संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन 2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।

सामान्य अध्ययन 3: आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करने वाले बाह्य राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ताओं की भूमिका।

संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने देश में पूर्ववर्ती वर्गीकरण के स्थान पर वामपंथी उग्रवाद (LWE) से प्रभावित जिलों की कुल संख्या का पुन: वर्गीकरण किया।

अन्य संबंधित जानकारी

  • इस कदम का उद्देश्य वामपंथी उग्रवाद विरोधी रणनीतियों को जमीनी वास्तविकताओं के साथ पुन: संरेखित करना है, जो ‘रेड कॉरिडोर’ (भारत में नक्सल प्रभावित जिले) के महत्वपूर्ण संकुचन को दर्शाता है।
  • इससे पहले लोकसभा में, केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि भारत व्यावहारिक रूप से ‘नक्सल-मुक्त’ हो गया है, जो आंतरिक सुरक्षा में एक बड़ी उपलब्धि का प्रतीक है।
  • संशोधित वर्गीकरण: पिछली “सर्वाधिक प्रभावित जिले” श्रेणी को एक परिष्कृत त्रि-स्तरीय वर्गीकरण द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है:
    • LWE प्रभावित जिले: वर्तमान में, केवल बीजापुर (छत्तीसगढ़) और पश्चिमी सिंहभूम (झारखंड) को ‘LWE प्रभावित जिले’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
    • चिंताजनक जिले: छत्तीसगढ़ का कांकेर जिला।
    • लिगेसी और थ्रस्ट (L&T) जिले: इसमें 35 जिले शामिल हैं जो या तो अब महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित नहीं हैं लेकिन पुनरावृत्ति रोकने के लिए उन्हें निरंतर सहायता की आवश्यकता है या वे संभावित नक्सल विस्तार के प्रति संवेदनशील हैं।
  • रेड कॉरिडोर का तीव्र संकुचन: वामपंथी उग्रवाद का प्रसार 2005 में 200 से अधिक जिलों से घटकर 2026 में केवल 2 रह गया है। यह निरंतर सुरक्षा और विकासात्मक उपायों की प्रभावशीलता को उजागर करता है और मार्च 2026 तक LWE को समाप्त करने के भारत के लक्ष्य के अनुरूप है।
  • सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना: अद्यतन वर्गीकरण SRE योजना के तहत संसाधन आवंटन को आकार देंगे। इस योजना के तहत केंद्र सरकार सुरक्षा बलों के संचालन, अनुग्रह राशि, आत्मसमर्पण करने वाले LWE कैडरों के पुनर्वास और सामुदायिक पुलिसिंग के लिए राज्यों को प्रतिपूर्ति करती है।

भारत में वामपंथी उग्रवाद (LWE) के बारे में

  • वामपंथी उग्रवाद (LWE): इसे माओवाद/नक्सलवाद के रूप में भी जाना जाता है। यह एक सशस्त्र विद्रोह है जो माओवादी विचारधारा से प्रेरित होकर ‘दीर्घकालिक जनयुद्ध’ के माध्यम से लोकतांत्रिक शासन को उखाड़ फेंकने का प्रयास करता है।
  • उत्पत्ति: इस आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी विद्रोह से हुई थी। बाद में इसका विस्तार मध्य और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में हुआ, जिससे तथाकथित “रेड कॉरिडोर” का निर्माण हुआ।
  • हालाँकि अब इसका प्रभाव क्षेत्र काफी कम हो गया है, लेकिन यह अभी भी कई राज्यों के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में सक्रिय है।
  • भाकपा (माओवादी) का विकास: वर्ष 2004 में, पीपुल्स वार ग्रुप (PWG), माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) और भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के गुटों जैसे प्रमुख विद्रोही समूहों का विलय हुआ। इसके परिणामस्वरूप भाकपा (माओवादी) का गठन हुआ, जो वर्तमान में विद्रोही गतिविधियों को अंजाम देने वाला प्राथमिक वामपंथी उग्रवादी संगठन है।
  • उद्देश्य: इस आंदोलन का लक्ष्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से राजकीय सत्ता पर कब्जा करना है। यह जनजातीय असंतोष, भूमि बेदखली, असमानता और शासन की अप्रभाविता का लाभ उठाता है।
  • यह गुरिल्ला युद्ध की रणनीति का पालन करता है, जिसके तहत सुदूर क्षेत्रों में नियंत्रण स्थापित किया जाता है और धीरे-धीरे प्रभाव का विस्तार किया जाता है।
  • शहरी-ग्रामीण जुड़ाव: वामपंथी उग्रवाद एक शहरी-ग्रामीण नेटवर्क के माध्यम से संचालित होता है। इसमें शहरी मोर्चे वैचारिक समर्थन, वित्त पोषण और भर्ती की सुविधा प्रदान करते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र परिचालन आधार और प्रभाव क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं।

वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए सरकार की पहल

  • सुरक्षा संबंधी व्यय (SRE) योजना: ‘पुलिस बलों के आधुनिकीकरण’ की एक उप-योजना के रूप में कार्यान्वित, यह केंद्र सरकार को वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित और निगरानी वाले जिलों में सुरक्षा संबंधी लागतों के लिए राज्यों को प्रतिपूर्ति (Reimburse) करने में सक्षम बनाती है।
  • समाधान‘ (SAMADHAN) रणनीति: यह एक व्यापक रूपरेखा है जो S-स्मार्ट नेतृत्व, A-आक्रामक रणनीति, M-अभिप्रेरणा और प्रशिक्षण, A-कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी, D-डैशबोर्ड आधारित निगरानी, H-प्रौद्योगिकी का दोहन, A-क्षेत्र-विशिष्ट कार्य योजना और N-वित्त पोषण को रोकने  पर आधारित है, जो LWE के विरुद्ध एक समन्वित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करती है।
  • आत्मसमर्पण और पुनर्वास योजना: वित्तीय प्रोत्साहन और आजीविका सहायता प्रदान करके विद्रोही रैंकों को कमजोर करने के लिए तैयार की गई है। इसके तहत शीर्ष कैडरों के लिए ₹5 लाख और अन्य के लिए ₹2.5 लाख की सहायता दी जाती है, साथ ही कौशल प्रशिक्षण के लिए 36 महीनों तक ₹10,000 मासिक वजीफा दिया जाता है।
  • राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना (2015): यह सुरक्षा अभियानों, विकास पहलों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं हकदारी के संरक्षण के संयोजन के साथ एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाती है।
  • शिक्षा और कौशल विकास पहल: मूल कारणों को दूर करने के लिए, सरकार ने रोजगार के अवसरों को बढ़ाने हेतु LWE प्रभावित जिलों में 48 आईटीआई (ITIs) और 61 कौशल विकास केंद्रों को मंजूरी दी है।
  • ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट (2025): अप्रैल 2025 में छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर कार्रेगुट्टालू पहाड़ियों में माओवादी गढ़ों को लक्षित करने वाला 21-दिवसीय बड़े पैमाने का विद्रोह-रोधी अभियान शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य विद्रोही नेटवर्क को ध्वस्त करना था।

आगे की राह

  • सुरक्षा लाभों का समेकन: अवशिष्ट हॉटस्पॉट (बचे हुए संवेदनशील क्षेत्रों) में उग्रवाद के किसी भी पुनरुत्थान को रोकने के लिए खुफिया जानकारी पर आधारित अभियानों को जारी रखना और केंद्रीय तथा राज्य बलों के बीच समन्वय को मजबूत करना।
  • विकासात्मक हस्तक्षेपों को गहरा करना: गरीबी, अपवर्जन और अल्पविकास जैसे मूल कारणों को दूर करने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा में तेजी लाना।
  • अंतिम छोर तक पहुँच को मजबूत करना: दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशासनिक उपस्थिति और सेवा वितरण में सुधार करना, कल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना और स्थानीय समुदायों के बीच विश्वास का निर्माण करना।
  • जनजातीय अधिकारों और समावेशन पर ध्यान: वन अधिकार अधिनियम (FRA) जैसे कानूनों का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना और जनजातीय आबादी के अधिकारों एवं आजीविका की रक्षा करते हुए सहभागी विकास को बढ़ावा देना।
  • पुनर्वास और पुनर्संयोजन: पूर्व कैडरों का मुख्यधारा के समाज में दीर्घकालिक पुनर्संयोजन सुनिश्चित करने के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियों को और अधिक मजबूत करना।
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