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सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान एवं मूल संरचना; कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की कार्यप्रणाली।

संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड को लागू करने की संवैधानिक रूप से अनुमेय विधि के रूप में फाँसी को बरकरार रखा है। न्यायालय ने फाँसी के स्थान पर किसी वैकल्पिक विधि को अपनाने की मांग करने वाली चुनौती को खारिज कर दिया।

निर्णय की प्रमुख बातें

• सर्वोच्च न्यायालय ने फाँसी की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी और इसे चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने दीना बनाम भारत संघ (1983) में स्थापित स्थिति पर पुनर्विचार करने से इनकार किया।

• न्यायालय ने पाया कि उसके समक्ष प्रस्तुत वैज्ञानिक सामग्री यह सिद्ध नहीं करती कि कोई वैकल्पिक विधि फाँसी की तुलना में स्पष्ट रूप से अधिक मानवीय है।

• न्यायालय ने इस मुद्दे को स्थायी रूप से समाप्त नहीं माना। भविष्य में ऐसा वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आने पर, जो दीना मामले में निहित मूल धारणाओं को मौलिक रूप से बदल दे, इस मुद्दे पर पुनर्विचार किया जा सकता है।

• केंद्र सरकार वैकल्पिक निष्पादन विधियों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है, जिससे भविष्य में नीतिगत या विधायी विचार की संभावना बनी रहती है।

फाँसी की सजा को चुनौती क्यों दी गई?

  • अनुच्छेद 21 और गरिमा: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि जीवन और गरिमा की संवैधानिक सुरक्षा मृत्युदंड को लागू करने के तरीके तक भी विस्तृत होती है, और फाँसी में क्रूर या अत्यधिक पीड़ा हो सकती है।
  • वैज्ञानिक अनिश्चितता: उन्होंने इस बात पर सवाल उठाया कि फाँसी देने के लिए निर्धारित ऊँचाई से गिराने पर क्या व्यक्ति की गर्दन की हड्डी टूटने के कारण तुरंत बेहोशी और मृत्यु हो जाती है। यदि गिरने की ऊँचाई कम हो, तो व्यक्ति की मृत्यु गर्दन टूटने के बजाय दम घुटने से हो सकती है, जबकि ऊँचाई बहुत अधिक होने पर गर्दन या सिर को गंभीर क्षति पहुँचने का खतरा रहता है।
  • अनुभवजन्य साक्ष्य: याचिकाकर्ताओं ने 1992 में किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें 1882 से 1945 के बीच इंग्लैंड में फाँसी दिए गए 34 लोगों के कंकाल अवशेषों का अध्ययन किया गया था। केवल तीन मामलों में गर्दन की हड्डी टूटने की स्थिति पाई गई, जबकि छह मौतों का कारण दम घुटना बताया गया।
  • वैकल्पिक विधियाँ: उन्होंने तर्क दिया कि घातक इंजेक्शन जैसी विधियाँ फाँसी की तुलना में अधिक मानवीय विकल्प हो सकती हैं।

न्यायालय ने फाँसी की सजा को क्यों बरकरार रखा?

  • स्थापित न्यायिक दृष्टांत: न्यायालय को दीना बनाम भारत संघ  में दिए पूर्ववर्ती निर्णय को बदलने का कोई ठोस आधार नहीं मिला। उस निर्णय में फाँसी को संविधान के अनुरूप मृत्युदंड देने की वैध विधि माना गया था।
  • अपर्याप्त साक्ष्य: याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक सामग्री दीना मामले के आधारभूत तर्कों का पर्याप्त रूप से खंडन नहीं कर सकी।
  • केंद्र सरकार का तर्क: केंद्र सरकार ने बताया कि 2003 के बाद भारत में केवल आठ मृत्युदंड दिए गए हैं और इनमें किसी असफल या गलत तरीके से निष्पादित फाँसी का कोई दर्ज मामला नहीं है। वहीं, अमेरिका में घातक इंजेक्शन के असफल होने के प्रमाण सामने आए हैं।
  • श्रेष्ठ वैकल्पिक विधि का प्रमाण नहीं: न्यायालय ने पाया कि घातक इंजेक्शन, इलेक्ट्रिक कुर्सी, जहरीली गैस और गोली मारकर मृत्युदंड देने जैसी विधियाँ फाँसी की तुलना में अधिक प्रभावी या मानवीय हैं, ऐसा सिद्ध नहीं हुआ है।

फाँसी की सजा की कानूनी स्थिति और इसके विकल्प

• न्यायिक स्थिति: बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में “दुर्लभतम से दुर्लभ (rarest of rare)” सिद्धांत के अधीन मृत्युदंड को बरकरार रखा गया, जबकि दीना बनाम भारत संघ (1983) में फाँसी को मृत्युदंड लागू करने की वैध विधि माना गया।

• वैधानिक प्रावधान: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 393(5) के तहत मृत्युदंड के लिए गर्दन से तब तक फाँसी देने का प्रावधान है, जब तक मृत्यु न हो जाए। इस प्रावधान की विधायी पृष्ठभूमि 1861 की दंड प्रक्रिया संहिता से जुड़ी है।

• विधि आयोग: 187वीं रिपोर्ट (2003) में मृत्युदंड लागू करने की वैकल्पिक विधि के रूप में घातक इंजेक्शन की सिफारिश की गई थी और सैन्य कानूनों के तहत गोली मारकर मृत्युदंड देने की विधि पर भी विचार किया गया था। इसके बाद संसद ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में फाँसी की विधि को ही बनाए रखा।

• वैश्विक प्रथाएँ: मृत्युदंड बरकरार रखने वाले देशों में अलग-अलग विधियों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें फाँसी, घातक इंजेक्शन, गोली मारना, सिर काटना और नाइट्रोजन के कारण ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु शामिल हैं। हालांकि, दो-तिहाई से अधिक देशों ने कानून या व्यवहार में मृत्युदंड समाप्त कर दिया है।

• गोली मारकर मृत्युदंड चीन, उत्तर कोरिया, सोमालिया और पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में प्रयोग किया जाता है। सऊदी अरब में तलवार से सिर काटने की विधि का प्रयोग किया जाता है। नाइट्रोजन के कारण ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु अपेक्षाकृत नई विधि है, जिसका प्रयोग अमेरिका में किया गया है।

निर्णय का महत्व

• कानूनी स्पष्टता: निर्णय यह स्पष्ट करता है कि भारत की वर्तमान संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत फाँसी मृत्युदंड लागू करने की संवैधानिक रूप से अनुमेय विधि बनी हुई है।

• साक्ष्य-आधारित पुनर्विचार: यह स्पष्ट करता है कि वर्तमान फाँसी की विधि में बदलाव के लिए ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या व्यावहारिक प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक होगा।

• भविष्य में परिवर्तन की गुंजाइश: यदि भविष्य में नए वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आते हैं, जो वर्तमान समझ को बदलते हैं, तो न्यायालय इस मुद्दे पर दोबारा विचार कर सकता है।

• नीतिगत गुंजाइश: केंद्र सरकार मृत्युदंड लागू करने की वैकल्पिक विधियों पर विचार कर सकती है, इसलिए भविष्य में इस संबंध में नए कानून या नीतिगत बदलाव की संभावना बनी हुई है।

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