद्योग के बीच संबंधों को मजबूत करना।
