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सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू।
संदर्भ: हाल ही में, महाराष्ट्र विधायिका के दोनों सदनों ने “धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा” करने और गैर-कानूनी धार्मिक धर्मांतरण को प्रतिबंधित करने के लिए महाराष्ट्र धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026 पारित किया है।
अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
- यह कानून कथित “बलपूर्वक, अनैच्छिक या प्रलोभन आधारित” धर्मांतरण, विशेष रूप से अंतर-धार्मिक विवाहों से जुड़े मामलों और कथित कानून-व्यवस्था के मुद्दों की पृष्ठभूमि में तैयार किया गया है।
- विधेयक के ‘उद्देश्यों और कारणों के विवरण’ में स्पष्ट रूप से उच्चतम न्यायालय (SC) के न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया गया है कि धर्म के प्रचार के अधिकार में दूसरों को जबरन धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है।
- यह कानून अन्य राज्यों में इसी तरह के कानूनों का परीक्षण करने वाली पुलिस महानिदेशक (DGP) के नेतृत्व वाली एक समिति की सिफारिशों पर आधारित है।
- इस कानून ने धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वायत्तता और व्यक्तिगत विकल्पों के राज्य द्वारा विनियमन के इर्द-गिर्द बहस को जन्म दिया है।
विधेयक के मुख्य प्रावधान
- दायरा और परिभाषाएँ:
- जबरदस्ती, धोखाधड़ी, गलत बयानी, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन के माध्यम से धर्मांतरण निषिद्ध है।
- “गैर-कानूनी धर्मांतरण”: इसमें प्रलोभन, जबरदस्ती, छल, बल, गलत बयानी, धमकी, अनुचित प्रभाव, धोखाधड़ी के साधनों या शिक्षा के माध्यम से ‘ब्रेनवाशिंग’ (मस्तिष्क प्रक्षालन) द्वारा किया गया धर्मांतरण शामिल है।
- “प्रलोभन”: इसमें भौतिक लाभ, रोजगार, विवाह का वादा या अन्य प्रोत्साहन शामिल हैं।
- “जबरदस्ती”: इसमें शारीरिक बल, मनोवैज्ञानिक दबाव, जीवन, अंग या संपत्ति को खतरा, ईश्वरीय अप्रसन्नता का डर या सामाजिक बहिष्कार की धमकी शामिल है।
- विवाह और “गैर-कानूनी धर्मांतरण” से उत्पन्न संतान:
- केवल गैर-कानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से किए गए किसी भी विवाह को किसी भी पक्ष की याचिका पर अदालत द्वारा शून्य और अमान्य (null and void) घोषित किया जा सकता है।
- “गैर-कानूनी धर्मांतरण के कारण हुए” विवाह या संबंधों से उत्पन्न हुए बच्चे के संबंध में:
- उसे उस विवाह से पहले माँ के धर्म का माना जाएगा।
- वह BNSS, 2023 की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का हकदार होगा।
- वैध धर्मांतरण की प्रक्रिया:
- धर्मांतरण की चाह रखने वाले व्यक्ति और धर्मांतरण समारोह आयोजित करने वाली संस्था को जिला मजिस्ट्रेट/सक्षम प्राधिकारी को 60 दिन पूर्व सूचना देनी होगी।
- प्राधिकारी पुलिस जांच का आदेश दे सकता है और अधिनियम के उल्लंघन का पता चलने पर आपराधिक कार्यवाही का निर्देश दे सकता है।
- शिकायत, पुलिस शक्तियाँ और प्रमाण का भार:
- धर्मांतरित व्यक्ति, माता-पिता, भाई-बहन या रक्त, विवाह या गोद लेने से संबंधित किसी भी व्यक्ति द्वारा प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जा सकती है; पुलिस के लिए इसे पंजीकृत करना अनिवार्य है।
- प्रमाण का भार (Burden of Proof): धर्मांतरण वैध था, इसे साबित करने की जिम्मेदारी धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति और उसके मददगार (abettor) पर होगी।
- दंड और संस्थागत जुर्माना:
- सामान्य अपराध: 7 साल तक की कैद और ₹1 लाख का जुर्माना।
- विशिष्ट श्रेणी: यदि पीड़ित नाबालिग, मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति, महिला या SC/ST है, तो 7 साल की कैद और ₹5 लाख का जुर्माना।
- सामूहिक धर्मांतरण: 7 साल की कैद और ₹5 लाख का जुर्माना।
कानून के उद्देश्य
- धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए गैर-कानूनी धर्मांतरण रोकना: जबरदस्ती या धोखाधड़ी के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर अंकुश लगाना, जबकि स्वतंत्र और सूचित सहमति पर आधारित वास्तविक धर्मांतरण की रक्षा करना।
- सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और संगठित धर्मांतरण को विनियमित करना: अंतर-धार्मिक धर्मांतरण और विवाहों से उत्पन्न विवादों को हल करना और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाले संगठित या सामूहिक धर्मांतरण को रोकना।
- समाज के कमजोर वर्गों की रक्षा करना: महिलाओं, नाबालिगों और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों को धार्मिक धर्मांतरण के मामलों में शोषण या अनुचित प्रभाव से बचाना।
- कानूनी स्पष्टता और निवारण सुनिश्चित करना: विशिष्ट परिभाषाएँ, प्रक्रियाएँ और दंडात्मक प्रावधान प्रदान करके मौजूदा कानूनों की कमियों को दूर करना।
कानून के साथ आलोचनाएं / मुद्दे
- अति-व्यापक परिभाषाएँ और प्रतिकूल प्रभाव (Chilling Effect): “प्रलोभन” जैसे व्यापक शब्द (जिसमें किसी एक धर्म का महिमामंडन शामिल है) वैध धार्मिक अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित कर सकते हैं, जिससे अनुच्छेद 19 और 25 के तहत चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
- निजता और स्वायत्तता की चिंता: अनिवार्य पूर्व सूचना और सार्वजनिक प्रकटीकरण व्यक्तिगत धार्मिक विकल्पों में हस्तक्षेप करते हैं, जो निजता के अधिकार (पुट्टास्वामी मामला) और व्यक्तिगत स्वायत्तता का उल्लंघन कर सकते हैं।
- प्रमाण के भार का उलटना: आरोपी पर वैधता साबित करने का बोझ डालना आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के विपरीत हो सकता है।
- दुरुपयोग और उत्पीड़न की गुंजाइश: पुलिस की स्वतः संज्ञान कार्रवाई और शिकायतों का व्यापक आधार अंतर-धार्मिक जोड़ों और अल्पसंख्यक समुदायों को लक्षित करने के लिए दुरुपयोग को सक्षम बना सकता है।
- व्यक्तिगत संबंधों पर प्रभाव: विवाहों को शून्य घोषित करना और बच्चे का धर्म निर्धारित करना व्यक्तिगत मामलों में राज्य के अतिरेक (overreach) को दर्शाता है, जो पसंद की स्वतंत्रता (हादिया मामला) पर न्यायिक मिसाल के विपरीत हो सकता है।
भारत में धर्मांतरण विरोधी कानूनों की स्थिति
- कई राज्यों (ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश आदि) ने समान संरचना वाले धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए हैं।
- 2015 में, केंद्रीय कानून मंत्रालय ने राय दी थी कि केंद्रीय धर्मांतरण विरोधी कानून व्यवहार्य नहीं है क्योंकि “सार्वजनिक व्यवस्था” और “पुलिस” राज्य के विषय हैं।
- 2022 के एक हलफनामे में, केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि धर्म के अधिकार में धोखाधड़ी या जबरदस्ती के माध्यम से दूसरों को धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है।
उच्चतम न्यायालय के संबंधित निर्णय
- रेव स्टेनिसलॉस मामला (1977): न्यायालय ने फैसला सुनाया कि धर्म के प्रचार के अधिकार में दूसरों को धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है।
- राज्य के पास सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसे विनियमित करने की शक्ति है।
- सरला मुद्गल मामला (1995): विवाह के लिए धर्मांतरण की अनुमति है, लेकिन इसका उपयोग कानूनी जिम्मेदारियों या दायित्वों से बचने के लिए नहीं किया जा सकता है।
- हादिया विवाह मामला (2018): न्यायालय ने पुष्टि की कि वयस्कों को अपनी पसंद के धर्म में विवाह करने और धर्मांतरित होने का मौलिक अधिकार है; राज्य को व्यक्तिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
