संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: केंद्र और राज्यों के कार्य और दायित्व; संघीय ढाँचे से संबधित विषय और चुनौतियाँ।
संदर्भ: तमिलनाडु सरकार द्वारा ‘संघ-राज्य संबंधों पर गठित उच्च स्तरीय समिति’ ने अप्रैल 2025 में अपनी रिपोर्ट का प्रथम भाग प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीय संघवाद के “संरचनात्मक पुनर्गठन” की सिफारिश की गई है।
अन्य संबंधित जानकारी
• इस समिति की अध्यक्षता न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ (सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश) कर रहे हैं। यह रिपोर्ट संविधान सभा की बहसों, शैक्षणिक विद्वत्ता और पूर्व समितियों (सरकारिया, पुंछी, NCRWC) के आधार पर केंद्रीकरण के स्वरूपों का मानचित्रण करती है और संवैधानिक एवं संस्थागत सुधारों का प्रस्ताव देती है।
• रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि विभाजन और रियासतों के एकीकरण के परिणामस्वरूप बना भारत का संघीय ढांचा अब अत्यधिक केंद्रीकृत हो गया है, जो देश की राजनीतिक परिपक्वता और विविधता से मिलता-जुलता नहीं है।
• यह विकेंद्रीकरण के लिए ग्यारह आधारभूत तर्क प्रस्तुत करती है, जिनमें स्वतंत्रता तर्क, लोकतंत्र तर्क और नवाचार तर्क शामिल हैं; साथ ही यह ‘एकरूपता की भ्रांति’ और ‘नियंत्रण की भ्रांति’ की आलोचना करती है।
समिति की मुख्य सिफारिशें
A. संवैधानिक संशोधन और बुनियादी ढांचा:
- अनुच्छेद 368 में संशोधन किया जाए जिससे अधिकांश संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता हो, जो कुल जनसंख्या के दो-तिहाई का प्रतिनिधित्व करते हों, ताकि संघीय सहमति को बल मिल सके।
- अनुच्छेद 368 में एक स्पष्ट “मूल विशेषता” खंड जोड़ा जाए, जिसमें संघवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा और स्वतंत्र चुनाव जैसी अपरिवर्तनीय विशेषताओं को सूचीबद्ध किया जाए और इस प्रकार बुनियादी संरचना सिद्धांत का संहिताकरण किया जाए।
B. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) की क्षेत्रीय अखंडता:
- अनुच्छेद 3 के तहत संसद की एकपक्षीय शक्ति में कटौती की जाए जिसमें राज्य की सीमाओं या स्थिति में परिवर्तन से पहले प्रभावित राज्य के ‘विशेष बहुमत’ से सहमति और कुछ मामलों में ‘जनमत संग्रह’ अनिवार्य किया जाए।
- नए केंद्र शासित प्रदेशों के निर्माण पर रोक लगाने और मौजूदा केंद्र शासित प्रदेशों की भविष्य की स्थिति पर आवधिक जनमत संग्रह कराने के लिए नया अनुच्छेद 3A जोड़ा जाए।
C. भाषा नीति:
- “एक राष्ट्र, एक भाषा” दृष्टिकोण को खारिज करते हुए बहुल भाषाई संघवाद का समर्थन।
- अनुच्छेद 343 में संशोधन करके अंग्रेजी को संघ की स्थायी आधिकारिक भाषा बनाया जाए और अनुच्छेद 345 से हिंदी के संदर्भों को हटाया जाए।
• ‘भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी’ के स्थान पर ‘राष्ट्रीय भाषा आयोग’ बनाया जाए और ‘त्रि-भाषा सूत्र’ के स्थान पर उच्च-प्रवीणता वाले द्विभाषावाद (अंग्रेजी + मातृभाषा/राज्य भाषा) को अपनाया जाए।
D. राज्यपालों की भूमिका:
- अनुच्छेद 155 में संशोधन किया जाए ताकि राष्ट्रपति को राज्य विधानसभा द्वारा अनुमोदित तीन नामों में से एक को नियुक्त करना अनिवार्य हो।
- प्रसादपर्यंत सिद्धांत की समाप्ति के लिए अनुच्छेद 156 में संशोधन किया जाए और राज्यपाल का कार्यकाल एकल, गैर-नवीकरणीय पांच वर्ष का निश्चित किया जाए तथा उन्हें केवल राज्य विधानसभा के प्रस्ताव के माध्यम से हटाया जाए ऐसी व्यवस्था की जाए।
- नई ‘तेरहवीं अनुसूची’ में अनुदेशों प्रपत्र शामिल किया जाए जिसके माध्यम से राज्यपाल के विवेकाधिकार को स्पष्ट रूप से सीमित किया जाए।
E. राजकोषीय संघवाद और जीएसटी:
- राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए मतदान के भारांक की समीक्षा की जाए और ‘मोहित मिनरल्स (2022)’ निर्णय के अनुरूप स्पष्ट किया जाए कि इसके निर्णय केवल अनुशंसात्मक हैं।
- राज्यों को अनुमानित और नियम-आधारित हस्तांतरण सुनिश्चित किया जाए।
F. प्रतिनिधित्व और परिसीमन:
- अंतर-राज्य लोकसभा सीट आवंटन पर रोक को 2126 तक बढ़ाया जाए या जब तक अंतर-राज्य प्रजनन दरें समान न हो जाएं, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व की रक्षा हो सके।
G. विधायी और प्रशासनिक शक्तियां:
- केंद्र और राज्य के चुनाव प्रशासन को अलग किया जाए, राज्य चुनाव आयोगों को सशक्त बनाया जाए और चुनावी प्रक्रियाओं में केंद्रीय हस्तक्षेप को कम किया जाए।
- शिक्षा को पुनः ‘राज्य सूची’ में शामिल किया जाए, चिकित्सा शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण बहाल किया जाए और स्वास्थ्य क्षेत्र में केंद्रीय प्रायोजित योजनाओं (CSS) को पुनर्गठित किया जाए।
संघ-राज्य संबंधों पर प्रभाव
• विधायी और संवैधानिक शक्ति का पुनर्संतुलन: यदि इन सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो ये संवैधानिक संशोधनों पर केंद्र की एकपक्षीय कार्रवाई को महत्वपूर्ण रूप से सीमित कर देंगी, जिससे राज्यों को प्रमुख संरचनात्मक परिवर्तनों में ‘वीटो’ जैसी भूमिका प्राप्त होगी।
• जनसांख्यिकीय समानता का संतुलन: लोकसभा सीटों के स्थिरीकरण को बढ़ाने का प्रस्ताव देकर, यह रिपोर्ट उन राज्यों की रक्षा करने का प्रयास करती है जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, ताकि वे राष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव न खोएं।
• बहुलवाद पर बल: भाषा नीति पर दी गई सिफारिशों का उद्देश्य बहुभाषावाद को संवैधानिक रूप से सुरक्षित करना है, जिससे सांस्कृतिक समरुपण को रोका जा सके और यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की भाषाई विविधता इसकी लोकतांत्रिक और संघीय पहचान का केंद्र बनी रहे।
• संस्थागत पुनर्संतुलन: संवैधानिक, राजकोषीय और प्रशासनिक सुधारों के माध्यम से, समिति केंद्र के प्रभुत्व को कम करने और राज्यों के लिए सार्थक स्वायत्तता के साथ एक अधिक संतुलित, विश्वास-आधारित संघीय ढांचे की स्थापना की परिकल्पना करती है।
केंद्र-राज्य संबंधों पर अन्य समितियाँ/आयोग
• सरकारिया आयोग (1983-88): मौजूदा संविधान के तहत केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए गठित; इसने अनुच्छेद 356 के उपयोग में संयम बरतने, एक स्थायी अंतर-राज्य परिषद, राज्यपाल की भूमिका के लिए स्पष्ट मानदंड और सुदृढ़ राजकोषीय संघवाद की सिफारिश की थी।
• पुंछी आयोग (2007-10): केंद्र-राज्य संबंधों का पुन: परीक्षण किया; इसने राज्यपाल की नियुक्ति और कार्यकाल पर निश्चित दिशा-निर्देश, राज्य सरकारों की सेवा-मुक्ति पर सीमाएं और केंद्रीय हस्तक्षेप के लिए स्पष्ट सिद्धांतों का सुझाव दिया।
• संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC, 2000-02): इसने शक्तियों के बुनियादी संतुलन को काफी हद तक सुरक्षित रखते हुए विकेंद्रीकरण, स्थानीय निकायों और अंतर-सरकारी समन्वय के मुद्दों को संबोधित किया।
• राजमन्नार समिति (1969-70, तमिलनाडु): प्रथम राज्य-स्तरीय जांच समिति; इसने केंद्रीकरण की आलोचना की, अनुच्छेद 356 को निरस्त करने, एक मजबूत अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263), विषयों (श्रमिक संघ, बिजली) को राज्य सूची में स्थानांतरित करने और योजना आयोग को सीमित करने की सिफारिश की।
• आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973, शिरोमणि अकाली दल): इसमें केंद्र-राज्य संबंधों को पुन: परिभाषित करने, व्यापक राज्य स्वायत्तता (रक्षा, विदेशी मामले और मुद्रा को छोड़कर शेष शक्तियां सौंपने), पंजाब के जल अधिकारों और सिखों के राजनीतिक अधिकारों की मांग की गई थी।
