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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों का जुटाव, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय|
संदर्भ: हाल ही में, नीति आयोग ने राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) 2026 का दूसरा संस्करण जारी किया है, जो भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का एक व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) के बारे में:
- FHI नीति आयोग द्वारा विकसित एक डेटा-संचालित फ्रेमवर्क है, जिसका उद्देश्य भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का आकलन और तुलना करना है।
- इसकी अवधारणा राज्यों में राजकोषीय सुदृढ़ता का मूल्यांकन करने, सुधारों का मार्गदर्शन करने और साक्ष्य-आधारित राजकोषीय नीति निर्माण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
- यह सूचकांक राज्यों के बीच व्यवस्थित बेंचमार्किंग प्रदान करता है, जिससे राजकोषीय शक्तियों, कमजोरियों और नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिलती है।
- इस तरह के मूल्यांकन की आवश्यकता इसलिए बढ़ी है क्योंकि भारत के राजकोषीय ढांचे में राज्य सरकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है और वे देश के कुल सामान्य सरकारी ऋण के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए उत्तरदायी हैं।

- समग्र FHI को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के डेटा का उपयोग करके विकसित किया गया है। यह मुख्य रूप से पाँच उप-सूचकांकों पर केंद्रित है:
- व्यय की गुणवत्ता
- राजस्व संग्रहण
- राजकोषीय विवेक
- ऋण सूचकांक
- ऋण स्थिरता
- प्रथम संस्करण (2025) में 18 प्रमुख राज्यों का मूल्यांकन किया गया था, जबकि द्वितीय संस्करण में 10 उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को शामिल किया गया है। यह विस्तार सूचकांक को अधिक समावेशी और भारत की राजकोषीय विविधता का प्रतिनिधि बनाता है।
- भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम, सीमित राजस्व क्षमता, विरल जनसंख्या और उच्च सेवा वितरण लागत जैसे संरचनात्मक अंतरों के कारण, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को प्रमुख राज्यों से अलग रैंक दी गई है।
- यह सूचकांक वित्त वर्ष 2014-15 से 2023-24 तक के राजकोषीय रुझानों का विश्लेषण प्रदान करता है, जो नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और हितधारकों के लिए महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
- यह सूचकांक 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप है।
सूचकांक के मुख्य निष्कर्ष
- समग्र राजकोषीय रुझान: राज्यों के राजकोषीय परिणामों में व्यापक भिन्नता देखी गई है, जो उनके राजकोषीय अनुशासन, राजस्व संग्रहण और व्यय प्रबंधन में अंतर को दर्शाती है।
- 18 प्रमुख राज्यों में से कई ने वित्त वर्ष 2023-24 में मध्यम FHI स्कोर दर्ज किया है, जो उभरते राजकोषीय दबाव का संकेत देता है।
- दृढ़ राजकोषीय अनुशासन और बेहतर राजस्व संग्रहण वाले राज्य उच्च रैंकिंग पर हैं, जबकि निम्न रैंक वाले राज्यों में गैर-विकासात्मक व्यय अधिक और राजकोषीय स्थिरता कमजोर पाई गई है।
- प्रमुख राज्यों का प्रदर्शन: ओडिशा अपने नियंत्रित घाटे और स्थिर राजस्व के आधार पर शीर्ष प्रदर्शन करने वाला राज्य बना हुआ है।
- गोवा और झारखंड भी ‘अचीवर’ राज्यों की श्रेणी में शामिल हैं, जबकि गुजरात और महाराष्ट्र शीर्ष पाँच में बने हुए हैं।
- हरियाणा की रैंकिंग में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।
- बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना में आंशिक सुधार देखा गया है, जबकि छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और राजस्थान के राजकोषीय संकेतकों में गिरावट के कारण उनकी रैंकिंग में गिरावट आई है।
- पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश बढ़ते ऋण स्तर, निरंतर घाटे और मामूली राजस्व वृद्धि के कारण निरंतर राजकोषीय तनाव की स्थिति में हैं।
- अचीवर राज्य (ओडिशा, गोवा, झारखंड)
- स्वयं का उच्च कर राजस्व
- अधिक पूंजीगत व्यय
- राजकोषीय घाटा GSDP के 3% की विधिक सीमा से नीचे है।
- मध्यम ऋण भार ( कुल ऋण GSDP के 25% से कम है।)
- फ्रंट-रनर राज्य: गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक।
- परफॉर्मर: मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार, तमिलनाडु और राजस्थान।
- एस्पिरेशनल राज्य: पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश और पंजाब
- इन राज्यों की मुख्य विशेषताएँ अत्यधिक ऋण (जीएसडीपी का 35-45%), निरंतर घाटा, उच्च प्रतिबद्ध व्यय (राजस्व प्राप्तियों का 50-60%) और भारी ब्याज बोझ हैं।
- उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों का प्रदर्शन: इन राज्यों की विशिष्ट भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों के कारण इन्हें पृथक रूप से वर्गीकृत किया गया है:
- अचीवर्स: अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड।
- परफॉर्मर्स: असम, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम और त्रिपुरा।
- एस्पिरेशनल: हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड।
- व्यय गुणवत्ता और विवेकपूर्ण ऋण प्रबंधन के कारण अरुणाचल प्रदेश को उच्चतम रैंक प्राप्त हुई है।
- स्वयं के राजस्व संग्रहण में मजबूती के कारण उत्तराखंड का प्रदर्शन बेहतर है।
- त्रिपुरा ने उत्कृष्ट ऋण स्थिरता प्रदर्शित करता है, जबकि मेघालय और असम का प्रदर्शन विभिन्न संकेतकों पर मिश्रित रहा है।
- हिमाचल प्रदेश और मणिपुर राज्य उच्च प्रतिबद्ध व्यय और कमजोर राजस्व संग्रहण के कारण सीमित बने हुए हैं।
- कई राज्य केंद्रीय हस्तांतरण पर अत्यधिक निर्भर हैं, जिनमें से कुछ अपना 80% से अधिक राजस्व केंद्र से प्राप्त करते हैं
- राजकोषीय सुधार हेतु नीतिगत प्राथमिकताएँ: राजकोषीय स्वास्थ्य में सुधार के लिए रिपोर्ट में निम्नलिखित सुधारों को रेखांकित किया गया है:
- राजस्व संग्रहण में वृद्धि: राज्यों की स्वयं की कर क्षमता को सुदृढ़ करना और विशेष रूप से जीएसटी (GST) आधार को व्यापक बनाकर राजस्व जुटाने के प्रयासों को तेज करना।
- प्रतिबद्ध व्यय का युक्तिकरण: राजकोषीय लचीलेपन में सुधार करने के लिए वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे प्रतिबद्ध व्यय का युक्तिकरण करना।
- पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता: पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता और उसकी संरचना में सुधार करना ताकि दीर्घकालिक परिसंपत्तियों का निर्माण हो सके।
- मध्यम अवधि का राजकोषीय नियोजन: घाटे और ऋण के प्रक्षेपवक्र को प्रबंधित करने के लिए मध्यम अवधि के राजकोषीय नियोजन ढांचे को अपनाना।
- बजट-बाह्य उधारियों की निगरानी: बजट से बाहर की जाने वाली उधारियों की निगरानी करना और सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों (PFMS) को सुदृढ़ बनाना।
- पारदर्शिता और मानकीकरण: सीएजी (CAG) द्वारा सत्यापित राजकोषीय डेटा का उपयोग करके पारदर्शिता में सुधार करना और राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) जैसे उपकरणों के माध्यम से निरंतर बेंचमार्किंग करना।
नीति आयोग के बारे में
- 1 जनवरी, 2015 को योजना आयोग के उत्तरवर्ती के रूप में नीति (NITI – नेशनल इंस्टिट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) आयोग की स्थापना की गई। इसका गठन भारत सरकार (केंद्रीय मंत्रिमंडल) के एक कार्यकारी प्रस्ताव के माध्यम से हुआ था।
- यह एक गैर-संवैधानिक (संविधान द्वारा गठित नहीं) और गैर-सांविधिक (संसद के अधिनियम द्वारा गठित नहीं) निकाय है।
नीति आयोग की भूमिका और कार्य
- नीति आयोगभारत सरकार के प्राथमिक ‘नीतिगत थिंक टैंक’ के रूप में कार्य करता है और सरकार को दिशात्मक तथा नीतिगत इनपुट प्रदान करता है।
- यह सरकार के लिए रणनीतिक और दीर्घकालिक नीतियों तथा कार्यक्रमों को तैयार करने हेतु उत्तरदायी है।
- यह केंद्र और राज्यों दोनों को तकनीकी सलाह प्रदान करता है।
- योजना आयोग के युग के ‘केंद्र से राज्यों की ओर’ एकतरफा नीतिगत प्रवाह के स्थान पर यह केंद्र और राज्यों के बीच एक वास्तविक साझेदारी सुनिश्चित करता है।
- नीति आयोग पूर्ववर्ती ‘कमांड-एंड-कंट्रोल’ पद्धति के स्थान पर एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करता है। इसका तात्पर्य यह है कि अब केंद्र केवल निर्देश नहीं देता, बल्कि राज्यों के साथ मिलकर साझा लक्ष्यों पर कार्य करता है।
- संघवाद की भावना के अनुरूप, नीति आयोग ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण पर कार्य करता है। यह पारंपरिक ‘टॉप-डाउन’ मॉडल के बजाय विभिन्न हितधारकों, स्थानीय निकायों और राज्यों से प्राप्त इनपुट के आधार पर अपने नीतिगत दृष्टिकोण को आकार देता है।
- ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण: यह पारंपरिक ‘टॉप-डाउन’ मॉडल के विपरीत, जमीनी स्तर (बॉटम-अप) से प्राप्त इनपुट के आधार पर नीतियों का निर्माण करता है।
नीति आयोग की संरचना
- अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री।
- शासी परिषद : इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के उप-राज्यपाल शामिल होते हैं।
- क्षेत्रीय परिषदें: विशिष्ट क्षेत्रीय मुद्दों के समाधान हेतु प्रधानमंत्री द्वारा गठित और मनोनीत व्यक्ति द्वारा अध्यक्षता।
- विशेष आमंत्रित सदस्य: प्रधानमंत्री द्वारा नामित विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ।
- पूर्णकालिक संगठनात्मक ढांचा:
- उपाध्यक्ष: प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त (कैबिनेट मंत्री का दर्जा)।
- पूर्णकालिक सदस्य: राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त।
- अंशकालिक सदस्य, पदेन सदस्य, मुख्य कार्यकारी अधिकारी और सचिवालय
