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संदर्भ: वर्ष 2014 में राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन मिशन के रूप में शुरू की गई प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) ने समाज के उन वर्गों तक औपचारिक बैंकिंग सुविधाओं की पहुँच का विस्तार करते हुए 12 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जो पहले इन सुविधाओं से वंचित थे।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY) को समझना

  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना भारत का राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन मिशन है, जिसे 28 अगस्त 2014 को शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य बैंकिंग, बचत, धन प्रेषण, ऋण, बीमा और पेंशन सेवाओं तक किफायती पहुँच प्रदान करना है।
  • यह बैंकिंग सुविधा से वंचित व्यक्ति को बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट (BSBD) खाता खोलने की सुविधा प्रदान करती है। यह खाता बैंक शाखा या बैंकिंग संवाददाता (बैंक मित्र) के माध्यम से खोला जा सकता है तथा इसमें न्यूनतम शेष राशि बनाए रखने की कोई आवश्यकता या रखरखाव शुल्क नहीं है।
  • इसका मूल दृष्टिकोण “बैंकिंग से वंचितों को बैंकिंग सुविधा प्रदान करना, असुरक्षितों को सुरक्षा प्रदान करना और वित्त से वंचितों को वित्त उपलब्ध कराना” है। इसके अंतर्गत बुनियादी बैंक खातों को RuPay कार्ड, बीमा, ओवरड्राफ्ट तथा अन्य वित्तीय सेवाओं तक पहुँच के साथ जोड़ा गया है।
  • प्रमुख लाभ: 28 अगस्त 2018 के बाद खोले गए खातों के लिए RuPay डेबिट कार्ड के साथ₹2 लाख का दुर्घटना बीमा कवर; पात्र खाताधारकों के लिए₹10,000 तक की ओवरड्राफ्ट सुविधा; तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY), प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY), अटल पेंशन योजना (APY) और मुद्रा (MUDRA) जैसी योजनाओं तक पहुँच।
  • योजना का विकास: वर्ष 2018 से इसका ध्यान “प्रत्येक परिवार” से हटकर “प्रत्येक बैंकिंग सुविधा से वंचित वयस्क” पर केंद्रित हो गया है। यह परिवार-स्तरीय पहुँच से व्यक्तिगत वित्तीय समावेशन की ओर बदलाव को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना के 12 वर्ष: प्रमुख उपलब्धियाँ

  • बैंकिंग पहुँच का व्यापक विस्तार: प्रधानमंत्री जन-धन योजना खातों की संख्या 2015 में 14.72 करोड़ से बढ़कर 19 अगस्त 2026 तक 59.09 करोड़ हो गई है, जो लगभग चार गुना वृद्धि है।
  • बचत और जमा में वृद्धि: कुल जमा राशि मार्च 2015 में ₹15,670 करोड़ से बढ़कर ₹3,16,514 करोड़ हो गई, जबकि प्रति खाते औसत जमा राशि ₹5,356 तक पहुँच गई। यह औपचारिक बचत में बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों और महिलाओं तक अधिक पहुँच: 45.95 करोड़ खाते (77.8%) ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में हैं, जबकि 32.92 करोड़ खाते (55.7%) महिलाओं के नाम पर हैं।
  • डिजिटल वित्तीय पहुँच का विस्तार: 41.29 करोड़ रूपे डेबिट कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जिससे औपचारिक भुगतान अवसंरचना और इससे जुड़े दुर्घटना बीमा तक पहुँच उपलब्ध हुई है।
  • व्यापक वित्तीय समावेशन तंत्र: प्रधानमंत्री जन-धन योजना प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, बीमा, पेंशन, ऋण और डिजिटल भुगतान का आधार बन गया है, जो बुनियादी बैंक खाता सुविधा को व्यापक वित्तीय सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के वितरण से जोड़ता है।

प्रधानमंत्री जन-धन योजना का महत्व/प्रभाव

  • औपचारिक वित्त को सार्वभौमिक बनाना: प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर रहने वाली आबादी के बड़े हिस्से, विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में, बुनियादी बैंकिंग पहुँच की बाधा को काफी हद तक कम किया है।
  • कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में बदलाव: जन-धन–आधार–मोबाइल संरचना के बैंकिंग स्तंभ के रूप में प्रधानमंत्री जन-धन योजना, सरकारी लाभों को लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे हस्तांतरित करने में सक्षम बनाता है, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता और देरी कम होती है।
  • वित्तीय सुरक्षा का निर्माण: खाताधारकों को बचत, बीमा, पेंशन और ऋण से जोड़कर प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने बैंक खाते की भूमिका को केवल लेन-देन की सुविधा से आगे बढ़ाकर व्यापक वित्तीय-सुरक्षा तंत्र में प्रवेश के माध्यम के रूप में विस्तारित किया है।
  • महिलाओं के वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना: 55.7% खाते महिलाओं के नाम पर होने के साथ, प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने महिलाओं की औपचारिक वित्तीय पहचान तथा कल्याणकारी योजनाओं और वित्तीय सेवाओं तक उनकी पहुँच का उल्लेखनीय विस्तार किया है। हालाँकि, केवल खाता होना वास्तविक वित्तीय सशक्तीकरण का संकेत आवश्यक रूप से नहीं है।
  • डिजिटल वित्तीय समावेशन की नींव तैयार करना: प्रधानमंत्री जन-धन योजना का आधार, मोबाइल कनेक्टिविटी और डिजिटल भुगतान के साथ एकीकरण भारत के व्यापक डिजिटल वित्तीय तंत्र की वित्तीय-पहुँच संबंधी आधारभूत परत स्थापित करने में सहायक रहा है।

स्थायी कमियाँ और चुनौतियाँ

  • पहुँच बनाम सक्रिय उपयोग: बैंक खाता होना अपने आप में नियमित वित्तीय भागीदारी में परिवर्तित नहीं होता; निष्क्रिय/डॉर्मेंट खाते और कम लेन-देन गतिविधि प्रधानमंत्री जन-धन योजना के आकलनों में पहचानी गई प्रमुख चिंताएँ बनी हुई हैं।
  • वित्तीय समावेशन की सीमित गहराई: अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि खाताधारकों को सस्ती ऋण सुविधा, बचत, बीमा और पेंशन उत्पादों तक सार्थक पहुँच भी प्राप्त हो, न कि खातों का उपयोग मुख्यतः धन हस्तांतरण प्राप्त करने तक सीमित रहे।
  • अंतिम छोर तक पहुँच और डिजिटल बाधाएँ: कनेक्टिविटी की कमी, सीमित बैंकिंग अवसंरचना तथा बैंकिंग संवाददाता नेटवर्क की गुणवत्ता/व्यवहार्यता, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में, विश्वसनीय वित्तीय पहुँच को बाधित कर सकती है।
  • वित्तीय साक्षरता और उपभोक्ता संरक्षण: सीमित वित्तीय/डिजिटल साक्षरता वित्तीय सेवाओं के प्रभावी उपयोग को बाधित कर सकती है, जबकि डिजिटल सेवाओं के बढ़ते उपयोग से धोखाधड़ी, गलत तरीके से उत्पादों की बिक्री और वित्तीय शोषण के जोखिम भी बढ़ रहे हैं।
  • केवल पहुँच नहीं, परिणामों का मापन: वित्तीय समावेशन की सफलता का आकलन अब केवल खातों की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उपयोग, सेवा की गुणवत्ता, वित्तीय लचीलापन और आर्थिक सशक्तीकरण के आधार पर भी किया जाना आवश्यक है। भारत का समग्र वित्तीय समावेशन सूचकांक 2018 में 53.9 से बढ़कर 2026 में 67 होना इस व्यापक मापन दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।

आगे की राह

  • खाता खोलने से सक्रिय उपयोग की ओर बदलाव: निष्क्रिय खातों को सक्रिय करने तथा नियमित बचत, भुगतान और अन्य सार्थक वित्तीय लेन-देन को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
    • वित्तीय उत्पादों तक पहुँच को गहरा करना: सस्ती ऋण सुविधा, बीमा, पेंशन और आजीविका-उन्मुख वित्तीय सेवाओं के साथ संबंधों को मजबूत किया जाना चाहिए, साथ ही अत्यधिक ऋणग्रस्तता से बचाव सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
    • अंतिम छोर तक सेवा वितरण को मजबूत करना: वंचित क्षेत्रों में विश्वसनीय वित्तीय पहुँच सुनिश्चित करने के लिए बैंक मित्र, बैंकिंग अवसंरचना और डिजिटल कनेक्टिविटी की व्यवहार्यता एवं गुणवत्ता में सुधार किया जाना चाहिए।
    • सुरक्षित और जागरूक भागीदारी को बढ़ावा देना: वित्तीय एवं डिजिटल साक्षरता का विस्तार किया जाना चाहिए तथा इसके साथ मजबूत उपभोक्ता संरक्षण, शिकायत निवारण और साइबर धोखाधड़ी से सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
    • परिणाम-आधारित वित्तीय समावेशन की ओर बढ़ना: प्रगति का आकलन पहुँच, उपयोग और गुणवत्ताके आधार पर किया जाना चाहिए। इसमें केवल खातों की संख्या के बजाय वित्तीय लचीलापन तथा महिलाओं द्वारा वित्तीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग और नियंत्रण पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
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