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सामान्य अध्ययन-2:  न्यायपालिका की संरचना, गठन और कार्य।

संदर्भ: न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक (2026), जिसे विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की जस्टिस एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया (JALDI) पहल द्वारा जारी किया गया है, कॉलेजियम व्यवस्था के कामकाज में, विशेष रूप से न्यायिक नियुक्तियों, स्थानांतरण और मामलों के आवंटन में महत्वपूर्ण पारदर्शिता संबंधी कमियों को उजागर करता है।

न्यायिक पारदर्शिता सूचकांक के प्रमुख निष्कर्ष

  • कॉलेजियम एवं न्यायिक नियुक्तियाँ: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश करने वाले उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम के पिछले पाँच प्रस्तावों में नियुक्तियों के लिए विशिष्ट कारण नहीं दिए गए। वहीं, उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति के मामलों में कारण काफी हद तक सामान्य रहे, जिनमें ठोस औचित्य के बजाय केवल “योग्यता, सत्यनिष्ठा और दक्षता” का उल्लेख किया गया।
  • न्यायिक स्थानांतरण: उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण के संबंध में कोई स्थानांतरण नीति प्रकाशित नहीं करता और हाल के स्थानांतरण की सिफारिश करने वाले कॉलेजियम प्रस्तावों में भी कारणों का खुलासा नहीं किया गया है।
  • मामलों का आवंटन: कोई भी न्यायालय विभिन्न पीठों को मामलों के आवंटन को नियंत्रित करने वाले मानदंड प्रकाशित नहीं करता। इसके परिणामस्वरूप पीठों के गठन, मामलों के आवंटन, न्यायिक अलगाव और अनुशासनात्मक कार्यवाही में पारदर्शिता का अभाव बना हुआ है।
  • सूचना का अधिकार (RTI) एवं वित्तीय पारदर्शिता: 15 उच्च न्यायालय RTI अधिनियम की धारा 8 में निर्धारित अपवादों के अतिरिक्त अन्य अपवाद भी निर्धारित करते हैं। वहीं, 8 उच्च न्यायालयों ने अपने बजट प्रकाशित नहीं किए हैं और कोई भी उच्च न्यायालय नियमित रूप से लेखा-परीक्षा रिपोर्ट प्रकाशित नहीं करता।
  • सीधा प्रसारण: 25 में से केवल 13 उच्च न्यायालयों ने कार्यवाही के सीधे प्रसारण को अपनाया है। आकलन किए गए दिन छत्तीसगढ़, गुजरात, तेलंगाना और गौहाटी उच्च न्यायालयों ने ही 75% से अधिक कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया।

कॉलेजियम व्यवस्था के बारे में

  • कॉलेजियम व्यवस्था  वह तंत्र है जिसके माध्यम से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण किया जाता है। यह व्यवस्था तीन न्यायाधीशों के मामलों के माध्यम से विकसित हुई है, हालांकि इसका संविधान में स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
  • संरचना: उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। उच्च न्यायालय कॉलेजियम में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 124 उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। अनुच्छेद 224 अतिरिक्त न्यायाधीशों से संबंधित है। अनुच्छेद 222 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के स्थानांतरण से संबंधित है।
  • विकासक्रम: प्रथम न्यायाधीश मामला (1981) में कार्यपालिका की प्रधानता को मान्यता दी गई।  द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993) में न्यायपालिका की प्रधानता स्थापित हुई और कॉलेजियम व्यवस्था की शुरुआत हुई। तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): कॉलेजियम का विस्तार किया गया तथा नियुक्ति एवं परामर्श की प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया गया है।
  • राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC): संसद ने कॉलेजियम व्यवस्था को बदलने के लिए 99वाँ संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 पारित किया था, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने 2015 में इसे निरस्त कर दिया।

कॉलेजियम व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर चिंताएँ

  • कारणों का अभाव: हालिया कॉलेजियम प्रस्तावों में नियुक्तियों और स्थानांतरण के लिए कोई कारण नहीं दिया गया है, जबकि पहले के प्रस्तावों में, भले ही कारण संक्षिप्त और औपचारिक होते थे, फिर भी कुछ औचित्य दर्ज किया जाता था।
  • संहिताबद्ध चयन मानदंड का अभाव: चयन के मानदंड किसी भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेज में मौजूद नहीं हैं, जिससे नियुक्तियों को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
  • गोपनीय निर्णय-निर्माण: नियुक्तियों, पदोन्नतियों और स्थानांतरण से संबंधित विचार-विमर्श गोपनीय रहता है, जबकि उम्मीदवारों को अस्वीकार करने या उनके मामलों को लंबित रखने के कारणों का बहुत कम प्रकटीकरण किया जाता है।
  • सार्वजनिक जवाबदेही: नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि किसे नियुक्त किया जा रहा है, उम्मीदवारों का चयन क्यों किया गया है तथा नियुक्त व्यक्तियों का न्यायिक कार्य और उपलब्धियाँ क्या हैं।
  • न्यायिक स्वतंत्रता: पारदर्शिता न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करती है और खुली न्याय व्यवस्था न्यायपालिका में जनता के विश्वास को बढ़ाती है, जैसा कि स्वप्निल त्रिपाठी मामला (2018) और CPIO, उच्चतम न्यायालय बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल मामला (2020) में मान्यता दी गई है।

आगे की राह

  • कॉलेजियम सुधार: नियुक्तियों और स्थानांतरण के लिए विशिष्ट एवं ठोस कारणों को दर्ज किया जाए, उच्चतम न्यायालय के 2017 के पारदर्शिता संबंधी प्रस्ताव को निरंतर प्रभावी रूप से लागू किया जाए तथा वस्तुनिष्ठ चयन मानदंड प्रकाशित किए जाएँ।
  • मामलों का आवंटन एवं न्यायिक स्थानांतरण: रोस्टर आवंटन, पीठों के गठन, मामलों के आवंटन और न्यायिक स्थानांतरण को नियंत्रित करने वाली औपचारिक नीतियाँ प्रकाशित की जाएँ तथा स्थापित मानदंडों से अलग हटने के कारणों का भी खुलासा किया जाए।
  • सूचना का अधिकार एवं वित्तीय पारदर्शिता: सूचना का अधिकार से संबंधित अपवादों को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अनुमत प्रावधानों तक सीमित किया जाए तथा बजट, व्यय विवरण और लेखा-परीक्षा रिपोर्ट नियमित रूप से प्रकाशित की जाएँ।
  • सीधा प्रसारण एवं न्यायिक जवाबदेही: किन कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण किया जाना है, इसे स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाए; वाद सूची पहले से प्रकाशित की जाए; पारदर्शी शिकायत तंत्र स्थापित किया जाए; न्यायिक आचार संहिता प्रकाशित की जाए तथा न्यायाधीशों द्वारा संपत्ति का खुलासा करने को प्रोत्साहित किया जाए।
  • प्रशासनिक सुधार: न्यायाधीशों के रिक्त पदों, कर्मचारियों की संख्या, भर्ती, चयन में प्राप्त अंकों और स्थानांतरण नीतियों से संबंधित अद्यतन जानकारी प्रकाशित की जाए; कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) संबंधी नीति तैयार की जाए तथा अनुसंधान के लिए अनामित डिजिटल याचिकाएँ एवं लिखित प्रस्तुतियाँ उपलब्ध कराई जाएं।
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