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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।
संदर्भ: ‘नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु-प्रेरित चरम मौसमी घटनाएं 2085 तक प्रजातियों के वर्तमान स्थलीय आवासों के 36% हिस्से को प्रभावित कर सकती हैं।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह अध्ययन पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया था, जिसमें जलवायु परिदृश्यों के तहत वैश्विक जैव विविधता जोखिम का विश्लेषण किया गया है।
• यह स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र के जोखिमों का आकलन करने के लिए जलवायु अनुमानों, प्रभाव मॉडलों और प्रजाति वितरण डेटा का उपयोग करता है।
• इसमें “मिश्रित चरम सीमाओं” की अवधारणा केंद्रीय है, जहाँ कई खतरे एक साथ या क्रमिक रूप से उत्पन्न होते हैं, जिससे पारिस्थितिक क्षति और बढ़ जाती है।
• निष्कर्ष संकेत देते हैं कि वर्तमान संरक्षण रणनीतियाँ अपर्याप्त हो सकती हैं, क्योंकि वे अक्सर अचानक और ओवरलैपिंग चरम घटनाओं को ध्यान में रखने में विफल रही हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
• 36% स्थलीय जीवों के लिए आवास जोखिम: उच्च-उत्सर्जन परिदृश्य के तहत 2085 तक, लगभग 36% स्थलीय कशेरुकी आवास कई चरम मौसमी घटनाओं की चपेट में आ सकते हैं, जो जैव विविधता के लिए जलवायु संबंधी जोखिमों में भारी वृद्धि का संकेत देता है।
• व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन: यह अध्ययन 794 पारिस्थितिक क्षेत्रों में 33,936 प्रजातियों के व्यापक विश्लेषण पर आधारित है, जो इसे जलवायु-प्रेरित आवास सुभेद्यता के सबसे विस्तृत वैश्विक मूल्यांकनों में से एक बनाता है।
• लू (हीटवेव्स) का प्रभुत्व: लू को सबसे व्यापक और प्रमुख खतरे के रूप में पहचाना गया है, जिसके बाद वनाग्नि, सूखा और बाढ़ का स्थान है। ये सभी कारक पारिस्थितिक तंत्र के तनाव और आवास क्षरण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
• 2050 तक अनुमानित जोखिम: 2050 तक, लू के लगभग 74% आवासों को प्रभावित करने का अनुमान है, जबकि वनाग्नि, सूखा और बाढ़ क्रमशः लगभग 16%, 8% और 3% आवासों को प्रभावित कर सकते हैं।
• 2085 तक जोखिम में वृद्धि: शताब्दी के अंत तक, जोखिम की तीव्रता और पैमाने में और अधिक वृद्धि होने की संभावना है। लू संभावित रूप से प्रजातियों के 93% भौगोलिक क्षेत्रों को प्रभावित कर सकती है, साथ ही वनाग्नि, सूखे और बाढ़ के जोखिमों में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
• सुभेद्यता के हॉटस्पॉट: अमेज़न बेसिन, उष्णकटिबंधीय अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में जोखिम और पारिस्थितिक तनाव का उच्चतम स्तर होने की आशंका है।
• मिश्रित जोखिमों में तीव्रता: कई चरम घटनाओं की चपेट में आने वाले पारिस्थितिक क्षेत्रों की संख्या 2050 तक 22 से बढ़कर 2085 तक 236 होने का अनुमान है, जो मिश्रित जलवायु जोखिमों की तेजी से तीव्र होती प्रकृति को दर्शाता है।
• पारिस्थितिक क्षति के प्रमाण: पिछली चरम घटनाओं ने पहले ही महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षति पहुँचाई है, जिसमें 100 से अधिक प्रलेखित मामलों में जनसंख्या में 25% से अधिक की गिरावट और स्थानीय स्तर पर प्रजातियों के विलुप्त होने की घटनाएँ शामिल हैं।
• शमन की क्षमता: अध्ययन दर्शाता है कि यदि वैश्विक उत्सर्जन को ‘नेट-जीरो’ तक कम कर दिया जाता है, तो कई चरम घटनाओं के प्रति आवासों का जोखिम काफी घटकर लगभग 9% रह सकता है। यह जलवायु शमन प्रयासों के अत्यधिक महत्व को रेखांकित करता है।
निष्कर्षों के निहितार्थ
• जैव विविधता की हानि में तीव्रता: मिश्रित चरम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता कई प्रजातियों को उनकी पारिस्थितिक सहिष्णु सीमा से बाहर करके जैव विविधता के नुकसान को तीव्र कर सकती है, जिससे उनके विलुप्त होने का जोखिम बढ़ जाता है।
• पारिस्थितिक तंत्र की अस्थिरता: ये चरम घटनाएँ परागण, पोषक चक्र और खाद्य श्रृंखला की गतिशीलता जैसी प्रमुख पारिस्थितिक प्रक्रियाओं को बाधित करती हैं, जिससे पारिस्थितिक तंत्र में दीर्घकालिक अस्थिरता बनी रहती है और उसका क्षरण होता है।
• प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता में कमी: बार-बार होने वाले और ओवरलैपिंग जलवायु तनावों की स्थिति में प्रजातियों की अनुकूलन करने, पलायन करने या उबरने की क्षमता महत्वपूर्ण रूप से बाधित होती है, विशेष रूप से स्थानिक और भौगोलिक रूप से प्रतिबंधित प्रजातियों के लिए।
• पारंपरिक संरक्षण दृष्टिकोणों के समक्ष चुनौतियाँ: पारंपरिक संरक्षण रणनीतियाँ, जो मुख्य रूप से क्रमिक जलवायु परिवर्तनों पर आधारित हैं, अब अपर्याप्त होती जा रही हैं। इनके स्थान पर गतिशील, जलवायु-अनुकूल और जोखिम-आधारित नियोजन ढाँचों को अपनाने की आवश्यकता है।
• पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं और मानव कल्याण को खतरा: जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और जलवायु नियमन जैसी आवश्यक सेवाओं को प्रभावित करता है, जिससे मानवीय आजीविका और आर्थिक स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
स्थलीय जैव विविधता के संरक्षण हेतु वैश्विक पहल
• जैव विविधता पर अभिसमय (Convention on Biological Diversity – CBD): CBD जैव विविधता के संरक्षण, जैविक संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने और आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का न्यायसंगत बँटवारा सुनिश्चित करने के लिए एक वैश्विक ढाँचा प्रदान करता है।
• कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क (2022): यह फ्रेमवर्क महत्वाकांक्षी वैश्विक लक्ष्य निर्धारित करता है, जिसमें 2030 तक 30% स्थलीय और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण (30×30 लक्ष्य) और क्षय हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली शामिल है।
• वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES): CITES लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करता है ताकि उनके अत्यधिक दोहन को रोका जा सके और उनके दीर्घकालिक अस्तित्व को सुनिश्चित किया जा सके।
• पारिस्थितिक तंत्र बहाली पर संयुक्त राष्ट्र दशक (2021–2030): इस पहल का उद्देश्य क्षय हो चुके पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली के प्रयासों को व्यापक बनाना है, जिससे जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता की हानि के विरुद्ध लचीलापन बढ़ाया जा सके।
• जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं पर अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच (IPBES): IPBES वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जैव विविधता संरक्षण के लिए साक्ष्य-आधारित निर्णय लेने में सहायता हेतु वैज्ञानिक आकलन और नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करता है।
SOURCES:
Indian Express
Down To Earth
PHYS
