संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: संघ और राज्यों के कार्य और दायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ। संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्यवाही का संचालन, शक्तियाँ और विशेषाधिकार तथा इनसे संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है।
अन्य संबंधित जानकारी
- संविधान में उल्लिखित राज्य के “केरल” नाम को बदलकर “केरलम” करने की मांग इसलिए की गई क्योंकि मलयालम भाषा में केरलम का उच्चारण किया जाता है।
- इससे पूर्व, केरल विधानसभा ने 24 जून, 2024 को केरल का नाम बदलकर केरलम करने हेतु एक संकल्प पारित किया था।
- केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुमोदन के पश्चात, भारत के राष्ट्रपति अनुच्छेद 3 के परंतुक के तहत केरल (नाम में परिवर्तन) विधेयक, 2026 को केरल राज्य विधानसभा के समक्ष उनके विचार व्यक्त करने हेतु प्रेषित करेंगे।
“केरलम” नाम का विकास

- इस नाम के प्राचीनतम ऐतिहासिक प्रमाण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मिलते हैं, जब सम्राट अशोक के द्वितीय शिलालेख में इस क्षेत्र को “केरलपुत्र” के रूप में संदर्भित किया गया था।
- 1920 और 1940 के दशकों में, ऐक्य केरल आंदोलन एक सशक्त सामाजिक-राजनीतिक अभियान के रूप में उभरा, जिसने मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक राज्य में एकीकृत करने की मांग की। इसी आंदोलन ने भाषाई रूप से एकजुट केरल की वैचारिक आधारशिला रखी।
- 1 जुलाई 1949 को एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव हुआ, जब त्रावणकोर और कोचीन की रियासतों का विलय कर ‘त्रावणकोर-कोचीन’ राज्य का गठन किया गया।
- 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत निर्णायक पुनर्गठन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भाषाई आधार पर आधुनिक राज्य का गठन किया गया। हालांकि मलयालम में इसे “केरलम” के नाम से जाना जाता है, किंतु भारत के संविधान की प्रथम अनुसूची में इसे आधिकारिक रूप से “केरल” के रूप में दर्ज किया गया था।
- दशकों पश्चात, 9 अगस्त 2023 को केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन करने और आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध सभी भाषाओं में आधिकारिक रूप से “केरलम” नाम अपनाने का अनुरोध किया गया।
- गृह मंत्रालय की तकनीकी टिप्पणियों के बाद, विधानसभा ने अपने प्रस्ताव को परिष्कृत किया और 24 जून 2024 को सर्वसम्मती से दूसरा संकल्प पारित किया गया, जिसमें संशोधन को केवल संविधान की प्रथम अनुसूची तक सीमित रखने का प्रस्ताव दिया गया।
भारत में राज्य नाम परिवर्तित करने की प्रक्रिया
- भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद के पास किसी राज्य का नाम बदलने का प्राधिकार है।
- किसी राज्य का नाम बदलने हेतु विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में केवल राष्ट्रपति की अनुशंसा पर ही पेश किया जा सकता है।
- प्रभावित राज्यों के साथ परामर्श: प्रस्तावित परिवर्तनों से प्रभावित राज्यों के समक्ष विधेयक प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है। राज्य विधानमंडल एक निर्दिष्ट समयावधि के भीतर विधेयक पर अपने विचार प्रस्तुत कर सकता है।
- राज्य विधानमंडल के विचार या सुझाव संसद पर बाध्यकारी नहीं हैं।
- निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात या राज्य के विचार प्राप्त होने पर, विधेयक को संसद में प्रस्तुत किया जाता है और उस पर चर्चा की जाती है। इसे उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत (जैसा कि एक सामान्य कानून के मामले में होता है) द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य है।
- अनुच्छेद 4 की प्रयोज्यता: अनुच्छेद 4 के अंतर्गत, अनुच्छेद 3 के तहत बनाए गए किसी भी कानून में प्रथम अनुसूची (राज्यों के नाम और क्षेत्र) और चौथी अनुसूची (राज्यसभा में प्रतिनिधित्व) में प्रासंगिक संशोधन किए जा सकते हैं। ऐसे कानून को अनुच्छेद 368 के तहत ‘संविधान में संशोधन’ नहीं माना जाता है।
- राष्ट्रपति का अनुमोदन: संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद, विधेयक को राष्ट्रपति के समक्ष उनकी स्वीकृति हेतु प्रस्तुत किया जाता है। स्वीकृति प्राप्त होने पर, यह कानून बन जाता है और राज्य का नाम आधिकारिक रूप से बदल जाता है।
समान मांगों की कुछ हालिया घटनाएँ
- पश्चिम बंगाल से ‘बांग्ला‘: 2011 में “पश्चिम बंगो”, 2016 में त्रिभाषी नाम (बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’) और अंततः 2018 में सभी भाषाओं के लिए एकल नाम “बांग्ला” का प्रस्ताव दिया गया। हालांकि, इस प्रस्ताव को अभी तक केंद्र सरकार से अंतिम स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है।
- दिल्ली से ‘इंद्रप्रस्थ‘ : केरल के प्रस्ताव को मिली स्वीकृति के उपरांत, फरवरी 2026 में एक संसद सदस्य (MP) ने राष्ट्रीय राजधानी का नाम बदलकर “इंद्रप्रस्थ” करने का प्रस्ताव रखा, ताकि महाभारत काल की प्राचीन सभ्यतागत पहचान को पुनः स्थापित किया जा सके।
- ओड़िशा: स्थानीय उच्चारण के अनुरूप 2011 में ‘उड़ीसा’ का नाम बदलकर “ओडिशा” कर दिया गया था (साथ ही भाषा का नाम ‘ओड़िया’ से ‘ओडिया’ किया गया था)।
- उत्तराखंड: उत्तर प्रदेश से अलग होते समय इस क्षेत्र का नाम सरकार द्वारा ‘उत्तरांचल’ रखा गया था। वर्ष 2007 में, जनभावनाओं और व्यापक मांग को देखते हुए इसे आधिकारिक रूप से बदलकर “उत्तराखंड” कर दिया गया।
- पुडुचेरी: तमिल भाषाई पहचान को दर्शाने के लिए ‘पॉन्डिचेरी’ का नाम बदलकर “पुडुचेरी” किया गया था।
