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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और  रोजगार से संबंधित विषय; समावेशी विकास और इससे संबंधित विषय।

संदर्भ: सरकार ने संसद को जानकारी दी है कि भारत के 99.92% बसे हुए गाँवों में अब 5 किलोमीटर की परिधि के भीतर बैंकिंग सुविधा उपलब्ध है। इसमें बैंक शाखा, बैंकिंग प्रतिनिधि अथवा इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक शामिल हैं। यह सार्वभौमिक वित्तीय समावेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • प्राप्त कवरेज: जुलाई 2026 तक 6,01,328 बसे हुए गाँवों में से 6,00,868 गाँवों (99.92%) में 5 किलोमीटर की परिधि के भीतर बैंकिंग सुविधा उपलब्ध है।
  • बैंकिंग अवसंरचना: इस विस्तार को 1.81 लाख से अधिक बैंक शाखाओं, 17.36 लाख बैंकिंग प्रतिनिधियों (BCs) तथा 1.65 लाख इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक केंद्रों के व्यापक तंत्र से समर्थन मिला है।
  • शेष अंतर: शेष बैंकिंग-विहीन गाँव मुख्यतः दुर्गम भू-भागों में स्थित हैं, जहाँ संपर्क सुविधा, अवसंरचना, उपयुक्त परिसर की उपलब्धता तथा व्यावसायिक व्यवहार्यता जैसी बाधाओं के कारण विस्तार कठिन है।
  • क्रियान्वयन तंत्र: बैंकिंग-विहीन क्षेत्रों में बैंकिंग अवसंरचना के विस्तार का समन्वय राज्य स्तरीय बैंकर्स समितियों (SLBCs) तथा केंद्रशासित प्रदेश स्तरीय बैंकर्स समितियों (UTLBCs) के माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक, राज्य सरकारों तथा बैंकों के परामर्श से किया जाता है।

भारत में लगभग सार्वभौमिक बैंकिंग कवरेज प्राप्त करने में सहायक पहल

  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना (PMJDY): इस योजना ने औपचारिक बैंकिंग तक पहुँच का उल्लेखनीय विस्तार किया है। जुलाई 2026 तक 58.77 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें ₹3.12 लाख करोड़ से अधिक जमा राशि है।
  • बैंकिंग प्रतिनिधि (BC) मॉडल: बैंकिंग प्रतिनिधियों की तैनाती से दूरस्थ गाँवों में घर-घर बैंकिंग सेवाएँ, जैसे जमा, निकासी, धन प्रेषण तथा खाता खोलने की सुविधा उपलब्ध हुई है।
  • इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (IPPB): व्यापक डाक नेटवर्क का उपयोग करते हुए IPPB ने ग्रामीण तथा दुर्गम क्षेत्रों में बैंकिंग पहुँच को काफी मजबूत किया है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): JAM ट्रिनिटी (जन-धन–आधार–मोबाइल), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS) तथा यूपीआई ने बैंक शाखा-केंद्रित सेवा वितरण को डिजिटल वित्तीय समावेशन में परिवर्तित कर दिया है।
  • प्रौद्योगिकी-सक्षम वित्तीय समावेशन: जन समर्थ पोर्टल, किसान ऋण पोर्टल (KRP) तथा नाबार्ड के ई-केवाईसी मंच जैसी डिजिटल पहलों ने संस्थागत ऋण एवं वित्तीय सेवाओं तक पहुँच को अधिक सुगम बनाया है।

महत्व

  • लगभग सार्वभौमिक बैंकिंग पहुँच: 99.92% बसे हुए गाँवों में बैंकिंग सुविधा उपलब्ध होने से ग्रामीण भारत में औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच की भौगोलिक बाधाएँ काफी कम हुई हैं।
  • कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावी पहुँच: व्यापक बैंकिंग पहुँच जैम त्रिमूर्ति को मजबूत करती है तथा सरकारी लाभों के प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को अधिक पारदर्शी एवं कुशल बनाकर रिसाव को कम करती है।
  • वित्तीय समावेशन को गहरा करना: बैंकिंग प्रतिनिधियों, IPPB तथा AePS के विस्तार और 58.77 करोड़ जन-धन खातों ने औपचारिक बचत, धन प्रेषण तथा डिजिटल बैंकिंग सेवाओं तक पहुँच को काफी बढ़ाया है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था का औपचारिकीकरण: संस्थागत बचत, ऋण, बीमा तथा पेंशन सेवाओं तक बेहतर पहुँच से अनौपचारिक वित्तीय माध्यमों पर निर्भरता कम होती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की लचीलापन क्षमता मजबूत होती है।

चुनौतियाँ एवं चिंताएँ

  • अंतिम छोर तक पहुँच की कठिनाई: शेष बैंकिंग-विहीन गाँव मुख्यतः दूरस्थ, पर्वतीय, जनजातीय एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित हैं, जहाँ बैंकिंग अवसंरचना का विस्तार चुनौतीपूर्ण है।
    • पहुँच बनाम वास्तविक वित्तीय समावेशन: केवल बैंकिंग सुविधा का भौतिक रूप से उपलब्ध होना सक्रिय खाते के उपयोग, वित्तीय साक्षरता अथवा औपचारिक ऋण तक पहुँच सुनिश्चित नहीं करता।
    • व्यावसायिक व्यवहार्यता: कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पारंपरिक बैंक शाखाओं का विस्तार अक्सर आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं होता, जिससे बैंकिंग प्रतिनिधि मॉडल पर निर्भरता बढ़ती है।
    • वित्तीय समावेशन की गुणवत्ता: केवल मूलभूत बैंकिंग एवं DBT सेवाओं से आगे बढ़कर औपचारिक ऋण, बीमा, पेंशन तथा अन्य वित्तीय उत्पादों तक पहुँच के विस्तार पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • सार्वभौमिक कवरेज प्राप्त करना: SLBC/UTLBC आधारित योजना के माध्यम से शेष बैंकिंग-विहीन गाँवों तक बैंक शाखाओं, बैंकिंग प्रतिनिधियों, IPPB तथा डिजिटल बैंकिंग समाधानों की सहायता से बैंकिंग पहुँच का विस्तार करना।
    • बैंकिंग प्रतिनिधि तंत्र को मजबूत करना: बैंकिंग प्रतिनिधियों की सेवाओं की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए पारिश्रमिक, डिजिटल संपर्क, नकदी प्रबंधन, क्षमता निर्माण तथा शिकायत निवारण में सुधार करना।
    • पहुँच से वास्तविक समावेशन की ओर बढ़ना: केवल बैंक खाते खोलने के बजाय औपचारिक ऋण, बीमा, पेंशन तथा डिजिटल वित्तीय सेवाओं के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देना।
    • वित्तीय क्षमता एवं साइबर सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारतीय रिजर्व बैंक के वित्तीय साक्षरता केंद्रों (CFLs) तथा सामुदायिक संस्थाओं के माध्यम से वित्तीय साक्षरता का विस्तार करना। साथ ही इंडिया डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म (IDPIC), म्यूलहंटर तथा निरंतर साइबर-जागरूकता अभियानों जैसी पहलों के माध्यम से सुरक्षित डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देना।

Sources:
Business
Pib

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