संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।

सामान्य अध्ययन -3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: परमाणु ऊर्जा विभाग ने परमाणु ऊर्जा एवं विकिरण से संबंधित दायित्व, सुरक्षा, विनियमन और अनुप्रयोग अधिनियम, 2025 को लागू करने के लिए शांति नियम, 2026 का मसौदा सार्वजनिक परामर्श हेतु जारी किया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • नियमों के मसौदे का उद्देश्य शांति अधिनियम, 2025 के अंतर्गत परिचालन संबंधी नियामक ढाँचा स्थापित करना है।
  • इनमें परमाणु दायित्व, वित्तीय सुरक्षा, लाइसेंसिंग और परमाणु सुरक्षा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • यह ढाँचा भारत के परमाणु क्षेत्र के सुरक्षित एवं विनियमित विस्तार को समर्थन देने के लिए बनाया गया है।

नियमों के मसौदे की प्रमुख विशेषताएँ

  • परमाणु दायित्व एवं वित्तीय सुरक्षा: संचालकों को परमाणु क्षति के विरुद्ध बीमा, वित्तीय सुरक्षा या दोनों के संयोजन की व्यवस्था बनाए रखनी होगी। संबंधित भंडारण कुंड से सभी प्रयुक्त ईंधन हटाए जाने तक वित्तीय सुरक्षा जारी रखनी होगी।
  • 1:1.33 सुरक्षा मार्जिन: जहाँ वित्तीय साधनों का उपयोग सुरक्षा के रूप में किया जाता है, वहाँ 1:1.33 का सुरक्षा मार्जिन निर्धारित किया गया है। किसी भी कमी को अतिरिक्त वित्तीय सुरक्षा या बीमा के माध्यम से पूरा करना होगा।
  • दायित्व की आवधिक समीक्षा: केंद्र सरकार प्रत्येक पाँच वर्ष में एक विशेषज्ञ समूह का गठन करेगी, जो परमाणु क्षति के लिए संचालक के अधिकतम नागरिक दायित्व की सीमा की समीक्षा करेगा।
  • सरल लाइसेंस व्यवस्था: परमाणु ऊर्जा संयंत्र या रिएक्टर के निर्माण, स्वामित्व, संचालन और निष्क्रियकरण के लिए एक एकल समग्र लाइसेंस का प्रस्ताव किया गया है।
  • विदेशी रिएक्टर प्रौद्योगिकी: विदेशी डिजाइन वाले रिएक्टरों के लिए मूल देश के नियामक प्राधिकरण से प्रमाणन या अनुमोदन आवश्यक होगा। साथ ही, ऐसे रिएक्टर का मूल देश या किसी अन्य विदेशी देश में परिचालन में होना आवश्यक होगा। प्रारूप में मूल देश की परिभाषा ऐसे आत्मनिर्भर रिएक्टर डिजाइन एवं आपूर्ति श्रृंखला तंत्र के आधार पर की गई है, जिसे विश्वसनीय वैश्विक नियामक स्वीकृतियाँ प्राप्त हों।
  • कैप्टिव एवं उभरते अनुप्रयोग: नियमों में ऊर्जा-गहन उद्योगों के लिए कैप्टिव परमाणु ऊर्जा को मान्यता दी गई है। इसके अंतर्गत डेटा केंद्र, अर्धचालक विनिर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे अनुप्रयोग भी नियामक ढाँचे के अधीन शामिल किए गए हैं।

भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्व

  • परमाणु ऊर्जा के विस्तार में सहायता: स्पष्ट लाइसेंसिंग और दायित्व संबंधी नियम भारत के दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा मिश्रण के हिस्से के रूप में परमाणु ऊर्जा का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा को बल दे सकते हैं।
  • निजी भागीदारी को बढ़ावा: स्पष्ट और पूर्वानुमेय नियम भारतीय निजी संस्थाओं की व्यापक भागीदारी को संभव बना सकते हैं, जिसकी परिकल्पना शांति अधिनियम के तहत की गई है। अधिनियम केंद्र सरकार के लाइसेंस और नियामक प्राधिकरण की अनुमति के अधीन निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देता है।
  • नियामक शासन को मजबूत करना: शांति ढाँचा परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्जा प्रदान करता है, जिससे विस्तारित हो रहे परमाणु क्षेत्र के नियमन के लिए मजबूत संस्थागत आधार तैयार होता है।
  • विश्वसनीय स्वच्छ ऊर्जा को समर्थन: कैप्टिव परमाणु ऊर्जा उत्पादन ऊर्जा-गहन उद्योगों तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा अवसंरचना और उन्नत विनिर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों को निरंतर कम-कार्बन वाली बिजली उपलब्ध करा सकता है।

प्रमुख चिंताएँ

  • दायित्व और जवाबदेही में संतुलन: दायित्व की सीमाएँ किसी परमाणु दुर्घटना के बाद प्रभावी मुआवजे और जवाबदेही को कमजोर नहीं करनी चाहिए।
  • आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही: शांति ढाँचे में आपूर्तिकर्ताओं के विरुद्ध संचालक के सीमित अधिकार से दोषपूर्ण उपकरण या प्रौद्योगिकी के लिए परमाणु आपूर्ति श्रृंखला में जिम्मेदारी को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • नियामक क्षमता: व्यापक निजी भागीदारी और परमाणु गतिविधियों में वृद्धि से परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की तकनीकी विशेषज्ञता, स्वतंत्रता और प्रवर्तन क्षमता पर अधिक दबाव पड़ेगा।
  • प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: विदेशी रिएक्टर प्रौद्योगिकी तक बेहतर पहुँच भारत को बाहरी आपूर्तिकर्ताओं, महत्वपूर्ण घटकों या दीर्घकालिक तकनीकी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता की ओर नहीं ले जानी चाहिए।

आगे की राह

  • जोखिम-आधारित वित्तीय सुरक्षा: परियोजना के आकार, मुद्रास्फीति और बदलते परमाणु जोखिमों के आधार पर दायित्व की सीमाओं, बीमा आवश्यकताओं तथा 1:1.33 सुरक्षा मार्जिन की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए।
  • परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को मजबूत करना: बड़े पैमाने पर निजी भागीदारी बढ़ने से पहले इसकी तकनीकी विशेषज्ञता, संस्थागत क्षमता और प्रवर्तन क्षमता को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • घरेलू क्षमता का निर्माण: विदेशी रिएक्टर प्रौद्योगिकियों तक पहुँच के साथ-साथ घटकों का स्वदेशीकरण, कुशल मानव संसाधन का विकास और सुदृढ़ परमाणु आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • सुरक्षा-आधारित विस्तार: परमाणु ऊर्जा का तीव्र विस्तार मजबूत विकिरण सुरक्षा, रेडियोधर्मी अपशिष्ट प्रबंधन, आपातकालीन तैयारी और प्रभावी मुआवजा तंत्र के साथ किया जाना चाहिए।
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