कॉस्पार विक्रम साराभाई पदक–2026
संदर्भ: खगोलभौतिक विज्ञानी अन्नपूर्णी सुब्रमण्यम को अंतरिक्ष अनुसंधान में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए COSPAR विक्रम साराभाई पदक–2026 से सम्मानित किया गया है। इसके साथ ही यह सम्मान प्राप्त करने वाली वे पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बन गईं हैं।
अन्य संबंधित जानकारी

- यह पुरस्कार इटली के फ्लोरेंस में आयोजित 46वीं COSPAR वैज्ञानिक सभा के दौरान प्रदान किया गया।
- वे यह पदक प्राप्त करने वाली चौथी भारतीय हैं। उनसे पहलेयू. आर. राव (1996), गुरबख्श सिंह लखिना (2014) औरअनिल भारद्वाज (2024) को यह सम्मान मिल चुका है।
- वह यह सम्मान प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक और विश्व स्तर पर तीसरी महिला हैं।
- उन्होंने एस्ट्रोसैट पर स्थापित पराबैंगनी इमेजिंग टेलीस्कोप (UVIT) के लिए अंशांकन वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया है। एस्ट्रोसैट भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित टेलीस्कोप है, जिसे 2015 में प्रक्षेपित किया गया था। वह थर्टी मीटर टेलीस्कोप (TMT) अंतर्राष्ट्रीय परियोजना से भी जुड़ी हैं।
विक्रम साराभाई पदक के बारे में
- यह एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार है, जिसे अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (COSPAR) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा संयुक्त रूप से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम और ISRO के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में स्थापित किया गया है।
- 1990 में स्थापित यह पदक विकासशील देशों में अंतरिक्ष अनुसंधान में उत्कृष्ट योगदान को मान्यता देता है।
- यह किसी भी देश के उम्मीदवारों के लिए खुला है, बशर्ते उनका संबंधित कार्य मुख्य रूप से उस पाँच-वर्षीय अवधि के दौरान किया गया हो, जो उस COSPAR वैज्ञानिक सभा से एक वर्ष पहले समाप्त होती है, जिसमें पदक प्रदान किया जाता है।
अंतरिक्ष अनुसंधान समिति (COSPAR) के बारे में
- यह एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक निकाय है, जिसकी स्थापना 1958 में हुई थी। यह 1957 में सोवियत संघ द्वारा विश्व के पहले कृत्रिम उपग्रह के प्रक्षेपण के कुछ समय बाद स्थापित किया गया था।
- यह अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद (ISC) के अंतर्गत कार्य करता है और अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर संयुक्त राष्ट्र समिति (UN-COPUOS) से संबद्ध है।
- COSPAR अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए विश्व के सबसे बड़े मंचों में से एक है और प्रत्येक दो वर्ष में अपनी वैज्ञानिक सभा आयोजित करता है, जिसमें दुनिया भर से लगभग 3,000 वैज्ञानिक एकत्रित होते हैं, ताकि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके और अंतरिक्ष अनुसंधान को आगे बढ़ाया जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटालों पर अंकुश लगाने के लिए व्यापक उपायों के निर्देश दिए
संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र, राज्यों, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और दूरसंचार प्राधिकरणों को ‘डिजिटल अरेस्ट’ घोटालों पर अंकुश लगाने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs) तैयार करने, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने, ई-जीरो एफआईआर के माध्यम से आपराधिक कार्रवाई शुरू करने और पीड़ितों से ठगी गई धनराशि की समयबद्ध बहाली सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
मुख्य बिंदु

- शिकायतों में कमी: भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की चौथी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट घोटालों के विरुद्ध शिकायतें 2024 में 1,23,672 से घटकर 2025 में 58,249 और 30 जून 2026 तक 16,377 हो गईं।
- हालांकि, न्यायालय ने कहा कि यह उत्साहजनक प्रवृत्ति होने के बावजूद निरंतर निगरानी आवश्यक है।
- रिकवरी तंत्र: रिजर्व बैंक इनोवेशन हब और I4C के बीच डेटा-साझाकरण समझौता ज्ञापन (MoU) किया गया है।
- शिकायत निवारण तंत्र पोर्टल में 69 बैंकों की 1,23,590 शाखाएँ शामिल हैं, जबकि धनराशि बहाली तंत्र पोर्टल, जिसमें सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 57 बैंक शामिल हैं, ने 36,290 मामलों में ₹18.05 करोड़ की धनराशि बहाल की है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश: RBI कोचार सप्ताह के भीतरबैंकों के लिए ऐसीमानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने का निर्देश दिया गया है, जिसके तहत धन शोधन और साइबर-सक्षम धोखाधड़ी से जुड़ेम्यूल खातोंपर अस्थायी डेबिट रोक लगाई जा सके।
- राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ई-जीरो एफआईआर को क्रियान्वित करने, राज्य साइबर अपराध समन्वय केंद्रों को अधिसूचित करने तथा गृह मंत्रालय की SOP के तहत शिकायत निवारण और धनराशि बहाली मॉड्यूल लागू करने का निर्देश दिया गया है।
- अगली स्थिति रिपोर्ट में राज्यवार और बैंकवार शिकायतों तथा धनराशि बहाली का विवरण शामिल करना होगा।
- न्यायालय ने साइबर-सक्षम वित्तीय धोखाधड़ी से उत्पन्न बैंक खातों को फ्रीज करने से संबंधित मामलोंके शीघ्र निपटारे का भी निर्देश दिया।
- जाँच: सीबीआईनेडिजिटल अरेस्ट के 10 मामले दर्ज किए हैं।
- एक जांच में उसने 238 पीड़ितों, 67 प्रथम-स्तरीय बैंक खातों और लगभग₹80 करोड़ के लेन-देन की पहचान की तथा16 राज्यों में 93 स्थानों पर तलाशी ली।
- न्यायालय ने संगठित साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क की जांच के लिए वर्तमान ₹10 करोड़ की सीमा को कम करने की सिफारिश पर विचार करने की भी बात की।
RBI की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर को अपरिवर्तित रखा
संदर्भ: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी तीसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति बैठक में सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया तथा तटस्थ मौद्रिक नीति रुख बनाए रखा।
अन्य संबंधित जानकारी
- घरेलू और वैश्विक व्यापक आर्थिक परिस्थितियों में हो रहे बदलावों का आकलन करने के बाद, MPC नेचलनिधि समायोजन सुविधा (LAF)के अंतर्गतरेपो दर को 5.25% पर बनाए रखने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया।
- परिणामस्वरूप,स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर 5.0%पर बनी हुई है, जबकि सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर और बैंक दर 5.50% पर बनी हुई हैं।
- RBI नेवित्त वर्ष 2026–27 के वास्तविक GDP वृद्धि अनुमान को 6.6% से बढ़ाकर 6.7%कर दिया, जबकि CPI मुद्रास्फीति अनुमान को 5.1% से घटाकर 5.0% कर दिया। यह घरेलू आर्थिक वृद्धि में विश्वास, लेकिन मुद्रास्फीति संबंधी जोखिमों के प्रति सतर्कता को दर्शाता है।
निर्णय को प्रभावित करने वाले कारक
- लचीली आर्थिक वृद्धि: मजबूत घरेलू मांग, जिसे सुदृढ़ निजी उपभोग, निवेश, निर्माण गतिविधि, बैंक ऋण और निर्यात में सुधार का समर्थन प्राप्त है, ने वृद्धि के दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाए रखा।
- मध्यम मुद्रास्फीति: खाद्य और ईंधन की कीमतों के कारण जून 2026 में CPI मुद्रास्फीति बढ़कर 4.4% हो गई, लेकिन मूल मुद्रास्फीति नियंत्रित रही, जो मांग-आधारित दबावों के सीमित होने का संकेत देती है।
- बढ़ती अनिश्चितताएँ: अल नीनो, असमान मानसून, ऊँची ऊर्जा कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और वैश्विक व्यापार नीति से जुड़े जोखिम आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित कर रहे हैं।
- प्रतीक्षा एवं निगरानी का दृष्टिकोण: चूँकि मुद्रास्फीति संबंधी दबाव मुख्यतः आपूर्ति-आधारित हैं और वित्त वर्ष 2026–27 की तीसरी तिमाही (Q3) में चरम पर पहुँचने के बाद इनके कम होने की उम्मीद है, इसलिए MPC ने नीतिगत दरों में बदलाव से पहले अधिक स्पष्टता की प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) के बारे में
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) की स्थापनासितंबर 2016 मेंभारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB(1) के तहत की गई थी।
- उर्जित पटेल समिति ने MPC की स्थापना की सिफारिश की थी।
- MPC की प्रमुख जिम्मेदारी मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्त करने के लिए नीतिगत रेपो दर निर्धारित करनाहै।
- RBI अधिनियम की धारा 42B(2) के अनुसार, MPC में छह सदस्य होते हैं:
- RBI गवर्नर – अध्यक्ष (पदेन)
- मौद्रिक नीति के प्रभारी RBI के उप-गवर्नर – सदस्य (पदेन)
- केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित RBI का एक अधिकारी – सदस्य (पदेन)
- केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन सदस्य
- केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, होता है।
- RBI अधिनियम की धारा 45ZA के तहत मुद्रास्फीति लक्ष्य 4% निर्धारित है, जिसमें 2%–6% का सहनशीलता बैंड है।
- यदि मुद्रास्फीति लगातार तीन तिमाहियों तक 6% से अधिक या 2% से कम रहती है, तो माना जाता है कि मुद्रास्फीति लक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विस्तारित खेलो इंडिया योजना को मंजूरी दी
संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विस्तारित खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों को बढ़ी हुई सहायता (ANSFs) को मंजूरी दी है। भारत के खेल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और खेल उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए 2026–27 से 2030–31 की अवधि हेतु दोनों के लिए संयुक्त रूप से ₹36,441 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
विस्तारित योजना की मुख्य विशेषताएँ
- बढ़ा हुआ निवेश: ₹36,441 करोड़ के संयुक्त परिव्यय के साथ इसे मंजूरी दी गई है, जो पिछली खेलो इंडिया योजना के परिव्यय से लगभग आठ गुना अधिक है। यह स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे महत्वाकांक्षी खेल विकास कार्यक्रम है।
- एकीकृत खिलाड़ी विकास मार्ग: पहली बार जमीनी स्तर पर प्रतिभा पहचान से लेकर ओलंपिक और पैरालंपिक तैयारी तक एक निर्बाध मार्ग स्थापित किया जाएगा, ताकि भौगोलिक या सामाजिक-आर्थिक बाधाओं के कारण कोई भी खेल प्रतिभा पीछे न छूटे।
- विस्तारित खेल पारिस्थितिकी तंत्र: राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCOEs), खेलो इंडिया उत्कृष्टता केंद्र (KICoEs), SAI प्रशिक्षण केंद्र (STCs), खेलो इंडिया मान्यता प्राप्त अकादमियाँ (KIAAs), खेलो इंडिया केंद्र (KICs) और युवा खेल कंपनियाँ(YSCs) का एकीकृत राष्ट्रव्यापी नेटवर्क स्थापित किया जाएगा, जो विश्व स्तरीय प्रशिक्षण, खेल विज्ञान सहायता और आधुनिक खेल अवसंरचना प्रदान करेगा।
- विद्यालयी खेल सुधार: खेलो इंडिया फीडर स्कूल (KIFS) और खेलो इंडिया उत्कृष्ट विद्यालय (KIUV) शुरू किए जाएंगे, ताकि खेलों को मुख्यधारा की शिक्षा के साथ एकीकृत किया जा सके और प्रारंभिक स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान की जा सके।
- खिलाड़ियों के लिए विस्तारित सहायता: मौजूदा खेलो इंडिया खिलाड़ियों (KIAs) के साथ उभरते खेलो इंडिया खिलाड़ी (E-KIAs) को शामिल किया गया है, जिससे संरचित खिलाड़ी विकास पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार लगभग दस गुना हो जाएगा।
- प्रौद्योगिकी एवं शासन सुधार: राष्ट्रीय प्रशिक्षक प्रत्यायन बोर्ड (NCAB) की स्थापना की जाएगी और खिलाड़ियों के प्रबंधन, प्रतियोगिताओं, अवसंरचना, वित्तपोषण तथा प्रतिभा विकास के लिए एकीकृत डिजिटल खेल मंच की परिकल्पना की गई है।
- समावेशी एवं वैश्विक खेल दृष्टिकोण: महिला खिलाड़ियों, पैरा-खिलाड़ियों और स्वदेशी खेलों के लिए अवसरों का विस्तार किया जाएगा। साथ ही राष्ट्रीय खेलों और प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजनों की मेजबानी को समर्थन दिया जाएगा। यह खेलो भारत नीति 2025 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप है तथा 2030 राष्ट्रमंडल खेलों और ओलंपिक एवं पैरालंपिक खेलों की मेजबानी के लिए भारत की आकांक्षाओं को बल प्रदान करता है।
खेलो इंडिया योजना के बारे में
- शुरुआत: इसे 2017 में युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय (MYAS) की प्रमुख खेल विकास योजना के रूप में शुरू किया गया था। इसमें राजीव गांधी खेल अभियान (RGKA), शहरी खेल अवसंरचना योजना (USIS) औरराष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज योजना (NSTSS) को समाहित किया गया।
- दृष्टिकोण: जमीनी स्तर पर मजबूत खेल संस्कृति को बढ़ावा देना और भारत को वैश्विक खेल राष्ट्र के रूप में स्थापित करना।
- उद्देश्य: जन भागीदारी को बढ़ावा देना, खेल प्रतिभाओं की पहचान एवं पोषण करना, खेल अवसंरचना का विकास करना तथा खेलों के माध्यम से समावेशिता को बढ़ावा देना।
- मुख्य घटक: खेल अवसंरचना विकास, प्रतिभा पहचान एवं खिलाड़ी विकास, खेल प्रतियोगिताएँ, फिट इंडिया आंदोलन तथा खेलों के माध्यम से समावेशिता को बढ़ावा देना।
- क्रियान्वयन: इसे युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के माध्यम से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों, राष्ट्रीय खेल महासंघों (NSFs) और अन्य हितधारकों के सहयोग से लागू किया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय क्लाउडेड लेपर्ड दिवस 2026
संदर्भ: अंतर्राष्ट्रीय क्लाउडेड लेपर्ड दिवस (4 अगस्त) के अवसर पर भारत सरकार ने देश की पहली क्लाउडेड लेपर्ड संरक्षण कार्ययोजना शुरू की, जिसका उद्देश्य इस प्रजाति और इसके वन आवासों के दीर्घकालिक, वैज्ञानिक आधार पर संरक्षण को बढ़ावा देना है।
क्लाउडेड लेपर्ड संरक्षण कार्ययोजना की प्रमुख विशेषताएँ
- क्लाउडेड लेपर्ड संरक्षण कार्ययोजना: भारत में क्लाउडेड लेपर्ड और इसके आवासों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार पर एक दीर्घकालिक रणनीति तैयार की गई है।
- प्रमुख केंद्रित क्षेत्र: वैज्ञानिक आधार पर जनसंख्या का आकलन और दीर्घकालिक निगरानी; आवास संरक्षण, पुनर्स्थापन और परिदृश्य संपर्कता; अवैध शिकार, फंदे लगाने और अवैध वन्यजीव व्यापार की रोकथाम; अनुसंधान, प्रौद्योगिकी आधारित संरक्षण और क्षमता निर्माण; समुदाय की भागीदारी; तथा अंतर-राज्यीय और सीमा-पार सहयोग को मजबूत करना।
- संस्थागत ढाँचा: कार्ययोजना भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारापर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के मार्गदर्शन में तैयार की गई है। इसमें राज्य वन विभागों तथा अन्य अनुसंधान एवं संरक्षण संगठनों के साथ समन्वित कार्यान्वयन की परिकल्पना की गई है।
- परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण: इसका उद्देश्य क्लाउडेड लेपर्ड की व्यवहार्य जनसंख्या को सुरक्षित करना तथा पूर्वी हिमालय और पूर्वोत्तर के वन पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण को मजबूत करना है।
क्लाउडेड लेपर्ड के बारे में

- वैज्ञानिक वर्गीकरण: क्लाउडेड लेपर्ड नियोफेलिस (Neofelis) वंश से संबंधित हैं, जिसमें दो वर्तमान प्रजातियाँ शामिल हैं:
- मेनलैंड क्लाउडेड लेपर्ड (Neofelis nebulosa): दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है, जिसमें भारत भी शामिल है।
- सुंडा क्लाउडेड लेपर्ड (Neofelis diardi): केवल बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों पर पाया जाता है।
- भारत में वितरण: मुख्यभूमि क्लाउडेड लेपर्ड (Neofelis nebulosa) मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों, पूर्वी हिमालय के कुछ हिस्सों और उत्तरबंगाल में पाया जाता है।
- विशिष्ट विशेषताएँ:
- इसका नाम इसके शरीर पर पाए जाने वाले विशिष्ट बादल के आकार के चिह्नों के कारण पड़ा है।
- यह विश्व की सबसे अधिक वृक्षवासी बड़ी बिल्लियों में से एक है और पेड़ों से सिर के बल नीचे उतरने में सक्षम है।
- जीवित जंगली बिल्लियों में इसके शरीर की खोपड़ी के आकार की तुलना में सबसे लंबे कैनाइन दाँत पाए जाते हैं।
- पारिस्थितिक महत्त्व: यह एक महत्त्वपूर्ण वन शिकारी और संकेतक प्रजाति है। इसका संरक्षण उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकी तंत्र तथा उनसे जुड़ी जैव विविधता के संरक्षण में सहायक है।
- संरक्षण स्थिति — मेनलैंड क्लाउडेड लेपर्ड:
- आईयूसीएन रेड लिस्ट: सुभेद्य (Vulnerable)
- CITES: परिशिष्ट I
- वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची I
- प्रमुख खतरे: आवास का नुकसान और विखंडन, फंदे लगाना और अवैध शिकार, अवैध वन्यजीव व्यापार, शिकार प्रजातियों की संख्या में कमी तथा मानव-जनित अन्य व्यवधान।
- प्रमुख खतरे: आवास का नुकसान और विखंडन, फंदे लगाना और अवैध शिकार, अवैध वन्यजीव व्यापार, शिकार प्रजातियों की संख्या में कमी तथा मानव-जनित अन्य व्यवधान।
