संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन -2: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएं और मंच-उनकी संरचना, अधिदेश ।

सामान्य अध्ययन -3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी-विकास एवं अनुप्रयोग और रोजमर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।

संदर्भ: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विशेष रूप से नवजात और शिशुओं के लिए तैयार किए गए पहले मलेरिया उपचार को प्री-क्वालिफाइड किया है, जो वैश्विक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • मलेरिया वैश्विक स्तर पर बीमारी और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है, विशेष रूप से उप-सहारा अफ्रीका में बच्चों के बीच। वर्ष 2022 में, मलेरिया के 24.9 करोड़ मामले और 6,08,000 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से लगभग 80% मौतें पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की हुई थीं।
  • 5 किग्रा से कम वजन वाले शिशुओं के लिए आयु-उपयुक्त औषधीय फॉर्मूलेशन उपलब्ध नहीं थे। इसके कारण बड़े बच्चों के लिए बनी दवाओं की खुराक को समायोजित करके शिशुओं को दिया जाता था, जिससे सुरक्षा और प्रभावकारिता को लेकर चिंताएं बनी रहती थीं।
  • WHO ने अब आर्टेमेथर-ल्यूमफैंट्रिन (artemether-lumefantrine) के एक नए शिशु-विशिष्ट फॉर्मूलेशन को प्री-क्वालिफाइड किया है। यह सुरक्षित और प्रभावी उपचार सुनिश्चित करेगा और इसके वैश्विक स्तर पर खरीद एवं वितरण को सुगम बनाएगा।
  • इसके अतिरिक्त, WHO ने तीन नए रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDTs) को भी प्री-क्वालिफाइड किया है। ये टेस्ट HRP2/HRP3 जीन विलोपन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, जिनकी वजह से पहले मलेरिया के गलत-नकारात्मक परिणाम आते थे।
  • लक्षित उपचार और बेहतर निदान में यह संयुक्त प्रगति सबसे संवेदनशील आबादी (शिशुओं) में रोग का अधिक सटीक पता लगाने और सुरक्षित प्रबंधन को सक्षम बनाकर वैश्विक मलेरिया नियंत्रण प्रयासों को बढ़ावा देती है।

नए उपचार के बारे में

  • हाल ही में प्री-क्वालिफाइड की गई यह दवा आर्टेमेथर-ल्यूमफैंट्रिन (Coartem® Baby) का शिशुओं के अनुकूल एक विशेष फॉर्मूलेशन है। इसे नोवार्टिस द्वारा ‘मेडिसिन्स फॉर मलेरिया वेंचर’ के सहयोग से विकसित किया गया है।
  • यह विशेष रूप से 2 से 5 किग्रा वजन वाले नवजात शिशुओं और शिशुओं के लिए डिज़ाइन किया गया पहला मलेरिया-रोधी उपचार है।
  • यह फॉर्मूलेशन सटीक खुराक (accurate dosing) और बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित करता है। यह वयस्कों या बड़े बच्चों की दवाओं के ‘ऑफ-लेबल’ (अनौपचारिक रूप से खुराक घटाकर) उपयोग से जुड़े जोखिमों का समाधान करता है।
  • इसे आसानी से देने के लिए डिज़ाइन किया गया है (जैसे कि माँ के दूध या अन्य तरल पदार्थों में घुलनशील), जिससे उपचार के अनुपालन में सुधार और उपयोग में आसानी सुनिश्चित होती है।
  • यह दवा WHO के कड़े मानकों को पूरा करती है और इसके स्थानिक क्षेत्रों में काफी हद तक गैर-लाभकारी आधार पर आपूर्ति किए जाने की संभावना है, जिससे इसकी वहनीयता बढ़ेगी।

महत्व

  • उपचार के महत्वपूर्ण अंतराल को पाटना: शिशुओं के लिए विशिष्ट मलेरिया-रोधी फॉर्मूलेशन की उपलब्धता वयस्कों की दवाओं की खुराक को समायोजित करने की आवश्यकता को समाप्त करती है। इससे विषाक्तता और अप्रभावी उपचार के जोखिम कम हो जाते हैं।
  • शिशु मृत्यु दर में कमी: सबसे संवेदनशील समूहों में से एक को लक्षित करके, यह हस्तक्षेप विशेष रूप से उच्च-बोझ वाले क्षेत्रों में शिशुओं के बीच मलेरिया से होने वाली मौतों को महत्वपूर्ण रूप से कम करने की क्षमता रखता है।
  • वैश्विक मलेरिया नियंत्रण का सुदृढ़ीकरण: उपचार और निदान में संयुक्त प्रगति रोग के शीघ्र पता लगाने और प्रभावी मामला प्रबंधन (case management) को बढ़ाती है, जो वैश्विक मलेरिया उन्मूलन प्रयासों का समर्थन करती है।
  • स्वास्थ्य सेवा में समानता को बढ़ावा: सुरक्षित, सस्ती और उपयुक्त उपचार की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवा तक समान पहुँच में सुधार करती है, विशेष रूप से कम संसाधन वाले क्षेत्रों में।
  • उपेक्षित रोगों में नवाचार को प्रोत्साहन: यह विकास लक्षित अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (NTDs) के समाधान में सार्वजनिक-निजी भागीदारी  की सफलता को दर्शाता है।

मलेरिया के बारे में

  • मलेरिया एक जीवन-घातक बीमारी है जो प्लाज्मोडियम परजीवियों के कारण होती है। यह संक्रमित मादा एनोफिलीज (मच्छरों के काटने से मनुष्यों में फैलती है।
  • मनुष्यों में मलेरिया पैदा करने वाली प्लाज्मोडियम परजीवी की 5 प्रजातियां हैं। इनमें से दो प्रजातियां – पी. फाल्सीपेरम और पी. विवैक्स– स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा करती हैं।
  • इसके सामान्य लक्षणों में बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द और थकान शामिल हैं। यदि समय पर उपचार न किया जाए, तो यह गंभीर जटिलताओं (जैसे अंग विफलता या एनीमिया) का रूप ले सकता है।
  • यह बीमारी उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रचलित है, विशेष रूप से अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में।

भारत में मलेरिया की उपस्थिति

  • भारत ने मलेरिया नियंत्रण में महत्वपूर्ण सुधार किया है। मामले 2015 के लगभग 11.7 लाख से घटकर 2023 में 2.27 लाख और 2025 में लगभग 2 लाख रह गए हैं।
  • मलेरिया से होने वाली मौतें 2015 की 384 से घटकर 2023 में 83 हो गईं। हाल के वर्षों में यह आंकड़ा सालाना 50-80 के बीच रहा है, जो बेहतर मामला प्रबंधन का संकेत है।
  • भारत वैश्विक मलेरिया बोझ में लगभग 1-3% का योगदान देता है, लेकिन WHO दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में यह अभी भी सबसे बड़ा योगदानकर्ता बना हुआ है।
  • अब 90% से अधिक जिले कम संचरण स्तर (API < 1) की रिपोर्ट कर रहे हैं। हालांकि, जनजातीय, वन क्षेत्रों और पूर्वोत्तर राज्यों में ‘हॉटस्पॉट’ अभी भी बने हुए हैं।
  • वर्ष 2024 में, भारत WHO के ‘हाई बर्डन टू हाई इम्पैक्ट’ (HBHI) समूह से बाहर हो गया, जो मलेरिया के मामलों और मृत्यु दर में आई भारी गिरावट को दर्शाता है।
  • राष्ट्रीय रणनीतिक योजना के तहत, भारत का लक्ष्य 2027 तक मलेरिया मुक्त होना और 2030 तक इस बीमारी का पूर्ण उन्मूलन करना है।

मलेरिया के नियंत्रण और निवारण के लिए शुरू की गईं पहल

  • राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (NMCP), 1953: इसे 1953 में ‘इनडोर रेसिड्यूअल स्प्रेइंग’ (DDT छिड़काव), निगरानी और उपचार की रणनीतियों के साथ शुरू किया गया था। बाद में 1958 में इसे राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम (NMEP) में बदल दिया गया।
  • राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (NCVBDC): यह मलेरिया सहित वेक्टर जनित रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए नोडल निकाय (पूर्व में NVBDCP) के रूप में कार्य करता है। इसका मुख्य ध्यान एकीकृत वेक्टर प्रबंधन और निगरानी पर है।
  • मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा (2016–2030): यह राष्ट्रीय रोडमैप 2027 तक शून्य स्वदेशी मलेरिया मामलों और 2030 तक पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित करता है।
  • मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रणनीतिक योजना (2023–2027): यह योजना निदान और उपचार तक सार्वभौमिक पहुँच, सुदृढ़ निगरानी और मलेरिया उन्मूलन को गति देने के लिए उच्च-बोझ वाले जिलों में लक्षित हस्तक्षेपों पर केंद्रित है।
Shares: