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संदर्भ: कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा में पेश किए जाने के बाद विस्तृत विश्लेषण और सिफारिशों के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया है।
विधेयक के बारे में
• इस संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल होंगे, जिनमें लोकसभा के 21 सदस्य (अध्यक्ष द्वारा नामित) और राज्यसभा के 10 सदस्य (सभापति द्वारा नियुक्त) होंगे।
• यह विधेयक सीमित देयता भागीदारी (LLP) अधिनियम, 2008 और कंपनी अधिनियम, 2013 दोनों को आधुनिक व्यावसायिक प्रथाओं के अनुरूप बनाने के लिए उनमें संशोधन करेगा।
• विधेयक के उद्देश्य:
- कंपनियों के लिए विभिन्न विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाकर व्यापार सुगमता को बढ़ावा देना।
- व्यवसायों पर अनुपालन बोझ को कम करने के लिए आपराधिक दंड के स्थान पर मौद्रिक जुर्माने का प्रावधान करके लघु अपराधों का गैर-अपराधीकरण करना।
विधेयक के मुख्य प्रावधान
• कॉर्पोरेट डिफ़ॉल्ट का गैर-अपराधीकरण: यह विधेयक मामूली प्रक्रियागत डिफ़ॉल्ट को आपराधिक अपराधों से दीवानी उल्लंघनों के रूप में पुनर्वर्गीकृत करता है। इसके तहत, इन उल्लंघनों को एक इन-हाउस एडजुडिकेशन मैकेनिज्म (IAM) के माध्यम से मौद्रिक दंड के अधीन लाना गया है।
• कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) सुधार
- यह अनिवार्य कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) अनुपालन के लिए शुद्ध लाभ की सीमा को ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करता है, जिससे CSR दायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक कंपनियों का दायरा सीमित हो जाएगा।
- यह छोटी कंपनियों को CSR प्रावधानों से छूट, लेखा परीक्षक की नियुक्ति से संबंधित आवश्यकताओं और अतिरिक्त शुल्क में कटौती प्रदान करके राहत देने का प्रस्ताव करता है।
- यह खर्च न की गई CSR राशि को अनुसूचित बैंक के ‘अव्ययित कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व खाते’ में स्थानांतरित करने की समय-सीमा को 30 से बढ़ाकर 90 दिन करने का भी प्रस्ताव करता है।
• डिजिटल शासन:
- यह इलेक्ट्रॉनिक संचार, हाइब्रिड बैठकों और ऑनलाइन प्रकटीकर्ण को कॉर्पोरेट अनुपालन के वैध तरीकों के रूप में कानूनी मान्यता प्रदान करता है।
- यह कंपनियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वार्षिक आम बैठकें (AGMs) आयोजित करने की अनुमति भी देता है, बशर्ते कि प्रत्येक तीन वर्षों में कम से कम एक भौतिक वार्षिक आम बैठक आयोजित की जाए।
• ट्रस्ट रूपांतरण का प्रावधान: यह विधेयक विशिष्ट विनियमित ट्रस्टों और फंड संरचनाओं (जैसे कि SEBI के पास पंजीकृत या IFSC में संचालित) को LLP या इसी तरह के ‘बॉडी-कॉर्पोरेट’ रूपों में परिवर्तित होने की अनुमति देता है। इससे निवेश संस्थाओं के लिए संरचनात्मक लचीलेपन और विनियामक स्पष्टता में सुधार होगा।
• IFSC में परिचालन लचीलापन: अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्रों (IFSCs) में संचालित कंपनियों और LLP को निर्दिष्ट विदेशी मुद्राओं में लेनदेन करने और अपने खातों के रखरखाव की अनुमति दी गई है, जिससे परिचालन में अधिक सुगमता सुनिश्चित होगी।
• शेयर बायबैक नीति: निर्दिष्ट कंपनियाँ एक वित्तीय वर्ष में दो बार शेयरों की पुनर्खरीद कर सकती हैं, बशर्ते उनके बीच न्यूनतम छह महीने का अंतर हो। पहले यह सीमा प्रति वर्ष केवल एक बार थी।
विधेयक का महत्व
• कॉर्पोरेट विनियमन में संरचनात्मक सुधार: कंपनी अधिनियम, 2013 और सीमित देयता भागीदारी (LLP) अधिनियम, 2008 में संशोधन करके, यह विधेयक उभरती व्यावसायिक प्रथाओं और वैश्विक मानकों के अनुरूप कानूनी ढांचे को आधुनिक बनाता है।
• व्यापार सुगमता को बढ़ावा: सरलीकृत प्रक्रियाएं और लचीले मानदंड लागत को कम करते हैं, मुकदमेबाजी को सुगम बनाते हैं और निवेशकों के विश्वास को बढ़ाते हैं।
• संवर्धित वित्तीय लचीलापन: IFSC संचालन, ट्रस्ट-टू-LLP रूपांतरण और शेयरों की पुनर्खरीद (share buybacks) से संबंधित प्रावधान कंपनियों को अधिक वित्तीय चपलता और संरचनात्मक लचीलेपन के साथ काम करने में सक्षम बनाते हैं।
• स्टार्टअप और MSMEs को सहायता: अनुपालन और दंड में ढील देकर, यह विधेयक स्टार्टअप और छोटे उद्यमों के लिए अधिक अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र बनाता है, जिससे नवाचार को बढ़ावा मिलता है।
विधेयक की चुनौतियाँ
• विधि-निर्माण में कार्यपालिका का प्रभुत्व: यह विधेयक कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय को दंड और ऑडिट छूट पर प्रमुख नियम बनाने का अधिकार सौंपता है, जिससे उन क्षेत्रों में कार्यपालिका के विवेक का विस्तार होता है जो पारंपरिक रूप से विधान द्वारा शासित होते हैं।
• CSR दायित्वों में कमी: शुद्ध लाभ की सीमा बढ़ाकर यह विधेयक CSR के दायरे को कम कर सकता है, जिससे कई लाभदायक कंपन्याँ अनिवार्य सामाजिक उत्तरदायित्व दायित्वों से बाहर हो सकती हैं।
• इन-हाउस एडजुडिकेशन मैकेनिज्म (IAM) पर चिंताएँ: न्यायनिर्णयन को न्यायालयों से आंतरिक तंत्र में स्थानांतरित करने से न्यायिक जांच सीमित हो सकती है और असंगत या मनमाना दंड दिया जा सकता है।
• पारदर्शिता संबंधी चिंताएँ: ऑडिट मानदंडों में ढील और स्व-घोषणाओं पर निर्भरता से शेल कंपनियों की संभावना बढ़ सकती है और वित्तीय पारदर्शिता कमजोर हो सकती है।
आगे की राह
• स्मार्ट विनियमन: केवल आपराधिक दायित्व को हटाने के बजाय, एक क्रमबद्ध अनुपालन ढांचा अपनाया जाना चाहिए, जहाँ दंड की मात्रा डिफ़ॉल्ट के इरादे, आवृत्ति और भौतिक प्रभाव के आधार पर बढ़ती जाए।
• नियम-आधारित व्यवस्था: कार्यपालिका को सौंपी गई शक्तियों को वैधानिक सिद्धांतों, जैसे कि आनुपातिकता, पारदर्शिता और तर्कसंगत निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि तदर्थ नियम-निर्माण को रोका जा सके और निवेशकों के लिए पूर्वानुमान सुनिश्चित हो सके।
• CSR को विकास पूंजी के रूप में पुनर्कल्पित करना: सीमाओं के माध्यम से CSR को सीमित करने के बजाय, इसे राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं (SDGs, जलवायु लक्ष्य) के साथ एकीकृत करने से केवल व्यय के अनुपालन के बजाय परिणाम-आधारित रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिल सकता है।
• वि-अपराधीकृत व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना: सुदृढ़ निगरानी और उचित दंड यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वि-अपराधीकरण से अनुपालन या जवाबदेही कम न हो।
SOURCES
Indian Express
The Hindu
