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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: वर्ष 2016 में अधिनियमित ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता’ (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) के 10 वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह एक परिवर्तनकारी सुधार के रूप में उभरी है, जिसने भारत के दिवाला समाधान ढांचे, ऋण अनुशासन और वित्तीय इकोसिस्टम को सुदृढ़ किया।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC)
- दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 भारत का एक व्यापक दिवालियापन कानून है जो कंपनियों, साझेदारी फर्मों और व्यक्तियों के दिवाला समाधान के लिए एक एकीकृत और समयबद्ध ढांचा प्रदान करता है।
- IBC के अधिनियमन से पहले, दिवाला और परिसमापन की कार्यवाहियाँ कंपनी अधिनियम, 1956/2013, रुग्ण औद्योगिक कंपनी अधिनियम (SICA), सरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act) और ऋण वसूली अधिकरणों (DRTs) जैसे कई कानूनों और तंत्रों के माध्यम से संचालित होती थीं।
- ये फ्रेमवर्क अत्यधिक देरी, खंडित क्षेत्राधिकार और निम्न वसूली दरों से ग्रस्त थे।
- IBC ने भारत को एक खंडित, ऋणी-नियंत्रित व्यवस्था से एक एकीकृत, लेनदार-संचालित और समयबद्ध समाधान प्रणाली में स्थानांतरित करके शोधन अक्षमता ढांचे को समेकित और आधुनिक बनाया है।
- IBC के उद्देश्य
- तनावग्रस्त संस्थाओं की संपत्तियों के मूल्य का अधिकतमीकरण।
- उद्यमशीलता को बढ़ावा देना और ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- समयबद्ध दिवाला समाधान।
- सभी हितधारकों के हितों में संतुलन स्थापित करना।
- व्यवहार्य व्यवसायों का पुनरुद्धार और अव्यवहार्य फर्मों का परिसमापन।
- IBC की मुख्य विशेषताएँ
- कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) की शुरुआत की।
- व्यवस्था को “देनदार-के-कब्जे” (debtor-in-possession) से “लेनदार-के-नियंत्रण” (creditor-in-control) में स्थानांतरित किया।
- दिवाला समाधान के लिए अधिकतम 330 दिनों की समय-सीमा निर्धारित करता है।
- दिवाला की कार्यवाहियों के दौरान स्थगन प्रदान करता है।
- केवल परिसमापन के बजाय समाधान और पुनरुद्धार को प्रोत्साहित करता है।
- समाधान विफल होने की स्थिति में परिसमापन को सक्षम बनाता है।
- संस्थागत ढांचा / IBC के चार स्तंभ:
- भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI): दिवाला प्रक्रियाओं और सेवा प्रदाताओं की निगरानी करने वाला नियामक।
- दिवाला पेशेवर (IPs): शोधन अक्षमता और समाधान कार्यवाहियों का प्रबंधन करने वाले लाइसेंस प्राप्त पेशेवर।
- सूचना उपयोगिताएँ (IUs): वित्तीय जानकारी और चूक (डिफ़ॉल्ट) को संग्रहीत एवं प्रमाणित करने वाले इलेक्ट्रॉनिक संग्रह।
- न्यायनिर्णयन प्राधिकारी: शोधन अक्षमता के मामलों का न्यायनिर्णयन करने वाले राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT)।
- IBC ढांचे के तहत, कंपनियां अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), कॉर्पोरेट दिवाला समाधान और परिसमापन कार्यवाहियों के लिए न्यायनिर्णयन प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है।
- हालिया सुधार: दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2026 का उद्देश्य समय-सीमा में सुधार करना, लेनदारों के अधिकारों को सुदृढ़ करना, निश्चितता बढ़ाना और व्यवसायों के तेजी से पुनरुद्धार में सहायता करना है, जिससे भारत के निवेश परिवेश और आर्थिक लचीलेपन को मजबूती मिलेगी।
IBC की प्रमुख उपलब्धियाँ
- वसूली तंत्र का सुदृढ़ीकरण: मार्च 2026 तक, 1,419 मामलों में समाधान योजनाओं को मंजूरी मिली, जिसके माध्यम से लेनदारों ने ₹4 लाख करोड़ से अधिक की वसूली की।
- इसके तहत वसूली, उचित मूल्य का लगभग 95% और परिसमापन मूल्य का लगभग 167% रही।
- तनावग्रस्त कंपनियों का पुनरुद्धार: बंद हो चुके 7,102 मामलों में से लगभग 58% (4,099 कंपनियां) को IBC प्रक्रिया के तहत सफलतापूर्वक संकट से उबारा गया।
- समाधान की गई कंपनियों में से लगभग 42% कंपनियां पहले निष्क्रिय थीं या औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (BIFR) के समक्ष विचाराधीन थीं।
- ऋण अनुशासन में सुधार: प्रवेश-पूर्व चरण में ही ₹14 लाख करोड़ से अधिक की राशि से जुड़े 30,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया गया। इस संहिता ने एक मजबूत निवारक प्रभाव उत्पन्न किया और उधारकर्ताओं के बीच पुनर्भुगतान की संस्कृति में सुधार किया।
- गैर-निष्पादित आस्तियों (NPAs) में कमी: बैंकों का सकल गैर-निष्पादित आस्ति अनुपात वर्ष 2017 के लगभग 11.8% से घटकर सितंबर 2025 तक लगभग 2.1% रह गया। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी तनावग्रस्त आस्तियों की वसूली के लिए IBC को सबसे प्रभावी तंत्र के रूप में चिह्नित किया है।
- बेहतर वसूली दरें और तीव्रतर समाधान: वसूली दरें IBC-पूर्व अवधि के लगभग 15–20% से सुधरकर IBC की शुरुआत के बाद लगभग 30–36% हो गईं। समाधान की समय-सीमा भी पहले के 6–8 वर्षों से घटकर इस संहिता के तहत लगभग 2 वर्ष रह गई।
- बैंकिंग क्षेत्र के पुनरुद्धार में योगदान: अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने विभिन्न वसूली माध्यमों से लगभग ₹1.04 लाख करोड़ की वसूली की, जिसमें से लगभग ₹0.54 लाख करोड़ (52.4%) IBC तंत्र के माध्यम से वसूल किए गए। यह बैंकिंग क्षेत्र के पुनरुद्धार में इस संहिता के बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है।
- वैश्विक मान्यता: एसएंडपी (S&P) ग्लोबल रेटिंग्स ने भारत के शोधन अक्षमता ढांचे को ‘ग्रुप सी’ से अपग्रेड करके ‘ग्रुप बी’ कर दिया है। यह अपग्रेड IBC ढांचे के तहत समाधान दक्षता और लेनदार वसूली में हुए सुधारों को मान्यता देता है।
IBC का महत्व
- संस्थागत रूपांतरण: IBC ने भारत के दिवाला फ्रेमवर्क को एक खंडित और अत्यधिक देरी वाले तंत्र से एक सुव्यवस्थित, बाजार-उन्मुख और समयबद्ध तंत्र में रूपांतरित कर दिया है।
- देनदार-लेनदार गतिशीलता में बदलाव: इस संहिता ने मोलतोल की शक्ति को चूककर्ता प्रवर्तकों से लेनदारों के पक्ष में स्थानांतरित कर दिया है, जिससे जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन में सुधार हुआ है।
- व्यापार सुगमता: एक पूर्वानुमेय दिवाला फ्रेमवर्क ने निवेशकों के विश्वास में वृद्धि की है और भारत के कारोबारी परिवेश को सुदृढ़ किया है।
- उद्यम मूल्य का संरक्षण: यह संहिता केवल परिसमापन के बजाय समाधान और पुनरुद्धार पर ध्यान केंद्रित करती है, जिससे रोजगार, उत्पादक आस्तियों और आर्थिक मूल्य का संरक्षण होता है।
- वित्तीय स्थिरता: तनावग्रस्त आस्तियों के समाधान में सुधार करके और गैर-निष्पादित आस्तियों (NPAs) को कम करके, IBC ने बैंकिंग प्रणाली को सुदृढ़ किया है और ऋण की उपलब्धता को बढ़ाया है।
- आर्थिक विकास में सहायता: उद्यमशीलता को बनाए रखने, कुशल पूंजी आवंटन को बढ़ावा देने और ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न को प्राप्त करने के लिए एक मजबूत दिवाला फ्रेमवर्क अत्यंत महत्वपूर्ण है।
