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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।  

सन्दर्भ: हाल ही में, नीति आयोग ने “प्रशिक्षुता पारिस्थितिकी तन्त्र का पुनरुद्धार: अन्तर्दृष्टि, चुनौतियाँ, अनुशंसाएँ और सर्वोत्तम प्रथाएँ” शीर्षक से एक नीतिगत रिपोर्ट जारी की है।    

अन्य संबंधित जानकारी: 

  • यह रिपोर्ट ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को प्राप्त करने हेतु भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाने के उद्देश्य से, शिक्षा और रोज़गार के बीच एक सुदृढ़ कड़ी के रूप में प्रशिक्षुता (अप्रेंटिसशिप) को पुनर्गठित करने की व्यापक रणनीति की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
  • रिपोर्ट में कार्य-योजना के साथ 20 कार्य-उन्मुख अनुशंसाएँ दी गयी हैं, जिनमें प्रत्येक अनुशंसा के लिये कार्यान्वयन उत्तरदायित्व और मापने योग्य प्रदर्शन मापदण्ड निर्धारित किये गये हैं।
  • इसमें अनुशंसाओं को 5 परस्पर सम्बद्ध स्तम्भों में वर्गीकृत किया गया है:
    • नीतिगत और प्रणालीगत सुधार
    • संरचनात्मक और विनियामक सुदृढ़ीकरण
    • राज्य और जिला-विशिष्ट हस्तक्षेप
    • उद्योग और नियोक्ता सहभागिता
    • प्रशिक्षु और आकांक्षी-स्तरीय सहायता तन्त्र।
  • इस अध्ययन की परिकल्पना और डिज़ाइन नीति आयोग के ‘कौशल विकास और रोज़गार प्रभाग’ द्वारा किया गया था। इसने प्रशिक्षुता अधिनियम, 1961 के विकास, इसके उत्तरवर्ती संशोधनों और विनियामक सुधारों की व्यापक समीक्षा की है।
  • इसमें राष्ट्रीय प्रशिक्षुता संवर्धन योजना (NAPS) पोर्टल और राष्ट्रीय प्रशिक्षुता प्रशिक्षण योजना (NATS) डैशबोर्ड सहित आधिकारिक सार्वजनिक प्लेटफॉर्मों के द्वितीयक डेटा का उपयोग किया गया है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

  • प्रशिक्षुता में राष्ट्रीय प्रवृत्तियाँ:
    • रिपोर्ट प्रणालीगत विकास और दक्षता का आकलन करने के लिये पंजीकृत प्रतिष्ठानों, सक्रिय अनुबन्धों, पूर्णता दर और बीच में छोड़ने (ड्रॉपआउट) के प्रतिरूप जैसे राष्ट्रीय प्रदर्शन संकेतकों का विश्लेषण करती है।
    • यह समावेशिता और प्रशिक्षुता अंगीकरण की औद्योगिक गहनता को समझने के लिये उद्यम के आकार, क्षेत्रीय प्रसार और लैंगिक भागीदारी का परीक्षण करती है। MSME की तुलना में बड़े उद्यमों की उच्च भागीदारी असमान सहभागिता को प्रतिबिम्बित करती है।
  • प्रवृत्तियाँ और अन्तर्दृष्टि: राज्य और विशेष क्षेत्र:
    • रिपोर्ट क्षेत्रीय प्रगति और विषमताओं को मानचित्रित करने के लिये वित्तीय वर्ष 2018-19 से 2024-25 तक राज्य-वार और जिला-वार प्रदर्शन विश्लेषण प्रदान करती है।
    • यह अनुकरणीय मॉडलों और पिछड़े क्षेत्रों की पहचान करने के लिये राज्यों को शीर्ष और निचले प्रदर्शन करने वालों श्रेणियों में वर्गीकृत करती है। उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्य मज़बूत उद्योग अभिसरण और संस्थागत क्षमता का प्रदर्शन करते हैं।
  • हितधारक परामर्श:
    • रिपोर्ट विश्लेषण को ज़मीनी हकीकत पर आधारित करने के लिये सरकारी निकायों, उद्योग संघों, बहुपक्षीय एजेन्सियों और विषय विशेषज्ञों के सुझावों को समाहित करती है।
    • राज्य और क्षेत्र-स्तरीय प्रयोगों से उभरने वाली परिचालन बाधाओं और नवीन प्रथाओं की पहचान करती है।
  • बाधाओं का विश्लेषण:
    • यह सीमित उद्योग भागीदारी, विनियामक जटिलता और गुणवत्ता आश्वासन अन्तराल जैसे संरचनात्मक और प्रणालीगत अवरोधों का निदान करती है। छोटी फर्मों में अक्सर प्रशिक्षुता मानदण्डों के अनुपालन के लिये प्रशासनिक क्षमता का अभाव होता है।

रिपोर्ट की मुख्य अनुशंसाएँ:

  • नीतिगत और प्रणालीगत सुधार:
    • यह एक एकीकृत प्रशिक्षुता मिशन, जैसे कि राष्ट्रीय प्रशिक्षुता मिशन (NAM) का प्रस्ताव करती है, जो एकल डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘राष्ट्रीय प्रशिक्षुता पोर्टल’ (NAP) के माध्यम से सुलभ हो।
    • ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज प्रगति को सक्षम करने के लिये निर्बाध शिक्षा-कौशल गतिशीलता हेतु संरचित मार्गों की अनुशंसा करती है।
  • संरचनात्मक और विनियामक अनुशंसाएँ:
    • यह प्रदर्शन को बेंचमार्क करने और प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद को बढ़ावा देने के लिये राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों हेतु ‘प्रशिक्षुता सहभागिता सूचकांक’ (AEI) शुरू करने का आह्वान करती है।
  • राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश और विशेष जिला-विशिष्ट हस्तक्षेप:
    • यह स्थानीय योजना, समन्वय और उद्योग सरेखण को संचालित करने के लिये ‘जिला कौशल समितियों’ को सुदृढ़ करती है।
    • पूर्णता परिणामों में सुधार के लिये विशेष और आकांक्षी जिलों हेतु लक्षित संस्थागत सहायता की अनुशंसा करती है।
    • प्रतिष्ठानों की सहभागिता बढ़ाने के लिये पात्रता मानदण्डों और संलग्नता सीमाओं का विस्तार करती है।
    • आकांक्षी जिलों, उत्तर-पूर्वी राज्यों और महिला प्रशिक्षुओं के लिये ‘प्रशिक्षुता-सम्बद्ध प्रोत्साहन’ ढाँचे का प्रस्ताव करती है।
  • उद्योग और नियोक्ता:
    • यह पहुँच को बढ़ाने के लिये एमएसएमई क्लस्टर परिसंघों, समुदाय-आधारित नेटवर्कों और पारम्परिक कौशलों के एकीकरण को बढ़ावा देती है।
    • प्रशिक्षुता को उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मकता और कार्यबल नियोजन के लिये एक रणनीतिक निवेश उपकरण के रूप में पुनर्गठित करती है।
  • प्रशिक्षु और आकांक्षी सशक्तिकरण:
    • यह अन्तरराष्ट्रीय गतिशीलता मार्गों, विनिमय कार्यक्रमों और कौशल प्रतियोगिताओं के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देती है।            
    • लक्षित पहुँच, सक्षम नीतियों और सहायक संस्थागत तन्त्र के माध्यम से महिलाओं के समावेशन को बढ़ावा देती है।

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