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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।  

संदर्भ: रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने भारतीय सशस्त्र बलों की युद्ध तत्परता और परिचालन क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए लगभग ₹52,000 करोड़ के पूंजीगत अधिग्रहण प्रस्तावों को ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (AoN) प्रदान की है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • ये अधिग्रहण भारतीय थल सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के लिए उन्नत रक्षा प्रणालियों की एक विस्तृत श्रृंखला को कवर करते हैं, जिसमें स्वदेशी और अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों पर विशेष बल दिया गया है।
  •  अनुमोदित प्रणालियों में उन्नत वायु रक्षा, ड्रोन-रोधी, टैंक-रोधी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, मानव रहित, निगरानी और खुफिया प्लेटफॉर्म शामिल हैं, जिनका उद्देश्य उभरते हवाई, मशीनीकृत और समुद्री खतरों का सामना करना है।
  • ‘आवश्यकता की स्वीकृति’ (AoN) भारत की पूंजीगत अधिग्रहण प्रक्रिया का पहला चरण है, जो निविदा, तकनीकी मूल्यांकन, अनुबंध वार्ता और अंतिम अनुमोदन के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले सैद्धांतिक प्रशासनिक मंजूरी प्रदान करता है।

स्वीकृत प्रमुख रक्षा प्रणालियों के बारे में

भारतीय थल सेना के लिए:

  • आकाश तरंग (एंटी-यूएवी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम): यह इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों का उपयोग करके शत्रुतापूर्ण मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) का पता लगाने, उन्हें ट्रैक करने और निष्क्रिय करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
    • यह इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को सुदृढ़ करके सेना की टुकड़ियों को प्रभावी ड्रोन-रोधी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM): यह स्वदेशी तीसरी पीढ़ी की ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है।
    • यह मशीनीकृत और बख्तरबंद खतरों का मुकाबला करने के लिए पैदल सेना की क्षमता को बढ़ाती है।
  • मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (MRSAM) हथियार प्रणाली: यह विमान, हेलीकॉप्टर, क्रूज मिसाइल और यूएवी सहित स्टैंड-ऑफ हवाई खतरों के खिलाफ मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रदान करती है।
    • यह भारत के स्तरित वायु रक्षा ढांचे को मजबूत करती है।
  • वेरी शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (V-SHORADS): यह मल्टी-स्पेक्ट्रल सेंसिंग तकनीक से सुसज्जित है।
    • यह प्रतिकूल उपायों के खिलाफ लचीलेपन में सुधार करता है और कम दूरी की वायु रक्षा क्षमता को बढ़ाता है।
  • टैंकों के लिए सक्रिय सुरक्षा प्रणाली (APS): यह आने वाली एंटी-टैंक मिसाइलों और प्रोजेक्टाइल्स (प्रक्षेप्य) का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय करती है।
    • यह टैंकों की उत्तरजीविता और युद्धक्षेत्र सुरक्षा में सुधार करती है।
  • जेट-आधारित कामिकेज़ ड्रोन सिस्टम: यह सटीक प्रहार करने में सक्षम लोइटरिंग म्यूनिशन (भटकने वाला गोला-बारूद) है।
    • यह अधिक घातकता, उत्तरजीविता और लागत-प्रभावशीलता के साथ इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता को बढ़ाता है।

भारतीय नौसेना के लिए

  • मल्टी-इन्फ्लुएंस ग्राउंड माइन (Multi-Influence Ground Mine – MIGM): यह एक स्मार्ट नौसैनिक बारूद है, जो चुंबकीय, ध्वनिक और दबाव संकेतों के माध्यम से पोतों का पता लगाता है।
    • यह शत्रु की गतिशीलता की स्वतंत्रता को सीमित करके समुद्री निषेध (Sea Denial) क्षमता को सुदृढ़ करता है।
  • नौसैनिक पोत-आधारित मानवरहित हवाई प्रणाली (Naval Shipborne Unmanned Aerial System – NSUAS): यह उन्नत सेंसर से लैस एक पोत से प्रक्षेपित होने वाला मानवरहित हवाई वाहन (UAV) है।
    • यह समुद्री निगरानी, टोही और सामरिक जागरूकता में सुधार करता है।
  • विद्युत प्रणोदन प्रणालियों के लिए भूमि-आधारित परीक्षण सुविधा (Land-Based Testing Facility – LBTF): यह भविष्य के नौसैनिक मंचों के लिए मोटरों और विद्युत प्रणोदन प्रणालियों के परीक्षण हेतु एक समर्पित सुविधा है।
    • यह अधिक शांत और कुशल प्रणोदन तकनीकों के विकास में सहायक है।

भारतीय वायुसेना के लिए

  • फिक्स्ड-विंग उच्च तुंगता छद्म उपग्रह (Fixed-Wing High Altitude Pseudo Satellite – FW-HAPS): यह समताप मंडल में संचालित होने वाला एक दीर्घ-सहनशीलता वाला फिक्स्ड-विंग मंच है।
    • यह निरंतर आसूचना, निगरानी और टोही (ISR), दूरसंचार और सुदूर संवेदन क्षमताएं प्रदान करता है।
    • यह कम लागत पर लंबी अवधि की निगरानी प्रदान करके पारंपरिक UAV और उपग्रहों के बीच की क्षमता संबंधी रिक्तता को भरता है।

इन स्वीकृतियों का महत्व:

  • यह थल सेना, नौसेना और वायु सेना की युद्ध तत्परता और परिचालन क्षमताओं को सुदृढ़ करता है।
  • यह ड्रोन, लॉइटरिंग म्यूनिशन्स, सटीक-निर्देशित हथियारों और मशीनीकृत युद्ध जैसे उभरते खतरों का मुकाबला करने की भारत की क्षमता को बढ़ाता है।
  • यह उन्नत एंटी-ड्रोन और मिसाइल रक्षा प्रणालियों के समावेशन के माध्यम से भारत के बहुस्तरीय वायु रक्षा नेटवर्क को और मजबूत करता है।
  • यह आधुनिक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के लिए निरंतर आसूचना, निगरानी, टोही और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं में सुधार करता है।
  • यह उन्नत स्वदेशी और अगली पीढ़ी की रक्षा प्रौद्योगिकियों के समावेशन के माध्यम से सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का समर्थन करता है।
  • यह स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहित करके और आयात पर निर्भरता को कम करके ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है।
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