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सामान्य अध्ययन-2: भारत और उसके पड़ोसी- संबंध।
संदर्भ: भारत ने लिपुलेख दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने पर नेपाल की आपत्ति को खारिज कर दिया है। भारत ने नेपाल के क्षेत्रीय दावों को “अपुष्ट” बताते हुए संवाद का आह्वान किया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
• यह विवाद सुगौली की संधि से शुरू हुआ, जिसने काली नदी के साथ सीमा को परिभाषित किया था।
• मुख्य मुद्दा काली नदी के अनिश्चित उद्गम स्थल को लेकर है, जिसमें:
- प्रारंभिक ब्रिटिश मानचित्र (1819–1856), जो इसके उद्गम को लिम्पियाधुरा में दर्शाते हैं (नेपाल के दावे का समर्थन करते हैं)।
- बाद के मानचित्र (1879 के बाद) एक अलग धारा (कुटी यांग्ती) को काली नदी के रूप में पहचानते हैं (भारत के पक्ष का समर्थन करते हैं)।
• यह विवाद निम्नलिखित घटनाओं के बाद और बढ़ गया:

- भारत का 2019 का राजनीतिक मानचित्र, जिसमें कालापानी को अपने क्षेत्र के भीतर दिखाया गया था।
- नेपाल का 2020 का संशोधित मानचित्र और संवैधानिक संशोधन, जिसके माध्यम से कालापानी–लिपुलेख–लिम्पियाधुरा पर दावा किया गया।
• लिपुलेख के माध्यम से सड़क निर्माण, व्यापार मार्गों और तीर्थ यात्रा करने को लेकर भी तनाव उत्पन्न हुआ।
भारत की स्थिति
• लिपुलेख 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक पारंपरिक मार्ग रहा है, जिसका दशकों से निरंतर उपयोग किया जा रहा है।
• भारत का यह पक्ष है कि:
- नेपाल के दावे “न तो न्यायसंगत हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं।”
- क्षेत्रीय दावों का कोई भी “एकतरफा कृत्रिम विस्तार” अपुष्ट और अमान्य है।
• भारत इस मुद्दे को नया नहीं मानता है और प्रशासनिक नियंत्रण एवं निरंतर उपयोग की निरंतरता पर बल देता है।
• भारत ने सीमा संबंधी मुद्दों को हल करने के लिए संवाद और कूटनीति के माध्यम से रचनात्मक जुड़ाव के प्रति अपनी तत्परता व्यक्त की है।
नेपाल की स्थिति
• नेपाल का दावा है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी काली नदी के पूर्व में स्थित हैं और इसलिए 1816 की संधि के तहत ये नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं।
• नेपाल ने उसकी सहमति के बिना इस क्षेत्र में भारत-चीन गतिविधियों (व्यापार, सड़क निर्माण, तीर्थयात्रा) पर आपत्ति जताई है।
- उसने भारत और चीन दोनों के साथ राजनयिक स्तर पर यह मुद्दा उठाया है।
• नेपाल का तर्क है कि इस विवाद का समाधान निम्नलिखित माध्यमों से किया जाना चाहिए:
- ऐतिहासिक संधियाँ, मानचित्र और साक्ष्य।
- संभवतः त्रिपक्षीय चर्चा (भारत-नेपाल-चीन), जैसा कि कुछ अधिकारियों द्वारा सुझाव दिया गया है।
मुख्य मुद्दे
• क्षेत्रीय संप्रभुता: ऐतिहासिक संधियों और मानचित्र संबंधी साक्ष्यों की परस्पर विरोधी व्याख्याएँ।
• अप्रभावी संयुक्त तंत्र: भारत और नेपाल द्वारा 1981 में सीमा निरीक्षण और 1997 में सीमा प्रबंधन समितियों जैसे संयुक्त तंत्र स्थापित किए गए थे, परंतु मुख्य सीमा विवाद अभी भी अनसुलझे हैं।
• धार्मिक और सांस्कृतिक पहुँच: कैलाश मानसरोवर यात्रा भारतीयों के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है।
• भारत-चीन कारक: लिपुलेख के माध्यम से व्यापार और कनेक्टिविटी इस मुद्दे में एक तीसरे पक्ष का आयाम जोड़ते हैं।
• खुली सीमा की गतिशीलता: पारंपरिक रूप से खुली सीमा (1950 की संधि के बाद) होने के बावजूद, अनसुलझे सीमा विवाद बने हुए हैं।
आगे की राह
• द्विपक्षीय तंत्र को पुनर्जीवित करना: मौजूदा भारत-नेपाल राजनयिक चैनलों के माध्यम से सीमा वार्ता में तेजी लाना।
• नदी के उद्गम को वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करना: काली नदी के वास्तविक स्रोत को निर्धारित करने के लिए संयुक्त तकनीकी सर्वेक्षण करना।
• विश्वास-निर्माण उपाय: बातचीत जारी रहने तक विवादित क्षेत्रों में यथास्थिति बनाए रखना।
• तीर्थयात्रा को राजनीति से अलग करना: तनाव बढ़ाए बिना यह सुनिश्चित करना कि यात्रा सुचारू रूप से चलती रहे।
• राजनयिक जुड़ाव को मजबूत करना: इस मुद्दे के राजनीतिकरण को रोकने के लिए नियमित उच्च स्तरीय संवाद आयोजित करना।
• एकतरफा कार्रवाई से बचना: दोनों पक्षों को ऐसे कदम उठाने से बचना चाहिए जो जमीनी वास्तविकताओं में परिवर्तन करते हों।
Sources:
Newsonair
The Hindu
Indian Express
