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सामान्य अध्ययन-2: कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की संरचना, संगठन एवं कार्यप्रणाली; सरकारी नीतियाँ एवं विभिन्न क्षेत्रों में विकास हेतु हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन एवं कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को तीन माह के भीतर वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार (Terminally Ill) कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए एक समान नीति तैयार करने का निर्देश दिया है।
अन्य संबंधित जानकारी
- यह निर्देश राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) द्वारा दायर जनहित याचिका पर निर्णय सुनाते हुए उच्चतम न्यायालय की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा जारी किए गए। याचिका में वृद्ध, अशक्त एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों की रिहाई के लिए एक समान तंत्र की मांग की गई थी।
- अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया, क्योंकि राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे संवेदनशील कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय ढाँचा उपलब्ध नहीं था।
- न्यायालय ने कहा कि कारावास के बाद भी कैदी अपने मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं होते तथा अनुच्छेद 21 के अंतर्गत गरिमा एवं मानवीय व्यवहार की संवैधानिक गारंटी वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों पर भी समान रूप से लागू होती है।
उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्देश
- व्यापक नीति का निर्माण: सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि वे तीन माह के भीतर वृद्ध, अशक्त एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए एक व्यापक नीति तैयार कर उसे अधिसूचित करें।
- असाध्य बीमारी की एक समान परिभाषा: उच्चतम न्यायालय ने राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को “असाध्य बीमारी” की स्पष्ट एवं एक समान परिभाषा अपनाने का निर्देश दिया है तथा इसके लिए विशेष आवश्यकताओं वाले कैदियों पर संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय (UNODC) की हैंडबुक, 2009 में दी गई परिभाषा का उपयोग करने की अनुमति दी है।
- इसके अनुसार, असाध्य बीमारी वह चिकित्सीय अवस्था है, जिसमें स्वास्थ्य में सुधार की कोई युक्तिसंगत संभावना नहीं होती, रोग लगातार बढ़ता जाता है तथा अंततः मृत्यु का कारण बनता है।
- वस्तुनिष्ठ पात्रता मानदंड: नीति में पारदर्शी एवं वस्तुनिष्ठ पात्रता मानदंड निर्धारित किए जाएँ, जिनमें आयु, चिकित्सीय स्थिति, बीमारी की प्रकृति तथा अन्य प्रासंगिक मानवीय आधारों को शामिल किया जाए।
- विधिक सेवा प्राधिकरणों से परामर्श: राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि वे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों (SLSAs) से परामर्श करके नीति तैयार करें, ताकि पात्र कैदियों की पहचान सुगमता से हो सके तथा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।
- स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड: राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को मंडल तथा राज्य स्तर पर स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड गठित करने होंगे, जो कैदियों की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करेंगे तथा समयपूर्व रिहाई की पात्रता के संबंध में निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ अनुशंसाएँ देंगे।
- प्रौद्योगिकी आधारित प्रक्रिया: समयपूर्व रिहाई से संबंधित सभी आवेदन e-Prisons पोर्टल के माध्यम से संसाधित किए जाएँगे। इस प्रक्रिया की प्रभावी निगरानी तथा मामलों के समयबद्ध निस्तारण के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) एवं केंद्र सरकार तकनीकी सहायता प्रदान करेंगे।
भारत में कैदियों की समयपूर्व रिहाई को समझना
- समयपूर्व रिहाई का अर्थ है किसी दोषसिद्ध कैदी को उसकी निर्धारित सजा की अवधि पूरी होने से पहले आयु, स्वास्थ्य की स्थिति, अच्छे आचरण, मानवीय आधारों अथवा लोकहित जैसे कारणों से रिहा करना।
- पैरोल (Parole) एवं फर्लो (Furlough) से भिन्न, जो कैदी को अस्थायी रूप से जेल से बाहर रहने की अनुमति देते हैं, समयपूर्व रिहाई में दंड में छूट, दंड का रूपांतरण अथवा सरकार की रिहाई संबंधी नीतियों के माध्यम से कारावास की अवधि को स्थायी रूप से कम कर दिया जाता है।
- संवैधानिक एवं वैधानिक ढाँचा
- राष्ट्रपति एवं राज्यपाल क्रमशः संविधान के अनुच्छेद 72 एवं अनुच्छेद 161 के अंतर्गत क्षमादान संबंधी शक्तियों का प्रयोग करते हैं।
- इसके अतिरिक्त, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 473–475 में दंड के निलंबन, दंड में छूट एवं दंड के रूपांतरण से संबंधित प्रावधान किए गए हैं, जो राज्य सरकारों द्वारा लागू की जाने वाली समयपूर्व रिहाई नीतियों का वैधानिक आधार प्रदान करते हैं।
निर्णय का महत्त्व
- गरिमा के अधिकार को सुदृढ़ करना: यह निर्णय इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि जीवन एवं गरिमा का अधिकार कारावास के बाद भी बना रहता है, विशेषकर वृद्ध एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों के संदर्भ में।
- सुधारात्मक न्याय को बढ़ावा: यह निर्णय दंडात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर अधिक मानवीय एवं सुधारात्मक आपराधिक न्याय प्रणाली को प्रोत्साहित करता है।
- संवेदनशील कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार: यह निर्णय वृद्ध, अशक्त एवं असाध्य रूप से बीमार कैदियों की विशेष स्वास्थ्य सेवाओं, उपशामक देखभाल तथा जीवन के अंतिम चरण) से जुड़ी आवश्यकताओं को मान्यता प्रदान करता है।
- राज्यों में एकरूपता को बढ़ावा: एक समान नीति ढाँचा राज्यों में समयपूर्व रिहाई की प्रक्रियाओं में मौजूद असमानताओं को कम करेगा तथा समान परिस्थितियों वाले कैदियों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करेगा।
- जेलों में भीड़भाड़ की समस्या का समाधान: ऐसे कैदियों की रिहाई, जो सुरक्षा की दृष्टि से न्यूनतम जोखिम उत्पन्न करते हैं तथा जिन्हें विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है, जेल सुधार के व्यापक प्रयासों को बल दे सकती है तथा कारागारों में भीड़भाड़ कम करने में सहायक हो सकती है।
SOURCES :
The Hindu
Verdictum
New Indian Express
