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सामान्य अध्यन-3: देश के विभिन्न भागों में प्रमुख फसलों के फसल पैटर्न तथा कृषि उपज का विपणन और उससे संबंधित मुद्दे एवं बाधाएँ; किसानों की सहायता में ई-प्रौद्योगिकी।
संदर्भ: भारत में मखाना बाजार 2029-30 तक ₹11,000–12,000 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है जिसके प्रमुख कारणों में इसकी बढ़ती मांग, कीमतों में वृद्धि, उत्पादन का विस्तार तथा स्वास्थ्य-केंद्रित स्नैक्स में बढ़ती रुचि शामिल हैं।
मखाना के बारे में
- मखाना, जिसे वैज्ञानिक रूप से Euryale ferox कहा जाता है, एक जलीय फसल है, जो मुख्यतः उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों में उगाई जाती है।
- पौधे का बीज खाने योग्य भाग होता है, जिसे भूनकर और फुलाकर मखाने के रूप में खाया जाता है।
- मखाने का पारंपरिक रूप से धार्मिक उपवास (व्रत) के दौरान सेवन किया जाता है। इसे सूखा भूनकर या घी में भूनकर भी खाया जाता है।
- इसे गॉर्गन नट भी कहा जाता है और कभी-कभी फॉक्स नट के नाम से भी जाना जाता है। हालाँकि, इसकी वानस्पतिक पहचान कमल या जलकुंभी से अलग है।
- मखाना पारंपरिक रूप से बिहार, विशेषकर उत्तर बिहार के मिथिला क्षेत्र से संबंधित है।
- मिथिला मखाना किस्म को 2022 में भौगोलिक संकेतक दर्जा प्राप्त हुआ, जिससे इसकी विशिष्ट पहचान और बाजार मूल्य को मजबूती मिली।
- मखाना बिहार के पारंपरिक खाद्य पदार्थ से विकसित होकर व्यापक रूप से उपभोग किए जाने वाले स्वास्थ्य-केंद्रित नाश्ते के रूप में उभरा है। इसके पीछे बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता, प्रीमियम उत्पादों की बढ़ती मांग तथा ब्रांडेड उत्पादों का विस्तार प्रमुख कारण हैं।
मखाना में भारत की स्थिति
- वैश्विक एवं घरेलू स्थिति: भारत विश्व का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक है। इसकी खेती मुख्यतः बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में केंद्रित है।
- बिहार का उत्पादन में सबसे बड़ा हिस्सा है, विशेषकर उत्तर बिहार, कोसी बेसिन, मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों में। प्रमुख उत्पादक जिलों में मधुबनी, दरभंगा, सहरसा, कटिहार, पूर्णिया और सुपौल शामिल हैं।
- उत्पादन एवं उत्पादकता: 2024-25 में भारत का मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन तथा औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर थी। वहीं, 2025-26 के द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार उत्पादन 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान है।
- बिहार का उत्पादन लगभग 60,000 मीट्रिक टन तथा उत्पादकता 2.00 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर अनुमानित है। खेत-प्रणाली आधारित खेती तथा स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी किस्में उत्पादकता बढ़ाने और खेती के जोखिम को कम करने में सहायक हैं।
- घरेलू बाजार एवं निर्यात क्षमता: घरेलू मखाना बाजार में 2021-22 से 2024-25 के बीच प्रतिवर्ष 17–18% की वृद्धि हुई और इसके 2029-30 तक ₹11,000–12,000 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। इसी अवधि में औसत कीमत लगभग ₹500 प्रति किलोग्राम से बढ़कर करीब ₹1,250 प्रति किलोग्राम हो गई।
- 2025-26 में भारत ने 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य ₹19,296.08 लाख था। अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात ने मिलकर कुल निर्यात में 77% की हिस्सेदारी की, जिससे निर्यात बाजारों में विविधता बढ़ाने की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।
सरकारी पहल
- राष्ट्रीय मखाना बोर्ड: इसकी घोषणा केंद्रीय बजट 2025-26 में की गई थी और इसे 15 सितंबर 2025 को बिहार के पूर्णिया में औपचारिक रूप से शुरू किया गया। इसका उद्देश्य उत्पादन, अनुसंधान, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांड निर्माण, विपणन और निर्यात सहित मखाना की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है।
- सरकार ने 2025-26 से 2030-31 तक मखाना विकास के लिए ₹476.03 करोड़ की केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी है। इसमें अनुसंधान एवं नवाचार, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई एवं कटाई-पश्चात प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांड निर्माण, विपणन, निर्यात और गुणवत्ता नियंत्रण पर ध्यान दिया गया है।
- मखाना विकास योजना (बिहार): इसके तहत किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है, 75% अनुदान पर पारंपरिक उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं तथा उन्नत बीजों के लिए ₹70,000 प्रति हेक्टेयर तक अनुदान दिया जाता है।
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना: भंडारण संबंधी पहल के तहत कटाई-पश्चात होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आधुनिक 5 मीट्रिक टन क्षमता वाले भंडारण केंद्रों की स्थापना पर 75% अनुदान, अधिकतम ₹7.5 लाख तक, प्रदान किया जाता है।
- प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना: छोटे मखाना प्रसंस्करण केंद्रों की स्थापना या उन्नयन के लिए ऋण-संबद्ध पूंजीगत अनुदान के रूप में 35% सहायता प्रदान करती है।
- पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जीवन के लिए निधि योजना: कारीगरों को मखाना समूहों में संगठित किया जाता है और उन्हें आधुनिक मशीनरी उपलब्ध कराई जाती है।
- दरभंगा स्थित डाक निर्यात केंद्र: भारतीय डाक द्वारा स्थापित यह केंद्र स्थानीय मखाना उत्पादकों को निर्यात दस्तावेजीकरण, पैकेजिंग और परिवहन में सहायता प्रदान करता है तथा मिथिलांचल को विदेशी बाजारों से सीधा संपर्क उपलब्ध कराता है।
महत्व
- किसानों की आय: उत्पादकता में वृद्धि, आधुनिक खेती तकनीकों, मूल्य संवर्धन और बेहतर बाजार संपर्क से किसानों की आय बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।
- ग्रामीण रोजगार: प्रसंस्करण, श्रेणीकरण, पैकेजिंग, ब्रांड निर्माण और मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से ग्रामीण रोजगार का सृजन तथा मखाना आधारित कृषि-उद्योगों को मजबूती मिल सकती है।
- निर्यात क्षमता: स्वास्थ्यवर्धक, वनस्पति-आधारित, प्राकृतिक और उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग मखाना को निर्यातोन्मुख कृषि मूल्य श्रृंखला के रूप में विकसित करने का अवसर प्रदान करती है।
- कृषि विविधीकरण: मखाना का पारंपरिक तालाब आधारित फसल से उच्च मूल्य वाले, ब्रांडेड और निर्यातोन्मुख कृषि-खाद्य उत्पाद में रूपांतरण कृषि विविधीकरण में योगदान दे सकता है तथा भारत की कृषि-खाद्य अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है।
